राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत की राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में शून्य भूमिका
देवभूमि न्यूज डेस्क
नई दिल्ली
29 सितंबर को गहलोत को दिल्ली में कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी की नाराजगी झेलनी पड़ी तो इधर जयपुर में उनके पुत्र वैभव गहलोत के राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। हालांकि यह रोक एसोसिएशन के चुनाव पर लगाई गई है, लेकिन यदि चुनाव होते तो मौजूदा समय में वैभव ही अध्यक्ष बनते। वैभव गहलोत इसलिए अध्यक्ष बन पा रहे है कि उनके पिता मुख्यमंत्री है।

यही वजह है कि एसोसिएशन के चुनाव में निर्वाचन अधिकारी उन रिटायर्ड आईएएस राम लुभाया को बनाया गया है जो इस समय गहलोत सरकार की मेहरबानी से अनेक सरकारी सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं। 29 सितंबर को सोनिया गांधी से मुलाकात के दौरान जो हालात उत्पन्न हुए उसमें गहलोत को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने की बात भी कहनी पड़ी। हो सकता है कि कुछ दिनों में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री भी नहीं रहे। इसे बुरे दिन वाला कथन ही कहा जाएगा कि 29 सितंबर को जब गहलोत सोनिया गांधी से मिलने जा रहे थे, तब उनके हाथ में कुछ कागज भी थे। एक कागज पर गहलोत ने अपने हाथ से कुछ पॉइंट लिखे थे। ये वो पॉइंट थे, जिन पर गहलोत को सोनिया गांधी के समक्ष सफाई देनी थ, इसमें माफी मांगने की बात भी लिखी थी। गहलोत के हाथ में रखा यह कागज मीडिया के कैमरों में कैद हो गया। यह कागज हाथों हाथ सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। यह असहज करने वाली स्थिति है कि कोर्ट के गोपनीय कागज मीडिया में लीक हो जाए। कागज का लीक होना परछाई वाले कथन से जुड़ा हुआ है। मीडिया के कैमरे में कागज की छाया ही तो आई है। यानी गहलोत का उनकी ने भी साथ छोड़ दिया है। मुख्यमंत्री के पद से हटने के बाद अशोक गहलोत की क्या स्थिति होगी, यह भगवान ही जानता है। 25 सितंबर से पहले तक जिन गहलोत की कांग्रेस की राजनीति में तुती बोलती थी, उन गहलोत की 30 सितंबर को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नामांकन में कोई भूमिका देखने को नहीं मिली। हालांकि गहलोत दिल्ली में ही है। लेकिन अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के लिए सोनिया गांधी सहित किसी भी नेता ने गहलोत से विचार विमर्श तक नहीं किया। इससे प्रतीत होता है कि गहलोत अब 10 जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) से आउट हो गए हैं। 25 सितंबर से पहले अशोक गहलोत का कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष तय माना जा रहा था। गांधी परिवार को भी यह संतोष था कि गहलोत जैसा वफादार नेता अध्यक्ष बन रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री पद की लालसा में गहलोत ने आत्मघाती कदम उठा लिया। अब गहलोत न तो अध्यक्ष बन पाए और न ही उनके पास मुख्यमंत्री का पद रहेगा। यदि गहलोत के मन में एक वर्ष के मुख्यमंत्री पद का मोह नहीं होता तो आज गहलोत राष्ट्रीय राजनीति में चमकता हुआ चेहरा होते।