राही,रास्ता सीधा चल !! (रविवारीय कहानी)

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राही,रास्ता सीधा चल !!
(रविवारीय कहानी)
*देवभूमि न्यूज डेस्क*
राजीव शर्मन् अम्बिकानगर-अम्ब जिला ऊना हिमाचल प्रदेश।

पड़ोस में डौंडीराम के नामकरण के पीछे की भी अजीब फेहरिस्त थी। बचपन से ही डौंडीराम को नशे की लत लग चुकी थी। उसको सुधारने के सभी प्रयास असफल हो चुके थे। माता पिता जी ने एक गलती और कर दी थी कि उसका विवाह करके एक और झमेला खड़ा कर दिया था। डौंडीराम के विवाह के समय अधिकांशतः मित्र और रिश्तेदार भी नदारद थे। कुछ लोगों ने डौंडीराम के ससुराल वालों को खबर पहुंचाईं थी कि डौंडीराम के साथ विवाह करने पर लड़की को अनावश्यक समस्याओं का हर समय सामना करना पड़ेगा। ससुराल वालों ने डौंडीराम के माता-पिता जी के आश्वासन के बाद विवाह करने की हामी भर दी थी। जिन मित्रों-रिश्तेदारों ने डौंडीराम का विवाह सोच समझकर करने का प्रस्ताव उसके ससुराल पहुंचाया था,वह लोग तो डौंडीराम के दुश्मन बन चुके थे।

मोहल्ले में डिम्मू पानवाड़ी जी, नामकरण करने में बहुत माहिर हुआ करते थे। पास-पड़ोस के बच्चों के उपनाम परिवर्तित करने का गहरा राज हुआ करता था। बचपन की नासमझी इसका पता लगाना बहुत मुश्किल था। यकीनन पड़ोस के बाल-गोपाल जिनका नामकरण डिम्मू पानवाड़ी जी कर गये थे, अधिकांशतः अधेड़ावस्था में प्रवेश कर चुके हैं। उनके असली नामों को कोई नहीं जानता बल्कि जो नाम प्रचलित हुये वही सभी जानते हैं।यथा नाम तथा प्रभाव आज भी साफ़ नज़र आने लगता है।कभी तो बुद्धि जीवी इन नामकरणों पर सविस्तार चर्चाओं को जन्म देने लगते हैं।उनका कहना है कि वास्तव में डिम्मू पानवाड़ी जी बड़ी पैनी नजर रखने के बाद उपनाम रखते थे।
बहुत बहस छिड़ जाती है कि बहुत बाल- गोपालों के तो उल जलूल नाम रख दिए गये थे। यह तो मात्र डिम्मू पानवाड़ी जी का मसखरा स्वभाव लोगों को हास्य व्यंग परोसने का मात्र प्रयत्न था
इस पर मोहल्ले के हीरू भाईजी नहीं मानते थे। वह कहते कि डिम्मू पानवाड़ी बहुत पहुंच वाला संस्कारी ब्राह्मण है। कोई अदृश्य शक्ति उससे काम करवाती है।भाई सतपाल जी नहीं मानते थे कि यह सब महज हंसी मजाक से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
नुक्कड़ पर डिम्मू पानवाड़ी की दुकान रात ग्यारह बजे तक खुली रहती थी। उन दिनों पान खाने का प्रचलन बहुत अधिक हुआ करता था। घरों में हुक्का तम्बाकू का सेवन करने वाले बुजुर्ग भी डिम्मू पानवाड़ी से अपनी पसंदीदा सिगरेट बीड़ी के ब्रांड बच्चों से मंगवाया करते थे। इस पर डिम्मू पानवाड़ी जी तर्क वितर्क कर देते थे कि तुम्हारे बाप दादा इतने बूढ़े तो नहीं है कि वह खुद आकर बीड़ी सिगरेट नहीं खरीद सकते हैं।
वह प्रायः कहते थे कि तुम्हारे हाथ में स्टार,पानामा,विल्स 99, चारमीनार,पासिंग शो और ए-वन, एस, डीलक्स के पैकेट और बंडल तुम्हारा बेड़ा गर्क करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।
घर पर बच्चों को मां- बहनों को भी सिगरेट बीड़ी के पैकेट लाने पर खास आपत्ति होती थी। यह बहसबाज़ी काफी तेज हो जाया करती थी।
समय बदलता जा रहा था। घरों में दूर दराज से मित्रों-मेहमानों के आने पर बालक देखा करते थे कि उनके बाप-दादा,चाचा जी सिगरेट बीड़ी का तम्बाकू निकाल कर उसमें भांग- चरस को भरकर सेवन करने लगते थे।
यह नशाखोरी खतरनाक साबित हो रही थी।
डिम्मू पानवाड़ी इससे भली भांति परिचित हो चुके थे। सिगरेट बीड़ी तम्बाकू का पान बेचना उनका धंधा था। पड़ोस के डौंडीराम उनकी नीगाहों में चढ़ चुका था। डौंडीराम अक्सर डिम्मूराम की दुकान के इर्द-गिर्द मंडराता रहता था। जब कभी कोई देख नहीं रहा होता और कोई बीड़ी सिगरेट पीने वाला सड़क पर सुलगती बीड़ी सिगरेट फैंकता तो डौंडीराम उसको उठाकर गोल पौड़ियों की ओर भाग जाता था। कुछ मित्रों ने डौंडीराम के घर पर बाबूजी को शिकायत दर्ज करवाई थी कि डौंडीराम बीड़ी सिगरेट पीने लग गया है। इन शिकायतों का डौंडीराम पर कोई असर नहीं हो रहा था। स्कूल में विद्यासागर,अम्बी को भी शिकायतें दर्ज करवाई जाती किंतु डौंडीराम का सुधारवादी परिणाम शून्य था। पड़ोस में जब सभी बच्चे मास्टरणी से ट्यूशन पढ़ने जाते तो सर्दियों के दिनों में डौंडीराम कोयलें की अंगीठी जलाने के बहाने समय बर्बाद करता और जेब में रखे हुए बीड़ी सिगरेट के टोटों को सुलगाकर पीने लगता था।
डिम्मूराम ने तो कह दिया था कि यह डौंडीराम सुधरने वाला नहीं है।
उन दिनों माता महाकाली का मंदिर शहर में प्रसिद्ध होने लगा था। वहां पर भी डौंडीराम गुरों की संगत में चिलम पीने लग गया था। वह अब स्कूल तो बिल्कुल नहीं जाता था। धीरे धीरे उसकी मित्रता शंखचूड़ नशीड़ियों से होती जा रही थी। डौंडीराम के माता-पिता जी उसको नशेखोरी की दलदल से बाहर निकालने में नाकामयाब होकर रह गये थे। डौंडीराम का सर्कल बढ़ता जा रहा था। कुल्लू दशहरे के मेलों में वह हर साल जानें का अभ्यस्त था। संगत का असरदार जादू रंगत लाने लगा था। डौंडीराम को तो माता-पिता जी ने राम भरोसे छोड़ दिया था। डौंडीराम रोजगार बतौर टैक्सियों को चलाने में माहिर हो गया था। बड़े बड़े शहरों में टैक्सियों को चलाने से उसका साम्राज्य फैलता गया था। ऐसे में माता पिता जी की मृत्यु उपरांत सभी स्कूली मित्रों और रिश्तेदारों ने तो डौंडीराम को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ दिया था।
डौंडीराम माता पिता जी की मृत्यु के बाद तो एकदम बेलगाम हो चुका था।नशे का अत्यधिक सेवन भी अपना आत्मघाती असर दिखाने लगा था। भांग-चरस के अत्याधिक सेवन से डौंडीराम के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। कभी कभी चौराहों में टैक्सी से निकलकर पुराने जान पहचान वालों को जोर जोर से आवाजें देने लगता था। सभी उसकी आवाज़ों को सुनते ही नहीं थे। सामने से आने वालों के तो गले ही पड़ने लग जाता था। वह मित्र- रिश्तेदार भी डौंडीराम से पीछा छुड़ा कर भाग लेते थे।
दिल्ली में टैक्सी कार चलाते ड्राईवर डौंडीराम एक तांगेवाले से जा टकराया था।
तांगेवाले का घोड़ा व तांगेवाला किसी तरह बच निकला था।
डौंडीराम कार में बुरी तरह जख्मी हो गया था। उसे किसी तरह ऐम्बुलैंस से अस्पताल पहुंचाया गया था। सिर पर चोट लगने से उसका आपरेशन किया गया था।
उसको अस्पताल का स्टाफ और सुरक्षा कर्मी ही देख रहे थे।
वह बेहोशी में बुदबुदाने लगता था कि “उसको कोई तम्बाकू का ही पान खिला दो!!”
उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था।
पंद्रह दिनों के भीतर उसने जख्मों की ताव ने झेलते हुए दम तोड़ दिया था। यमुना घाट पर डौंडीराम का अंतिम संस्कार कर दिया गया था। डौंडीराम की पत्नी अपने मायके बच्चों संग लौट गई है। उसने अपना रास्ता सीधा चल दिया है।

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