रविवारीय कथा प्रसंग
चेतन ज्ञानानन्द समर
(कहानी)
-राजीव शर्मन अम्बिकानगर-अम्ब कालौनी समीप रेलवे स्टेशन रोड अम्ब-177203,जिला ऊना हिमाचल प्रदेश।
देवभूमि न्यूज डेस्क
ऊना
चेतन अपनी गली में साथियों संग खेल रहा था। खेल बहुत सहज और कौतुक से भरे हुए होते थे। गली में साबुन निर्माता मुंशी राम की दुकान पर लकड़ी की पुरानी पटड़ी पर एक लोहे का ड्रम रखा हुआ रहता था। इसमें मोमबत्तियां बनाने का पदार्थ भरा रहता था। दूसरे छोर पर साबुन बनाने का पदार्थ होता था। अक्सर ड्रमों से गर्मी में यह पदार्थ रिसते तो बच्चे गोंद का गोलाकार गेंद बनाकर कपड़े में लपेटकर कर खेलने लगते थे।

रात्रिकालीन आठ बजे लगभग सभी दुकानें बंद हो जाया करती थी। गली में एक डबलू पानवाड़ी,केसर पानवाड़ी,कुंती पानवाड़ी बालकरुपी बाजार के अंतिम छोर पर डिम्मू पानवाला की दुकान देर रात गये ग्यारह बजे तक खुली रहती थी। बाल-गोपाल दुनियां से बेखबर यहां खुली सड़क पर ही कबड्डी खेल रचाने लग जाते थे। आज के खेल में मियां मिट्ठू के चक्कों पर गेंद फैंकी जा रही थी। यकायक चक्कों से गेंद उछलकर वहां दुकान पर मौजूद पूर्ण सिंह बकरे की कलेजी विक्रेता दुकानदार की कढ़ाही में घुस गई थी। “दो शराबी चिल्लाने लगे थे। अरे! कमाल हो गया!! बनी बनाई बकरे की कलेजी का बड़ा टुकड़ा कढ़ाही में आ गया।।”
अगले ही क्षण पूर्ण सिंह ने लाठी भांजकर सभी बच्चों को वहां से दौड़ा दिया था। उस दिन के बाद वहां खेल खेलना पूर्णतया बंद हो गया था।
कुछ बालकों ने प्रेम सिंह बेकरी वाले की दुकान पर ताश के पत्तों का रंग वाला खेल खेलना शुरू कर किया था। भावी पीढ़ी के बच्चों को ताश फैंटते देख पड़ोस के हीरु भाई जी ने बच्चों को समझाया था। वह विशेषकर चेतन ज्ञानानन्द को मुखातिब होकर समझा रहे थे।”देखो! बच्चों यह तुम्हारे पढ़ने लिखने के दिन हैं” देखो देखों!!यह जयवर्धन मास्टर जी का लड़का राजू जा रहा है। यह घर के झमेलों से विक्षिप्त हो गया है। इसी तरह हमारे पड़ोस का रामकृष्ण भी विक्षिप्त बन चुका है।।”
चेतन ज्ञानानन्द ने उत्सुकता पूर्वक हीरू भाई जी से पूछा कि यह सब पढ़ाई-लिखाई ना करने का परिणाम है?
नहीं नहीं ऐसा भी नहीं है किन्तु सम्पत्ति को लूटने वाले लालची हिस्सेदारों ने इन पर जादुई करतब भी करवायें हैं। कहते हैं कि इन पर मारण -मूठ का भी प्रयोग किया गया था। ग्रहचाल अच्छी होने से जान तो बच गई परन्तु जीते जागते पागल भूत बन कर रह गये हैं।
हीरु भाई जी का लम्बा वकतब्य जारी था। रामकृष्ण का ही एक चाचा बृजलाल पान-सिगरेट की दुकान करता था। यह आज से चालीस साल पुराना घटनाक्रम है।
उसका अच्छा खासा कारोबार सगे रिश्तेदार हिस्सेदारों को रास नहीं आया और उस पर मारण-मूठ का तांत्रिक प्रयोग करवाया गया। हीरू भाई ने बतलाया कि वृजलाल उसका जमाती भाई था। पढ़ने में अब्बल दर्जे का था। जहां आजकल पड़ोसी इंद्र सिंह टंडन राशन डिपो चलाता है,यही वृजलाल की दुकान थी। हम सभी मित्र देर रात गये उसकी दुकान पर महफ़िल जमाकर खूब गप्पे हांकते थे। एक गंगा गाय भी पाली हुई थी। गाय सेवक पक्का था। जब वृजलाल की मृत्यु हुई तो गंगा गाय डुगली के श्मशान घाट पर उसके दाह संस्कार पर रोते रोते रंभाती रही थी।
इसलिए ऐसे षड्यंत्रकारी ताकतों से बचते हुए अपने को कुसंगत से सदैव ही बचाना चाहिए।
आज रात्रि चेतन ज्ञानानन्द को नींद नहीं आ रही थी। उसे भी लगने लगा था कि कहीं उसका भी हश्र रामकृष्ण और राजू टंडन की तरह ही तो नहीं होने वाला है। दोनों की अत्याधुनिक चल अचल सम्पत्ति होने से चेतन ज्ञानानन्द को भी लगने लगा था कि उसके पिताजी पर भी सभी सगे रिश्तेदार हिस्सेदारों ने बहुत प्रकार से घेरेबंदी जारी रखी थी। यही नहीं चेतन ज्ञानानन्द के पिताजी के साथ कोर्ट-कचहरी और मारपीट के मामले भी लगातार चल रहे थे।
विजय हाई स्कूल में पढ़ रहे चेतन ज्ञानानन्द ने आधी छुट्टी को अपने कक्षा अध्यापक खेमचंद जी से अपनी मानसिक समस्या की पुरजोर गुहार लगाई थी।
मास्टर खेमचंद जी ने भली भांति चेतन ज्ञानानन्द की मनोदशा को भांप लिया था।
एक बार खेमचंद जी ने चेतन ज्ञानानन्द को कृष्णा टाकीज़ में अपने चाचा के साथ फिल्म देखने के बाद दूसरे दिन कक्षा में भी फिल्मों से बचने की सलाह दी थी। वह जानते थे कि चेतन ज्ञानानन्द संपति का अकेला अधिकारी है। एक बार कुसम थियेटर में भी चेतन ज्ञानानन्द का चाचा उसे फिल्म दिखाने ले गया था। चेतन ज्ञानानन्द की समझ में आने लगा था कि चाचा चाहता है कि उसे फिल्मों का चस्का लग जाये और वह पढ़ाई लिखाई से विमुख हो जाये।
चेतन ज्ञानानन्द अब सतर्क रहने लगा था। चाचा ने घरेलू कलह का झमेला खड़ा कर दिया था।
इन झमेलों में एक दिन पिताजी ने परेशानी में प्राण त्याग दिए थे। थोड़े दिनों बाद माताजी भी चल बसी तो चेतन ज्ञानानन्द के पास घर से भागने के अतिरिक्त कोई रास्ता दिखाई नहीं देता था।
एक गनीमत थी कि वह मैट्रिक पास करने में कामयाब हो गया था। घर से भागते समय वह मैट्रिक पास का प्रमाणपत्र अपने साथ लेकर घर से भाग लिया था।
वह अम्बाला रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर अगली सुबह काम तलाश करने लगा था। एक फल विक्रेता एवं जूसवार वाले ने उसे अपनी दुकान पर काम करने के प्रयोजन से रख लिया था।
सुबह सांय ठीक से चेतन ज्ञानानन्द को रोटी खाने को मिलने से कोई समस्या नहीं रही थी। वह बड़ी मेहनत और ईमानदारी से साहु फल विक्रेता का काम करने लगा था। समय मिलने पर वह साहु विक्रेता के बच्चों को पढ़ाई-लिखाई भी करवाने लगता था।साहु फल विक्रेता चेतन के काम से अत्यधिक प्रसन्न रहने लगा था।
चेतन ज्ञानानन्द जल्दी ही साहु विक्रेता के घर का पारिवारिक सदस्य बन चुका था। साहु फल विक्रेता ने फल सब्जी मंडी का काम बढ़ाकर एक शेयर चेतन के नाम से भी खरीद लिया था। दो तीन सालों के भीतर ही साहु को अच्छा खासा मुनाफा हो गया था।
साहु फल विक्रेता अपनी लड़की के विवाह के लिए लड़के की तलाश में था। साहु फल विक्रेता की धर्म पत्नी ने साहु को बताया था कि आप यूं ही समय बर्बाद कर रहे हैं।हमारी लड़की रीना के लिए तो सबसे उपयुक्त वर अपने घर में ही चेतन ज्ञानानन्द मौजूद है।काफी जांच पड़ताल करने पर फल विक्रेता साहु ने अपनी बेटी रीना का विवाह चेतन ज्ञानानन्द से सम्पन्न करा उसे बहुविधि मदद कर दी थी।
चेतन ज्ञानानन्द फल सव्जी मंडी में एक सम्पन्न व्यापारी बनकर उभरा था। कभी कभी रेलवे स्टेशन समीप उसे अपने पुश्तैनी मकान के जानकार पड़ोसी भी मिल जाते थे। चेतन ज्ञानानन्द को जानकारी मिलती रहती थी। उसके चाचा का देहावसान हो गया था। चाचा जी ने बैंक से ऋण लेकर एक बहुत बड़ा मकान बना लिया था। बैंक का व्याज चक्र वृद्धि की दर से बढ़ता जा रहा था। चाचा के दोनों लड़के बैंक का ऋण उतारने में असमर्थ होकर आपस में ही लड़ते जा रहे थे।
दस सालों के अंतराल में बैंक का ऋण पैंतालीस लाख रुपए तक पहुंच गया था।
चेतन ज्ञानानन्द के पुश्तैनी मकान की नीलामी होने जा रही थी।चेतन ज्ञानानन्द ने सारी वस्तु स्थिति अपने ससुर साहु जी को बतला दी थी। चेतन ज्ञानानन्द निर्धारित समय पर नीलामी की सूचना मिलने पर अपनी पुश्तैनी जगह के मकान पर नीलामी में सम्मिलित हो गया था। मकान की आखरी नीलामी साठ लाख तक पहुंच चुकी थी। एक दो तीन होने वाली थी।तभी चेतन ज्ञानानन्द के ससुर साहु ने एकसठ लाख की बोली लगाकर सबको चित कर दिया था।
मकान के सारे कागजात चेतन ज्ञानानन्द के नाम से आसानी से बन गये थे। चेतन ज्ञानानन्द उस मकान के कुछ हिस्सा का राजस्व मालिक भी था।
चेतन ज्ञानानन्द ने नये सिरे से मकान का निर्माण और दुकानों को बनवाकर अपने चाचा के दोनों लड़कों के लिए रोजगार ही नहीं उनकी भरपूर आर्थिक मदद करके सहकारिता की नई परिभाषा को जन्म दे दिया था।
आजकल चेतन ज्ञानानन्द अम्बाला की एक बहुत बड़ी कोठी के साथ साथ अपने पुश्तैनी मकान का भी सरसव्ज मालिक है।
भावी पीढ़ी का भविष्य उज्जवल बनवाने में दोनों दम्पत्ति चेतन ज्ञानानन्द और उसकी धर्म पत्नी रीना सदैव सक्रियता एवं तत्परता से समर्पित है।