राही समकक्षता की ओर।

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राही समकक्षता की ओर।
(कहानी)
लेखक:राजीव शर्मन अम्बिकानगर-अम्ब कालौनी समीप रेलवे स्टेशन रोड अम्ब-177203.जिला ऊना हिमाचल प्रदेश।

कार में सवार दुल्हा-दुल्हन बैठ चुके थे। दुल्हन के सभी रिश्तेदारों द्वारा विदाई देने का लगातार क्रम समाप्त होने का नाम ही नहीं लेता था।

कार ड्राईवर हरीश को एक इंच कार खिसकाने का कोई अवसर नहीं मिलता था। उसने दुल्हा-दुल्हन के साथ बैठे भाई बहनों का बहुत समझाया कि अब तो कार की खिड़कियों के शीशे बंद कर दिए जाने चाहिए किंतु दुल्हन के नजदीकी रिश्तेदार दुल्हन को कार की खिड़की से भी मिलने-जुलने को भावावेश में आतुर थे। ऐसे में मौके पर मौजूद गांववासियों ने देखा कि इस भाव विभोर विदाई पर दुल्हे के भी आंसू साफ़ छलक आए थे। गांव के प्रबुद्ध जनों ने दुल्हे के निहायत संवेदनशील होने की व्याख्या कर डाली थी। तभी दुल्हन के माता पिता जी ने सबको समझाया और स्थिति को संभालते हुए सभी रिश्तेदारों से दुल्हा-दुल्हन को खुशी खुशी विदाई की पुरजोर अपील का आग्रह किया था। इस पर सभी निजी रिश्तेदारों व सभी गांववासियों ने दुल्हा-दुल्हन की कार का रास्ता आगामी प्रस्थान हेतु छोड़ दिया था।


अब दुल्हन को विदाई के बाद उसकी माइके से जुड़ी यादों की विभिन्न चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया था। बुजुर्ग महिला भागवंती ने कहा कि इस लड़की के विवाह से तो यह घर एकदम ख़ाली ख़ाली लगता है,वह लड़की अपने ससुराल को चली गई तो सारी रौनक ही समाप्त हो गई है।
दुल्हन के माता पिता जी परमेश्वर सिंह और सुभद्रा कुमारी की आंखों में आंसू छलक आए थे।
वहां घर पर दुल्हन की विदाई के उपरांत कुछ गिने-चुने रिश्तेदार व पड़ोसी घर से अपने ससुराल जाने वाली हंसा की तारीफ के पुल बांधे जा रहे थे।
” ऐसी सुरमी कार्यदक्षता वाली बेटी तो मुश्किल से माता पिताजी को नसीब होती है।”मामी निर्मला तो जी भरकर तारीफ किए जा रही थी ।
“गांव की चपल मौसी कौरां ने तो सभी लड़कों से बेहतर हंसा को सर्वोच्च प्राथमिकता और उपाधि दे डाली थी।”
कौरां मासीजी का कहना था कि हंसा तो आजकल के लड़कों के लिए एक मिसाल बन कर इस घर में आई थी। वह लड़कों से बेहतर अपने माता-पिता जी की सुध संभाल रखा करती थी।
अब तो परमेश्वर सिंह और सुभद्रा कुमारी को जीवन यापन करना कठिन हो जायेगा। जब तक इन दोनों की चलती है ,शरीर स्वस्थ रहता है तो तब तक ठीक है वरना आगे तो ईश्वर ही जानें क्या होगा?
हंसा की मधु ताई जी ने भी पुरजोर समर्थन करके सभी बातों की पुष्टि कर डाली थी।
गांव की सरपंचणी रचना ने तो बड़ी बेवाकी से कह दिया था कि यूं तो परमेश्वर सिंह और सुभद्रा कुमारी के कहने को चार बेटे और बहुरानियां है। हंसा की शादी में तो एक छोटे वाला लड़का और उसकी पत्नी ही नजर आई थी।
परमेश्वरी सिंह और सुभद्रा कुमारी के वृद्ध मामाजी ने लड़कों का पक्ष लिया था कि बड़ा बेटा फ़ौज में भर्ती हैं। छुट्टी नहीं मिली होगी उसका परिवार देहरादून रहता है। दो लड़के प्राईवेट फर्मों में पंजाब अमृतसर में कहीं काम करते हैं।
अब राम जाने किसकी क्या मजबूरी होती है?
इस पर गांव की सरपंचणी रचना आवेश में आ गई थी। “वह बोली बजुर्ग माताजी गुस्सा मत करना! मेरे को इस परिवार को करीब से देखते तीस साल व्यतीत हो गए हैं!! हंसा को तो मैंने पिछले बीस सालों से परमेश्वर सिंह और सुभद्रा कुमारी की सेवा में समर्पित देखा है। हंसा माता पिता जी के आदेशानुसार कृषक जमींदारी और पशुपालन में हाथ बंटाती रही है।।”
बाकी तीनों बड़ों लड़कों को उनकी पत्नियां अपने अपने माइकों के विवाह समारोहों और विभिन्न व्यस्तताएं बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते रहें हैं।
हां सबसे छोटा लड़का यहां नजदीकी गांव का दामाद है इसी कारण वह अपने घर व ससुराल से तहेदिल से समर्पण भाव से जुड़ा रहा है। हंसा अपने ससुराल के नगर में प्रवेश कर चुकी थी। रीति रिवाजों के क्रम में सबसे पहले दुल्हा-दुल्हन को ननसाल पक्ष मामा-मामी जी अथवा दूर दराज होने पर मासी -मौसा जी के घर ठहराने की परम्परा सर्वविदित रही है। इसी के चलते नगर के अस्पताल समीप दुल्हा-दुल्हन सुनील और हंसा का शुभ प्रवेश करवाया गया था।
वहां पर दुल्हन हंसा की सुंदरता की सभी महिलाएं मुक्त कंठ से तारीफ कर रही थी। मामा मामी जी भी अपने भाणजे सुनील को खुशनसीब मान रहे थे कि इतनी सुन्दर दुल्हन हंसा जैसी लक्ष्मी उसको मिली है।
हंसा महज़ सुनील को दुल्हन ही नहीं एक कुशाग्र सरकारी स्कूल की अध्यापिका बतौर नौकरी करने वाली कर्तव्य परायण भी थी। सुनील के रिश्तेदारों ने कहना शुरू कर दिया था कि दोनों की घर गृहस्थी बहुत ही सर सव्ज होकर बस जायेगी। “सुनील के बुआ बुआई जी ने परामर्श दे डाला था कि दोनों एक जगह नौकरी करेंगे! यह तभी संभव हो पायेगा!!”
यह बात तो अक्षरशः सत्य थी। सुनील शहर से दूर करसोग तहसील में सरकारी स्कूल में बतौर अध्यापक कार्यरत था। जबकि हंसा कांगड़ा में अध्यापिका कार्यरत थी। दोनों बहुत बहुत दूर अपनी सरकारी सेवाओं में कार्यरत थे।
दुल्हे सुनील की चाची ने तो यह भी कह डाला था कि सुनील का अपना घर तो बिल्कुल भी ठीक नहीं है वहां पर यह दोनों सरकारी नौकरी के साथ साथ रह पायेंगे? इसके आसार तो बहुत ही कम नजर आते हैं।
इतने में सुनील का ज्येष्ठ भ्राता शराब पीकर वहां नाचने लगा था। इससे भविष्य के घटनाक्रम की बखूबी पुष्टि होने लगती थी। सुनील के ज्येष्ठ भ्राता श्याम का शराब के ठेके पर सुबह शाम पक्का ठिकाना था। वह सुनील के पैसों को भी मकान की मुरम्मत को लेकर ऐंठता रहा था। सुनील का विवाह होने से पहले उसके लिए अलग से कमरा बनवाने के नाम पर दस हज़ार रूपए उसने शराब पर उड़ा दिए थे। हालांकि सुनील ने यह पैसे अपना पिता जी गोवर्धन को सपुर्द किए थे। रेत की एक आध ट्राली फैंका कर और ठेकेदार मिस्त्री को काम की शुरुआत करने की एवज में झांसा देकर ज्येष्ठ भ्राता श्याम ने पैसे ठग लिए थे। विवाह से पहले सुनील और श्याम में जमकर हाथा पाई की नौबत भी आई थी।
दो- तीन घंटे तक बारात के मामा मामी जी के घर रूकने के बाद सभी बारातियों ने सुनील के घर की गली में प्रवेश कर लिया था। एकदम पुराना मकान! यह किसी भी दृष्टिकोण से विवाह का घर तो बिल्कुल भी मालूम नहीं होता था।
पुराने मुख्य द्वार पर एक तोरणद्वार सा बनाया गया था।
सुनील की माता जी ने तो पिछले एक दशक से लम्बी बीमारी का विस्तर पकड़ रखा था। अतः दुल्हा-दुल्हन का स्वागत सत्कार सुनील की चाची जी के ही जिम्मे था। दुल्हा-दुल्हन को प्रवेश करवाने के बाद रिश्तेदारों एवं बारातियों ने अपने अपने घरों की राह पकड़ना ही मुनासिब समझा था।
असल में सुनील के घर में ठीक से दस आदमी भी नहीं रुक सकते थे।
इस पर सुनील के पड़ोसी सतपाल जी ने उसको परामर्श दे डाला था कि दुल्हन को लेकर किसी होटल में ठहराया जाना ही उचित है।
आंगन में गंदगी का आलम पसरा साफ नजर आ रहा था। सुनील के पिताजी गोवर्धन ने धाम के प्रीति भोज के आयोजन तक सब्र से काम लेने की सलाह दी थी।
किराये के बड़े हाल में दूसरे दिन अम्बिका माता के पूजन उपरांत धाम परोसी जा रही थी। सुनील का ज्येष्ठ भ्राता शराब पीकर हुड़दंग मचाने पर अमादा था। उस पर कोई भी नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। किसी तरह से जबरन धाम का आयोजन सम्पन्न हुआ था।
सुनील और हंसा ने विवाह सम्पन्न करवाने की गर्ज से पंद्रह दिनों की छुट्टियां मंजूर करवाई थी जिसका एक सप्ताह व्यतीत हो चुका था।
छुट्टियों के तुरन्त बाद स्कूलों में वार्षिक परीक्षाएं शुरू होने वाली थी।
करसोग से सुनील को हेडमास्टर साहब का फोन आया था कि उसको शीघ्रातिशीघ्र दो दिन पहले ही पहुंच कर परीक्षा प्रबंधन की कमान संभालने आना होगा। हंसा ने दो तीन दिन ससुराल में ही रुकने को तवज्जों दी थी। इस दौरान जब सुनील करसोग चला गया तो उसके ज्येष्ठ भ्राता श्याम ने नई-नवेली दुल्हन हंसा से गाली गलौज व मारपीट की। इस पर पड़ोसियों ने बीच बचाव करके हंसा को ज्येष्ठ भ्राता श्याम के चंगुल से छुड़ाया था।
रविवार को समय निकाल कर जब सुनील घर आया तो सारी वस्तु स्थिति घटना क्रम का पता चलने पर श्याम की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
इस दौरान छुट्टियां समाप्त हो रही थी। अतः रविवार को ही एक टैक्सी कार लेकर सुनील अपनी दुल्हन हंसा को माइके के गांव कांगड़ा में छोड़ने पर चल दिया था। हंसा ने सारे घटनाक्रम की बखूबी चर्चा पिताजी परमेश्वर सिंह और माता जी सुभद्रा कुमारी से कर डाली थी।
बस अब तो हंसा के माता पिता जी ने सुनील को भी चेतावनी दे डाली थी कि तुम दोनों सरकारी नौकरी पर कार्यरत हो! इसलिए अपने रहने की व्यवस्था अपने दम पर बखूबी कर लो!!
सुनील ने सास- ससुर जी को पूरा आश्वासन दिया था कि जब तक मकान का इंतजाम नहीं होता वह अपने कार्यस्थल करसोग में ही किराये का मकान लेकर रहेगा।
हंसा तो अभी तक अपने माईके में ही रहने लगी थी।
जब हंसा के पिताजी ने करसोग जाकर सुनील के किराये के मकान की पुष्टि कर ली थी,उसी के बाद ही छुट्टियां आने पर हंसा को करसोग जाने की इजाजत दी गई थी।
हंसा और सुनील पारस्परिक सौहार्द के चलते अपने को बखूबी स्थापित करने की तवज्जो से अपनी घर गृहस्थी को बसाने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे।
ऐसे में हंसा के बड़े भाईयों और उनकी पत्नियों ने एकाएक अपने आने जाने की गतिविधियों को माता पिता जी परमेश्वर सिंह व सुभद्रा कुमारी के यहां बढ़ा दिया था। हंसा के माईके में ही रहने को लेकर कटाक्ष किया करते थे। अंततोगत्वा हंसा ने भी अपना तबादला कांगड़ा से करसोग करवाने की एक सूत्रीय जद्दोजहद को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया था।
उधर सुनील के ज्येष्ठ भ्राता की हुड़दंग मचाने के फलस्वरूप उसके माता पिता जी का स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था।पहले माताजी काल का ग्रास बनी तो उसके बाद पिताजी ने भी एक दिन दम तोड़ दिया था। दोनों भाइयों के नाम मकान का इंतकाल दर्ज किया गया था। किन्तु बैंक का ऋण लेने के कारण कानूनी नोटिस सुनील को भी कर्ज अदायगी हेतु आने लगे थे। ज्येष्ठ भ्राता श्याम ने तो अब मकान के कमरों को किराए पर देकर डटकर शराब पीना शुरू किया था। एक दिन ज्येष्ठ भ्राता श्याम भी दुर्घटना का शिकार होकर चलता बना।
उधर हंसा के माता पिता जी का भी स्वास्थ्य लगातार गिरावट में था। काफ़ी उपचार करवाने के बाद भी कोई सुधार नहीं था। पहले-पहल पिता जी परमेश्वर सिंह की मृत्यु हुई तो पंद्रह दिनों के अंतराल में ही सुभद्रा कुमारी भी परलोक सिधार गई थी।
माता पिता जी के स्वर्ग सिधार जाने के बाद अब हंसा और सुनील का घरों में आना जाना लगभग बंद हो गया था। मकान के राजस्व में मलकीयत उनके नाम इंद्राज मात्र रिकार्ड थी।
सुनील और हंसा दोनों दम्पत्ति ने अपनी अपनी सरकारी सेवाओं के बलबूते अपना आलीशान मकान ही इजाद नहीं कर लिया था बल्कि अपने बच्चों का भविष्य संवारने की गर्ज से भरसक प्रयत्न जारी रखे थे।समय व्यतीत होता गया और सुनील और हंसा के दोनों बेटे डाक्टर इंजीनियर बन गये थे। यही नहीं दोनों बेटों की पत्नियां भी दोनों के समकक्ष डाक्टर इंजीनियर हैं।
दोनों तरफ़ से पुश्तैनी मकानों का सम्पर्क लगभग कट चुका है।
एक राजस्व रिकॉर्ड का इंद्राज बरकरार चला हुआ है।

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