देवभूमि न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली
पुलिस या जांच एजेंसियों की ओर से गिरफ्तार किए गए या समन देकर बुलाए गए प्रत्येक व्यक्ति को पूछताछ और जांच के दौरान वकील रखने की अनुमति मिलने से संबंधित जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से जवाब मांगा है। एक वकील शफी माथेर की ओर से दायर इस पीआईएल की सुनवाई भारत के चीफ जस्टिस (CJI) बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच में हो रही है। याचिकाकर्ता का दावा है कि वकील रखने अधिकार को वैधानिक मान्यता मिलने और शीर्ष अदालतों के फैसलों से पुष्टि होने के बाद भी जांच एजेंसियां और पुलिस इसे एक समान रूप से लागू नहीं कर रही हैं।
पूछताछ के समय वकील रखने का अधिकार
सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच में इस मामले की पैरवी करते हुए वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और प्रतीक के चड्ढा की ओर से दलील दी गई है कि एक बार जब किसी व्यक्ति को पुलिस थाने या जांच एजेंसियों के दफ्तर में समन देकर बुलाया जाता है, उन्हें अपने साथ वकील लाने की अनुमति नहीं दी जाती, जिससे पूछताछ के दौरान उन्हें बड़ा नुकसान होता है। गुरुस्वामी ने कहा, ‘यह याचिका सिर्फ पुलिस,कस्टम, प्रवर्तन निदेशालय आदि की ओर से की गई पड़ताल या जांच के सभी स्तर पर वकील तक पहुंच के मौलिक अधिकार को लागू करने और इसके विस्तार की मांग करती है।’

संविधान में मिली गारंटी का दिया हवाला
गुरुस्वामी ने दलील दी कि वकील की मौजूदगी इसलिए बहुत जरूरी है, ताकि वह व्यक्ति को सलाह दे सके कि क्या नहीं कहना है, जिससे वह खुद को ही दोषी ठहरा सकते हैं। गुरुस्वामी ने कहा, ‘संविधान का आर्टिकल 20(3) यह गारंटी देता है कि किसी भी अपराध के आरोपी शख्स को अपने खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। इस गारंटी को संविधान के आर्टिकल 22(1) के द्वारा और मजबूत किया गया है, जो प्रत्येक गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए व्यक्ति को सहायता के लिए अपनी पसंद का वकील रखने के अधिकार को मान्यता देता है।’
‘अभी वकील से मिलना एजेंसियों पर निर्भर’
वकील ने आगे कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 38 भी कहता है कि जब, ‘किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है और पुलिस उससे पूछताछ करती है, उस दौरान वह अपनी पसंद के एक वकील से मिलने का हकदार होगा, हालांकि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं।’ याचिका में कहा गया है कि मौजूदा कानूनों में अस्पष्टता की वजह कानूनी सलाह मिलना अधिकारियों या जांच एजेंसियों की मर्जी पर निर्भर करता है। इसकी वजह से लोगों के साथ पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार होता है