देवभूमि न्यूज 24.इन
शिमला/हमीरपुर
भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने हिमाचल प्रदेश की वर्तमान आर्थिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिस वित्तीय संकट की चर्चा आज की जा रही है, वह कोई अचानक उत्पन्न हुई स्थिति नहीं है। इसके संकेत वर्षों पहले ही स्पष्ट हो चुके थे, लेकिन राज्य सरकार ने समय रहते न तो वैकल्पिक संसाधन जुटाने की ठोस योजना बनाई और न ही वित्तीय प्रबंधन पर गंभीरता से काम किया।
प्रो. धूमल ने कहा कि रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (आरडीजी) के चरणबद्ध समाप्त होने की जानकारी पहले से उपलब्ध थी। वित्त आयोग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट कर दिया गया था कि 31 मार्च 2026 के बाद आरडीजी समाप्त हो जाएगी। यह कोई नई घोषणा नहीं है। जब यह तथ्य वर्षों पहले से ज्ञात था, तो सरकार को उसी के अनुरूप अपनी नीतियां, खर्च और आय के स्रोत तय करने चाहिए थे। उन्होंने कहा कि वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करना केंद्र सरकार का दायित्व होता है, इसलिए इस विषय पर भ्रम फैलाने के बजाय राज्य सरकार को अपनी तैयारी और नीतिगत विफलताओं पर जवाब देना चाहिए।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि संसाधन-सीमित राज्यों में आर्थिक चुनौतियां आना कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन समझदारी इसी में होती है कि उनसे निपटने के लिए समय पर कठोर और विवेकपूर्ण निर्णय लिए जाएं। अपने कार्यकाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब भी कठिन आर्थिक परिस्थितियां आईं, उनकी सरकार ने बचत और वित्तीय अनुशासन का मार्ग अपनाया। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के खर्चों पर नियंत्रण रखा गया, अनावश्यक यात्राओं और सुविधाओं में कटौती की गई।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वे निजी यात्राओं में भी राज्य पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं डालते थे और सादगी से कार्य करते थे। प्रो. धूमल ने बताया कि उनकी सरकार ने कृषि और बागवानी क्षेत्र में सुधार कर राज्य की आय बढ़ाने पर विशेष जोर दिया। सब्जी उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देकर जहां पहले लगभग 250 करोड़ रुपये का कारोबार होता था, उसे बढ़ाकर लगभग 2250 करोड़ रुपये तक पहुंचाया गया। सेब उत्पादन में आई गिरावट की भरपाई वैकल्पिक कृषि को प्रोत्साहित कर की गई, जिससे राजस्व में उल्लेखनीय सुधार हुआ और बजट संतुलन बनाए रखने में मदद मिली।
उन्होंने वर्तमान सरकार पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि एक ओर आर्थिक संकट की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में चेयरमैन, सलाहकार और पदाधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं, जिन पर भारी खर्च हो रहा है। नई गाड़ियों की खरीद, अतिरिक्त स्टाफ और सुविधाओं पर किया जा रहा व्यय वित्तीय अनुशासन के बिल्कुल विपरीत है। यदि वास्तव में स्थिति गंभीर है, तो सबसे पहले गैर-जरूरी खर्चों पर रोक लगनी चाहिए।
केंद्र-राज्य संबंधों पर बात करते हुए प्रो. धूमल ने कहा कि तथ्यों को स्पष्ट रखना आवश्यक है। जब-जब केंद्र में भाजपा की सरकार रही है, हिमाचल प्रदेश को विशेष सहयोग मिला है—चाहे वह औद्योगिक पैकेज हो या विशेष श्रेणी राज्य का लाभ। केवल राजनीतिक बयानबाजी से आर्थिक स्थिति नहीं सुधरती, इसके लिए ठोस नीति, संसाधन सृजन और व्यय नियंत्रण जरूरी है।
अंत में उन्होंने कहा कि यदि प्रदेश का मुखिया बार-बार यह कहे कि खजाना खाली है, तो इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार ठोस कदम उठाए, खर्चों की समीक्षा करे, प्राथमिकताएं तय करे और वित्तीय प्रबंधन को मजबूत बनाए। आर्थिक चुनौतियों का समाधान केवल जिम्मेदार निर्णयों और अनुशासित शासन से ही संभव है।