हरफ़नमौला सज्जन-मित्र (कहानी)-राजीव शर्मन

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अम्बिकानगर-अम्ब कॉलोनी समीप रेलवे-स्टेशन क्रासिंग ब्रिज व कमांडर होम गार्डज कार्यालय अम्ब तहसील अम्ब-177203 जिला ऊना-हिमाचल प्रदेश।
देवभूमि न्यूज 24.इन
बल्ह घाटी के सागर ने अपनी धाकड़-धांसू बल्लेबाजी का जबरदस्त सिक्का जमा लिया था। सागर एक आलराउंडर क्रिकेटर बतौर जाना जाने लगा था। ग्रामीण क्षेत्रों की क्रिकेट प्रतियोगिता हो या शिवरात्रि-उत्सव क्रिकेट टूर्नामेंट, सागर जबरदस्त फार्म में रहता था। मंडी कालेज में पढ़ते हुए सागर ने काफी उपलब्धियां अर्जित कर डाली थी। वह हर क्षेत्र में अग्रणी रहकर सभी के लिए प्रतिस्पर्धात्मक प्रतीक बनकर उभरा था। लम्बा, सजीला,आकर्षक व्यक्तित्व का धनी सागर कालेज की लड़कियों को भी खूब भाता था। कालांतर में वैवाहिक संबंध स्थापित करने की पहली पसन्द जितेंद्र फिल्मी हीरो की डुप्लीकेट कापी सागर सचमुच उनकी पहली पसन्द की अहर्ता परिपूर्ण करता था। बल्ह घाटी की हम उम्र सागर की सहपाठिन व एक ही गांव की सरिता का बचपन से ही सागर से गहरा लगाव चलता आया था।
सागर-सरिता पारस्परिक सद्भाव के चलते हर गतिविधियों में सहयोगात्मक रुख अपनाते थे। सरिता-सागर दोनों ही राज मिस्त्री परिवार से संबंधित थे। सागर ने बचपन में कठिन परिश्रम किया था। गांव में सभी जानते थे कि राज मिस्त्री मदनलाल का लड़का काफी होनहार है। सागर के पिताजी ने काफी लम्बे संघर्ष उपरान्त सागर की शिक्षा दीक्षा का समुचित प्रबंधन किया था। इसी तरह सरिता के पिताजी पूर्ण चंद भी कुशल राज मिस्त्री थे। बचपन में सागर-सरिता दोनों अपने अपने घरों के लिए जंगल में बालन लकड़िया काट लाते थे। यही नहीं अपने पशु मवेशियों के लिये घास चारा भी चरागाहों से काट लाते थे। दोनों की प्रारम्भिक पढ़ाई-लिखाई हटगढ़ के स्कूल में ही हुई थी।
दोनों अपनी अपनी बाल मंडलियों संग पिकनिक मनाने का भी सफलतापूर्वक आयोजन व संचालन करके कुशल नेतृत्व का परिचय देते आये थे। सागर ने घरेलू बालन की लकड़िया कुल्हाड़ी से फाड़ते हुये अपने कंधों को मजबूत बना लिया था।
क्रिकेट की दुनियां में जब भारतीय टीम में कपिल देव का सफलतापूर्वक पदार्पण हुआ तो सागर मे भी बल्लेबाज व गेंदबाज बनने का स्वप्न साकार करने का भरसक प्रयत्न कर सफलता हासिल कर ली थी। सागर-सरिता के दोनों परिवार बल्ह घाटी से संघर्षरत जीवन यापन करने हेतु मंडी नगर जाते थे। यह एक कठिन परिश्रम की अनुकरणीय गाथा सबके लिए प्रेरणादायक सिद्ध होती थी।
झमाड़ का बाग सभी के लिए अविस्मरणीय दौर में सम्मिलित था। सुकेती खड्ड से सटा यह बाग सचमुच गर्मियों में मित्र-सज्जन समागम स्थल भी था। शहर से साईकिल लेकर चार किलोमीटर पर झमाड़ बाग के दाईं ओर ठंडे पानी का प्राकृतिक स्रोत सभी की पिपासा शांत करता आया था। सुकेत रियासत (सुन्दरनगर) और मांडव्य नगर जनपद छोटी काशी (जिला मंडी शहर मुख्यालय) दोनों के लिए यह अत्यंत रमणीय पर्यटन आदान-प्रदान सुनिश्चित कर देता था।सुन्दरनगर वालों को झमाड़-बाग 20 किलोमीटर व मंडी वालों को मात्र 4 किलोमीटर दूर पड़ता था। साठ का दशक साईकिल सवारी का ही जमाना हुआ करता था। मंडी सुन्दरनगर के बीच गिनी चुनी बसें उपलब्ध थी। इनमें प्रातःकालीन, दोपहर व सायंकालीन 4:40 चलने वाली बसों की समय सारणी प्रचलित हुआ करती थी। सरकारी सेवाओं में कार्यरत कर्मचारी प्राय: साईकिल पर ही आया जाया करते थे। राज मिस्त्री, दिहाड़ीदार मजदूर तो पैदल ही अपनी दिहाड़ी कमाने बारह महीने छह ऋतुओं में चला करते थे। इनमें सभी अपनी अपनी कारगुजारी का खुलासा झमाड़ बाग पर किया करते थे।
इनमें एक मित्र-सज्जन मदनलाल नित्यप्रति राजगढ़ गांव से आता था। मदनलाल राज मिस्री होने के साथ-साथ बदलते दौर में काम की अधिकता के चलते ठेकेदार बन चुका था। वह निकटवर्ती गांवों से सभी मिस्त्री व मजदूरों का कार्य सम्पादित करवाने का माध्यम बन गया था। हालांकि यह मिस्त्री व मजदूर की दिहाड़ी क्रमश: दस रुपये व पांच रुपए का ही समय हुआ करता था।
मदनलाल का बापू साधूराम एक साधारण दिहाड़ीदार मजदूर था जो कि राजगढ के टोडरमल मिस्त्री के साथ मंडी शहर में दिहाड़ी लगाने आता था। एक पुराना खस्ता साईकिल लेकर साधूराम नित्यप्रति आता जाता था। एक बार सर्दियों में साधूराम साईकिल लेकर राजगढ से मंडी जा रहा था। ब्राधीवीर की उतराई पर साईकिल बेकाबू होकर सुकेती खड्ड की ओर लुढ़क गई थी और चट्टान पर सिर के बल गिरने से साधूराम की दुखद मौत हुई थी। उस समय मदनलाल मुश्किल से चार साल का रहा होगा। मदनलाल की माता रामरक्खी ने मदनलाल का पालन पोषण करने के लिए काफल, अंजीर,पोदीना, हरा धनिया, मौसमी आड़ू, पलम, कचनार- कराले ,सब्जियां इत्यादि बेचना शुरु कर दिया था। इस मेहनत मुशक्कत का ज्यादातर पैसा नहीं कमा पाती थी। मदनलाल को स्कूल में दाखिल करवाया गया था किंतू किताबे -कापियां व फीस का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था। मदनलाल को स्कूल छोड़ना पड़ा था। वह अपनी माताजी के साथ-साथ बल्ह घाटी से फल- सब्जियां लेकर
मंडी शहर बेचने जाता था। इस छोटे मोटे कारोबार से गरीबी दूर करके गुजर-बसर बहुत जटिल था।
टांडा गांव के जनरैल सिंह ने मदनलाल को घर पर नौकर रख लिया था। भरपेट भोजन के अतिरिक्त कुछ नसीब नहीं हो पाता था। माता रामरक्खी की घर गृहस्थी चलाने के लिए नगद पैसों की आवश्यकता थी। जब जनरैल सिंह से पैसे की मदनलाल ने डिमांड की तो बुरी तरह से पिटाई करके घर से निकाल दिया गया था। काम की तलाश में मदनलाल मंडी शहर की ओर पैदल कूच कर रहा था।
यहां पर वयोवृद्ध मिस्त्री टोडरमल झमाड़ बाग के ठंडे नाले पर मिल गए थे। टोडरमल मिस्त्री को साधूराम के लड़के की बदतर हालत देखी नहीं जाती थी। टोडरमल ने यहां पर शहर से वापिस आने वाले केसर सिंह ठेकेदार को मदनलाल को काम देने के लिए राजी कर लिया था। उन दिनों पड्डल मैदान सन्निकट कालेज भवन की इमारत का ठेका केसर सिंह के पास ही था। यहां पर सालों साल काम करने से मदनलाल कुशल कारीगर मिस्त्री बन चुका था। चौथी कक्षा से स्कूल छोड़ने वाला मदनलाल व्यवहारिक तौर पर चपल और सम्पन्न बन चुका था।
मदनलाल ने मंडी शहर में अपने लिए आलीशान मकान बना लिया था। मदनलाल की शादी बल्ह घाटी की शारदा से हुई थी।
मदनलाल व शारदा को सागर जैसे गुणी पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।
सरिता का परिवार भी काफी लम्बे संघर्ष उपरान्त मंडी शहर में मकान निर्माण में कामयाब हो गया था।
बदलते घटनाक्रम के चलते सागर-सरिता दोनों पति पत्नि बनकर घर गृहस्थाश्रम का उतरदायित्व निभा रहे है।
मदनलाल का संघर्षरत जीवन का झमाड़ बाग व ठंडे पानी का प्राकृतिक स्रोत “ठंडा नाला” सागर -सरिता की भी पहली पसन्द है। वह शहर के मकान से प्रातःकालीन सैर करने झमाड़ का बाग और ठंडे पानी के नाले तक नित्यप्रति आते रहते है।
वह यहां के पर्वत शिखर और गागल बल्ह रोड पर एक बहुत बड़ा शिक्षण संस्थान साकार करने में तल्लीन हो गए है।

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