होली भाईदूज कथा: यमराज के वरदान से शुरू हुई भाई दूज की परंपरा, इस दिन जरूर करें भाई दूज की कथा का पाठ

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 *देवभूमि न्यूज 24.इन*

⭕होली का बाद आने वाली द्वितीया तिथि बहुत खास होती है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है। चैत्र महीने की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, इस दिन भाई को तिलक करने से उसके जीवन के संकट कम होते हैं। कहा जाता है कि इस दिन गणेश जी और यमदेव की पूजा करनी चाहिए। साथ ही बहनों को अपने भाइयों के सुखद और स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए व्रत रखना चाहिए। पूजा के दौरान भाई दूज कथा का पाठ जरूर करें, ताकि भाई की लंबी और सेहतमंद आयु के लिए किए जा रहे इस व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त किया जा सके।

⚜️होली भाई दूज की पहली पौराणिक कथा
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होली के बाद मनाया जाने वाला भाई दूज का पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन बहन अपने भाई को घर बुलाकर तिलक करती है, आरती उतारती है और प्रेम से भोजन कराती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसके सुख-समृद्धि की कामना करता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा से दो संतानों का जन्म हुआ- पुत्र यमराज और पुत्री यमुना। कहा जाता है कि सूर्य की प्रचंड किरणों को सहन न कर पाने के कारण संज्ञा देवी उत्तर दिशा की ओर चली गईं। समय बीतने पर यमराज ने अपनी अलग नगरी ‘यमपुरी’ बसाई, जहां वे पापियों को उनके कर्मों के अनुसार दंड देने लगे।

भाई को कठोर दंडाधिकारी के रूप में कार्य करते देख यमुना जी व्यथित हो गईं और वे गोलोक चली गईं। काफी समय बीत गया, दोनों भाई-बहन का मिलना नहीं हो पाया। एक दिन यमराज को अपनी बहन की याद आई। उन्होंने दूतों को भेजकर यमुना की खोज करवाई, पर वे नहीं मिलीं। अंततः यमराज स्वयं उन्हें ढूंढने निकल पड़े।

वे गोलोक पहुंचे और अंततः मथुरा के विश्राम घाट पर उनकी भेंट यमुना जी से हुई। अपने भाई को सामने देखकर यमुना अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पूरे विधि-विधान से उनका स्वागत किया, तिलक लगाया और प्रेम पूर्वक स्वादिष्ट भोजन कराया।

बहन के प्रेम और आतिथ्य से प्रसन्न होकर यमराज ने कहा, “बहन, आज मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। तुम जो वर मांगना चाहो, मांग लो।”

यमुना ने कहा, “भैया, मेरा वरदान यह हो कि जो भी भाई-बहन आज के दिन प्रेम पूर्वक मिलें, बहन के घर भोजन करें और मेरे जल में स्नान करें, उन्हें अकाल मृत्यु का भय न हो और उन्हें यमपुरी न आना पड़े।”

यह वरदान कठिन था, क्योंकि यदि सभी यमपुरी न जाएं तो यमलोक का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता। भाई को दुविधा में देखकर यमुना ने कहा, “यदि यह संभव न हो, तो कम से कम इतना वर दें कि जो भाई आज के दिन बहन के घर भोजन कर मथुरा के विश्राम घाट पर स्नान करें, उन्हें अकाल मृत्यु का भय न हो।”

यमराज ने बहन की यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। तभी से होली भाई दूज का यह पावन पर्व मनाया जाने लगा। मान्यता है कि आज भी इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने आते हैं।

⚜️होली भाई दूज की दूसरी लोककथा
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एक नगर में एक वृद्धा अपने पुत्र और पुत्री के साथ रहती थी। पुत्री का विवाह हो चुका था और वह अपने ससुराल में रहती थी। होली के बाद भाई दूज का दिन आया तो बेटे ने अपनी मां से कहा, “मां, मैं बहन के घर जाकर तिलक करवाना चाहता हूँ।”

माँ ने खुशी-खुशी अनुमति दे दी। बेटा बहन के घर के लिए निकल पड़ा। रास्ते में उसे एक नदी मिली। नदी ने रास्ता रोकते हुए कहा, “मैं तुम्हें तभी पार जाने दूंगी जब तुम मुझे वचन दोगे कि लौटते समय मुझे कुछ दोगे।” लड़के ने सहर्ष वचन दे दिया।

आगे बढ़ा तो उसे एक शेर मिला। शेर ने भी वही शर्त रखी। लड़के ने उसे भी वचन दिया। थोड़ी दूर पर एक सांप मिला। उसने भी कहा, “वचन दो, तभी आगे बढ़ने दूंगा।” लड़के ने उसे भी वचन दे दिया।

अंततः वह अपनी बहन के घर पहुँचा। बहन ने प्रसन्न होकर उसका स्वागत किया, तिलक लगाया, आरती उतारी और प्रेम से भोजन कराया। भाई ने बहन को उपहार दिया और उसका आशीर्वाद लिया।

जब वह लौटने लगा तो रास्ते में फिर वही नदी, शेर और सांप मिले। लड़के ने अपना वचन निभाया और उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार भेंट दी। उसके सत्य और वचन पालन से वे सभी प्रसन्न हो गए और उसे सुरक्षित जाने दिया।

घर लौटकर उसने माँ को सारी बात बताई। मां ने कहा, “बेटा, वचन निभाना ही सच्चा धर्म है।”

उसी समय भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “तुमने अपने वचन का पालन किया और बहन के प्रति अपना कर्तव्य निभाया। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुख, समृद्धि और लंबी आयु से भरपूर रहे।”

           *🚩हरिऊँ🚩*
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