*देवभूमि न्यूज 24*:
शिलाई: हिमाचल उत्तराखंड की सीमा टौंस नदी पर प्रस्तावित बहुद्देश्यीय राष्ट्रीय किशाऊ बांध परियोजना के नामकरण को लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों में गहरा असंतोष है। बांध प्रभावितों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि परियोजना का नाम वास्तविक बांध स्थल के अनुरूप नहीं बदला गया तो वे न्यायालय की शरण लेंगे।
किशाऊ बांध संघर्ष समिति के अध्यक्ष मातवर सिंह तोमर, संरक्षक मुन्ना सिंह राणा तथा समिति के सदस्य सोहन सिंह चौहान, इन्द्र सिंह पांडेय, भीम सिंह नेगी (गुलदार), सुभाष नेगी (गुलदार), बाजू राम चौहान, विजय सिंह चौहान और कंवर सिंह सिंगटा सहित कई दर्जन गांवों के ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से कहा कि “जल, जमीन और जंगल हमारे हैं। इन पर किसी अन्य स्थान की पहचान थोपना स्वीकार नहीं किया जाएगा।”
ग्रामीणों का कहना है कि वे बांध निर्माण का विरोध कर रहे हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण कानून के चलते विवश हैं। उनका सबसे बड़ा विरोध परियोजना के नाम को लेकर है। उनका कहना है कि प्रस्तावित बांध टोंस नदी पर चकराता तहसील के शम्भर मेलोथ कुंवानू और शिलाई क्षेत्र के चामरा मोहराड़ में बनना प्रस्तावित है, जबकि परियोजना का नाम अब भी “बहुद्देश्यीय राष्ट्रीय किशाऊ बांध” रखा गया है, जो वास्तविक भौगोलिक स्थिति से मेल नहीं खाता।
‘नाम से पैदा होगा भ्रम, प्रभावितों के अधिकार होंगे प्रभावित’
बांध प्रभावित एवं संभावित विस्थापित ग्रामीणों का कहना है कि यदि परियोजना का नाम ‘किशाऊ’ ही रखा गया तो भविष्य में पुनर्वास, मुआवजा और अन्य सरकारी सुविधाओं को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। उनका तर्क है कि परियोजना के नाम के आधार पर किशाऊ गांव के लोग भी प्रभावित होने का दावा कर सकते हैं, जबकि वास्तविक रूप से बांध की जद में आने वाले गांव शम्भर मेलोथ, चामरा मोहराड़ और आसपास के क्षेत्र हैं। इससे वास्तविक विस्थापितों के अधिकारों और हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
‘किशाऊ गांव पर नहीं पड़ेगा कोई प्रभाव’
ग्रामीणों के अनुसार किशाऊ गांव प्रस्तावित बांध स्थल से लगभग 15 किलोमीटर नीचे स्थित है। परियोजना से न तो उस गांव की एक इंच भूमि प्रभावित हो रही है और न ही वहां के लोगों को किसी प्रकार का प्रत्यक्ष नुकसान होगा। ऐसे में उस गांव के नाम पर परियोजना का नामकरण करना न्यायसंगत नहीं है।
1940 के दशक में किशाऊ में हुई थी शुरुआती जांच
जानकारों के अनुसार वर्ष 1940 के दशक में बांध निर्माण के लिए प्रारंभिक भू-वैज्ञानिक जांच किशाऊ क्षेत्र में शुरू हुई थी। उस समय पहाड़ों की मजबूती परखने के लिए भूमिगत परीक्षण सुरंगें और गहरी ड्रिलिंग की गई थी। बाद में 1960 के दशक की भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट में किशाऊ क्षेत्र की चट्टानें बांध निर्माण के लिए अनुपयुक्त पाई गईं, जिसके बाद उस स्थल को निरस्त कर दिया गया।
इसके बाद तत्कालीन सिंचाई विभाग (उत्तर प्रदेश) ने परियोजना का प्रस्तावित स्थल बदलकर शम्भर मेलोथ और चामरा मोहराड़ क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया। यहां दशकों तक तकनीकी एवं भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण हुए, लेकिन परियोजना का नाम पुराने अभिलेखों के अनुसार ‘किशाऊ’ ही बना रहा। अब प्रभावित ग्रामीण इसी नाम को बदलने की मांग कर रहे हैं।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
परियोजना का नाम वास्तविक बांध स्थल के अनुरूप शम्भर मेलोथ–चामरा मोहराड़ बहुद्देश्यीय बांध परियोजना अथवा किसी उपयुक्त स्थानीय नाम पर रखा जाए।
बांध प्रभावित गांवों की पहचान और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दी जाए।
यदि सरकार ने मांग पर ध्यान नहीं दिया तो प्रभावित ग्रामीण न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।
ग्रामीणों ने कहा कि यह केवल नाम बदलने का मुद्दा नहीं, बल्कि क्षेत्र की पहचान, इतिहास और वास्तविक बांध प्रभावितों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है। उन्होंने सरकार से मांग की कि परियोजना का नामकरण वास्तविक बांध स्थल के अनुरूप कर स्थानीय लोगों की भावनाओं और न्यायसंगत अधिकारों का सम्मान किया जाए