आज माड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर होगा भव्य रात्रि जागरण, हजारों श्रद्धालुओं की जुटेगी भीड़
झांकियों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शिलाई से माड़ी पहुंचेगी गोगा की छड़ियां, सर्पदंश से रक्षा की लोक आस्था से जुड़ा है सदियों पुराना उत्सव
कार्तिकेय तोमर
देवभूमि न्यूज 24
शिलाई : हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का शिलाई क्षेत्र इन दिनों गोगा जाहरवीर की भक्ति में डूबा हुआ है। रक्षाबंधन के दिन शुरू हुई 52 गांवों की परिक्रमा पूरी कर गोगा जाहरवीर की पवित्र छड़ियां शिलाई लौट आई हैं। छड़ियों के शिलाई पहुंचते ही पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा। अब गोगा नवमी के अवसर पर आज शिलाई की सबसे ऊंची चोटी माड़ी में होने वाला रात्रि जागरण इस ऐतिहासिक लोक आस्था पर्व का मुख्य आकर्षण रहेगा।
शिलाई गांव से गोगा जाहरवीर की छड़ियां धार्मिक झांकियों, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और हजारों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में माड़ी की ओर रवाना होंगी। इस दौरान पूरा वातावरण गोगा जाहरवीर के जयकारों से गूंज उठेगा। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसमें क्षेत्र के गांव एक साझा आस्था के सूत्र में बंधते हैं।
52 गांवों की परिक्रमा बनी आकर्षण का केंद्र
गोगा जाहरवीर की छड़ियों द्वारा 52 गांवों की परिक्रमा शिलाई की सबसे विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में मानी जाती है। गोगा छड़ियां गांव-गांव पहुंचती हैं। श्रद्धालु उनका स्वागत करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
परिक्रमा के दौरान जहां-जहां छड़ियां पहुंचती हैं, वहां श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। गांवों में लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर देवता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
52 गांवों की यह परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि शिलाई की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता की तस्वीर भी प्रस्तुत करती है। अलग-अलग गांवों के लोग इस आयोजन से जुड़ते हैं और एक-दूसरे के साथ पर्व की खुशियां साझा करते हैं।
माड़ी की चोटी पर आज रात गूंजेंगे जयकारे
गोगा नवमी पर माड़ी में रात्रि जागरण को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। शिलाई की ऊंची चोटी पर होने वाला यह धार्मिक आयोजन प्राकृतिक वातावरण के बीच आस्था का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करेगा।
शिलाई गांव से छड़ियों के साथ धार्मिक झांकियां माड़ी पहुंचेंगी। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बीच श्रद्धालु यात्रा में शामिल होंगे। माड़ी पहुंचने के बाद विशेष पूजा-अर्चना और जागरण का आयोजन होगा।
रातभर भजन-कीर्तन और गोगा जाहरवीर के जयकारों से माड़ी का वातावरण भक्तिमय रहने की उम्मीद है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने को देखते हुए स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाएं भी की जा रही हैं।
सर्पदंश से रक्षा की गहरी लोकमान्यता
गोगा जाहरवीर की पूजा के पीछे शिलाई क्षेत्र में सर्पदंश से रक्षा की गहरी लोकमान्यता जुड़ी हुई है। स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गोगा जाहरवीर सर्पदंश और विभिन्न संकटों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।
इसी आस्था के कारण गोगा जाहरवीर का नाम विशेष रूप से सर्पदंश से सुरक्षा की लोकपरंपरा से जुड़ा हुआ है। स्थानीय लोगों के बीच यह दावा भी प्रचलित है कि शिलाई क्षेत्र में आज तक किसी व्यक्ति की सांप के काटने से मृत्यु नहीं हुई। यह स्थानीय लोकमान्यता है; इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य या आधिकारिक आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि गोगा जाहरवीर की पूजा की यह परंपरा नई पीढ़ियों तक लगातार पहुंचती रही है। परिवार अपने बच्चों को भी इस धार्मिक परंपरा से जोड़ते हैं और गोगा देवता की कथा तथा उनके प्रति क्षेत्र की आस्था के बारे में बताते हैं।
बच्चों और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूजा
गोगा जन्मोत्सव के बाद श्रद्धालु अपने बच्चों और परिवार की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और मंगल की कामना करते हैं। कई परिवार अपनी पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार विशेष धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
स्थानीय परंपरा में ब्रह्ममुहूर्त में किए जाने वाले कुछ अनुष्ठानों का भी उल्लेख मिलता है। यदि कुछ परिवारों द्वारा पशुबलि की परंपरा निभाई जाती है, तो इसे स्थानीय धार्मिक मान्यता और पारंपरिक प्रथा के रूप में ही देखा जाता है। वर्तमान समय में ऐसे किसी भी अनुष्ठान को कानून और पशु-कल्याण संबंधी नियमों के अनुरूप ही किया जाना आवश्यक है।
गोगा की छड़ियां क्यों हैं खास?
स्थानीय लोकविश्वास में गोगा की छड़ियां देवता की उपस्थिति और आस्था का प्रतीक मानी जाती हैं। इन्हें गांव-गांव ले जाने की परंपरा श्रद्धालुओं को एक-दूसरे से जोड़ती है। जिस गांव में छड़ियां पहुंचती हैं, वहां लोग उन्हें श्रद्धा के साथ स्वीकार करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।
छड़ियों की यात्रा के दौरान बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी की भागीदारी देखने को मिलती है। यही कारण है कि गोगा नवमी का पर्व शिलाई के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
परंपरा के साथ सामाजिक एकता का संदेश
गोगा जाहरवीर का यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता का भी संदेश देता है। 52 गांवों की परिक्रमा के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों के लोग एक साथ जुड़ते हैं। धार्मिक यात्रा, भजन-कीर्तन और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से आपसी भाईचारा मजबूत होता है।
युवाओं की भागीदारी इस परंपरा को नई ऊर्जा देती है। वहीं बुजुर्गों के अनुभव और लोककथाएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं।
आस्था का चरम होगा आज का दिन
52 गांवों की परिक्रमा पूरी कर गोगा जाहरवीर की छड़ियां शिलाई लौट चुकी हैं। अब गोगा नवमी पर माड़ी में होने वाला रात्रि जागरण इस पूरे धार्मिक आयोजन का चरम माना जा रहा है।
शिलाई से झांकियों के साथ हजारों श्रद्धालुओं का माड़ी पहुंचना इस पर्व को भव्य रूप देगा। रात के शांत पहाड़ी वातावरण में जब गोगा जाहरवीर के जयकारे गूंजेंगे तो यह दृश्य शिलाई की लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करेगा।
शिलाई की गोगा नवमी महज एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि 52 गांवों को एक सूत्र में बांधने वाली लोक परंपरा है। गोगा की छड़ियों की यात्रा, श्रद्धालुओं की आस्था, माड़ी का जागरण और सर्पदंश से रक्षा का लोकविश्वास ये सभी मिलकर इस पर्व को शिलाई की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बनाते हैं। बदलते दौर में भी जब हजारों लोग इस परंपरा के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं, तो यह साफ दिखाई देता है कि लोक आस्था की जड़ें आज भी पहाड़ की मिट्टी में उतनी ही गहरी हैं।