करवा चौथ आज: पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए सुहागिनें रखेंगी व्रत

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चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद खुलेगा व्रत, वीरवती और माता करवा की कथा सुनने का विशेष महत्व

  *देवभूमि न्यूज 24*

करवा चौथ का पर्व हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा-अर्चना करती हैं। रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत खोलने की परंपरा है।

वर्ष 2026 में करवा चौथ का पर्व 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जा रहा है। इस अवसर पर महिलाएं सोलह श्रृंगार कर पूजा की तैयारी करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा दांपत्य जीवन में प्रेम और विश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं।

करवा चौथ व्रत का स्वरूप और परंपरा

करवा चौथ को करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। परंपरागत रूप से महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत आरंभ करती हैं। इसके बाद दिनभर अन्न-जल का त्याग कर व्रत रखा जाता है। हालांकि, व्रत की विधि और परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।

शाम के समय महिलाएं विधि-विधान से पूजा करती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं। इसके बाद चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य अर्पित किया जाता है। चंद्र दर्शन के पश्चात पति के हाथों से जल ग्रहण कर व्रत खोलने की परंपरा प्रचलित है।

वीरवती की कथा से जुड़ी है करवा चौथ की परंपरा

करवा चौथ के अवसर पर वीरवती की कथा सुनने की विशेष परंपरा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरवती था। विवाह के बाद जब वीरवती अपने मायके आई, तो उसने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा।

दिनभर भूखी-प्यासी रहने के कारण शाम तक वीरवती की तबीयत बिगड़ने लगी। अपनी बहन की परेशानी देखकर उसके भाइयों ने उसे भोजन कराने के उद्देश्य से एक उपाय किया। उन्होंने दूर एक पेड़ के पीछे दीपक जलाकर छलनी की सहायता से ऐसा दृश्य बनाया, मानो चंद्रमा निकल आया हो।

भाइयों ने वीरवती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है और वह अर्घ्य देकर व्रत खोल सकती है। भाभियों ने उसे समझाने का प्रयास किया कि यह चंद्रमा नहीं, बल्कि भाइयों द्वारा रचा गया दृश्य है। लेकिन वीरवती ने उनकी बात नहीं मानी और व्रत खोल लिया।

लोकप्रिय कथा के अनुसार, भोजन का पहला निवाला लेते ही उसे अपने पति के अनिष्ट का समाचार मिला। यह सुनकर वीरवती दुखी हो गई और उसने माता पार्वती से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। उसने पूरे वर्ष श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत किया। अगले करवा चौथ पर उसकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उसके पति को जीवनदान दिया। इस प्रकार वीरवती को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

यह कथा श्रद्धा, संयम और व्रत के प्रति निष्ठा का संदेश देती है।

माता करवा की कथा भी है प्रचलित

करवा चौथ के अवसर पर माता करवा की कथा भी श्रद्धापूर्वक सुनी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, करवा नामक एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। एक दिन जब उसका पति नदी में स्नान कर रहा था, तभी एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। संकट में पड़े पति ने करवा को पुकारा।

कथा के अनुसार, करवा ने अपने पतिव्रता धर्म की शक्ति से मगरमच्छ को बांध दिया और यमराज के पास पहुंचकर अपने पति के प्राणों की रक्षा की प्रार्थना की। उसकी निष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने उसके पति को जीवनदान दिया और मगरमच्छ को दंडित किया।

यह कथा पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना को दर्शाती है।

प्रेम, विश्वास और सौभाग्य का प्रतीक है करवा चौथ

करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारिवारिक एकता का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक वस्त्र धारण कर सोलह श्रृंगार करती हैं और माता पार्वती तथा करवा माता से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

आधुनिक समय में इस पर्व को पति-पत्नी के पारस्परिक सम्मान, सहयोग और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी के भाव से भी जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाने वाला यह त्योहार भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है।

लेखक: ज्यों. शैलेन्द्र सिंगला
पलवल,हरियाणा
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान

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साभार: ज्योतिषाचार्य शैलेन्द्र सिंगला, पलवल, हरियाणा
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान