कार्तिक माहात्म्य – दूसरा अध्याय

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कार्तिक मास के व्रत, तुलसी पूजन और दीपदान का महात्म्य

 *देवभूमि न्यूज 24*

सिमर चरण गुरुदेव के, लिखूं शब्द अनूप।
कृपा करें भगवान, सत्-चित्-आनंद स्वरूप।।

गुणवती की भक्ति और भगवान विष्णु की कृपा

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा—हे प्रिये! जब गुणवती को राक्षस द्वारा उसके पति और पिता के मारे जाने का समाचार मिला, तो वह अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगी। वह करुण स्वर में कहने लगी, “हे नाथ! हे पिताजी! मुझे अकेला छोड़कर आप कहां चले गए? अब मैं आपके बिना कैसे जीवन व्यतीत करूंगी? मेरे भोजन, वस्त्र और जीवन-यापन की व्यवस्था कौन करेगा? मेरा पालन-पोषण कौन करेगा और इस संसार में मेरी रक्षा कौन करेगा? अब मेरे पास न कोई सहारा है और न ही कोई ठिकाना।”

इस प्रकार विलाप करते-करते गुणवती शोक से व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ी और मूर्छित हो गई। बहुत समय बाद जब उसे होश आया, तो वह पुनः अपने पति और पिता को याद करके रोने लगी।

कुछ समय पश्चात जब उसका मन थोड़ा शांत हुआ, तो उसे अपने पति और पिता के अंतिम संस्कार तथा श्राद्ध आदि कर्म करने का विचार आया। उसने अपने घर का समस्त सामान बेच दिया और उससे प्राप्त धन से दोनों के निमित्त आवश्यक धार्मिक कर्म संपन्न किए।

इसके बाद गुणवती उसी नगर में रहकर निरंतर भगवान विष्णु की भक्ति करने लगी। वह प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक भगवान का स्मरण करती और मृत्युपर्यंत नियमपूर्वक एकादशी के व्रत रखती रही। कार्तिक मास में भी वह पूरी निष्ठा से स्नान, व्रत, उपवास और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करती थी।

भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है कार्तिक मास

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा हे प्रिये! एकादशी का व्रत और कार्तिक मास का व्रत मुझे अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन व्रतों के पालन से मनुष्य को भक्ति, सुख-समृद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है।

जब सूर्य तुला राशि में स्थित होता है, तब कार्तिक मास में ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान, जप, तप, व्रत और भगवान का स्मरण करने वाले भक्त मुझे विशेष प्रिय होते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक अनुष्ठान मनुष्य के पापों का क्षय करने और उसके जीवन को पवित्र बनाने में सहायक होते हैं।

कार्तिक मास में प्रातःकाल स्नान, रात्रि में जागरण, दीपदान तथा तुलसी के पौधे की सेवा का विशेष महत्व बताया गया है। इस महीने में भगवान विष्णु के मंदिर में स्वच्छता करना, मंदिर में स्वस्तिक बनाना और श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करना भी पुण्यदायी माना जाता है।

जो मनुष्य इस पवित्र महीने में श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ भगवान विष्णु की आराधना करता है, वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है।

गुणवती को मिला भक्ति का फल

भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा—हे प्रिये! गुणवती भी इन धार्मिक उपदेशों को सुनकर प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक कार्तिक मास का व्रत करने लगी और भगवान विष्णु की आराधना में लीन रहने लगी।

एक बार वह ज्वर से पीड़ित हो गई और उसका शरीर अत्यंत कमजोर हो गया। इसके बावजूद उसके मन में गंगा स्नान करने की प्रबल इच्छा थी। वह कठिनाई से गंगा तट तक पहुंची, लेकिन अत्यधिक ठंड के कारण उसका शरीर कांपने लगा और वह बहुत अशक्त हो गई।

तब भगवान विष्णु के दूत उसे अपने साथ भगवान के परम धाम में ले गए।

समय बीतने पर जब ब्रह्मा सहित अन्य देवताओं की प्रार्थना से भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया, तो उनके पार्षद भी उनके साथ पृथ्वी पर आए और यादव कुल में जन्म लिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि तुम्हारे पिता पूर्वजन्म में देवशर्मा थे, जो इस जन्म में सत्राजित हुए। तुम्हारा पति पूर्वजन्म में चंद्र शर्मा था, जो इस जन्म में डाकू के रूप में जन्मा। हे देवि! तुम ही पूर्वजन्म की गुणवती हो। कार्तिक मास में किए गए व्रत और भगवान विष्णु की आराधना के पुण्य से ही तुम्हें इस जन्म में मेरी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

तुलसी रोपण और दीपदान का पुण्य

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को उसके पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों का स्मरण कराते हुए कहा कि पूर्वजन्म में तुमने मेरे मंदिर के द्वार पर तुलसी का पौधा लगाया था। उसी पुण्य के प्रभाव से इस जन्म में तुम्हारे महल के आंगन में कल्पवृक्ष विद्यमान है।

तुमने पूर्वजन्म में भगवान के समक्ष दीपदान किया था। उसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हें सुंदर रूप और सुख-समृद्धि प्राप्त हुई। तुम्हारे घर में लक्ष्मी का वास भी तुम्हारे पूर्वजन्म के शुभ कर्मों का फल है।

भगवान ने आगे कहा कि पूर्वजन्म में तुमने अपने व्रतों का फल भगवान विष्णु को अर्पित किया था। उसी समर्पण और भक्ति के प्रभाव से इस जन्म में तुम मेरी प्रिय पत्नी बनी हो।

तुमने पूर्वजन्म में जिस श्रद्धा और नियम से कार्तिक मास का व्रत किया था, उसी के पुण्य से हमारा संबंध अटूट हुआ। इसलिए कार्तिक मास में श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजन, स्नान और दीपदान करने वाले भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, कार्तिक मास में किए गए व्रत और भक्ति का फल अत्यंत महान होता है। इस माह में श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक कार्यों की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि इनका पुण्य अन्य अनेक धार्मिक अनुष्ठानों के फल से भी श्रेष्ठ माना गया है।

सत्यभामा ने जाना पूर्वजन्म के पुण्य का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण के मुख से अपने पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों और कार्तिक व्रत के प्रभाव का वर्णन सुनकर सत्यभामा अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्हें यह जानकर आश्चर्य और आनंद हुआ कि पूर्वजन्म में श्रद्धापूर्वक किए गए व्रत, तुलसी रोपण, दीपदान और भगवान विष्णु की आराधना ने उन्हें इस जन्म में इतना महान सौभाग्य प्रदान किया।

इस प्रकार कार्तिक माहात्म्य का यह अध्याय हमें संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा, निष्ठा, सेवा और ईश्वर के प्रति समर्पण का जीवन में विशेष महत्व है।

कार्तिक मास की कथा से मिलने वाली शिक्षा

कार्तिक मास हिंदू धर्म में भक्ति, पवित्रता, संयम और साधना का विशेष पर्व माना जाता है। इस महीने में भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी सेवा, दीपदान, प्रातःकाल स्नान और एकादशी व्रत जैसी परंपराओं का विशेष महत्व है।

इस अध्याय से हमें तीन प्रमुख संदेश मिलते हैं

  1. भक्ति में अटूट विश्वास: परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, ईश्वर के प्रति श्रद्धा और विश्वास मनुष्य को मानसिक संबल प्रदान करते हैं।
  2. सेवा और शुभ कर्मों का महत्व: तुलसी की सेवा, दीपदान, पूजा-अर्चना और जरूरतमंदों की सहायता जैसे सत्कर्म जीवन में सद्भाव और सकारात्मकता का संदेश देते हैं।
  3. समर्पण का भाव: अपने कर्मों को अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर को समर्पित करना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण संदेश है।

अतः कार्तिक मास में श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु का स्मरण करें, तुलसी माता की सेवा करें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दीपदान तथा दान-पुण्य करें। यही इस पवित्र माह की धार्मिक भावना और आध्यात्मिक संदेश है।

*॥ श्रीहरिः शरणम् ॥*

लेखक: ज्यो.शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान

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