कहानीकार : राजीव शर्मा ‘शर्मन्’, अम्बिकानगर-अम्ब, जिला ऊना (हिमाचल प्रदेश)
*देवभूमि न्यूज 24*
मनुष्य का जीवन संघर्षों, अनुभवों और उपलब्धियों का ऐसा सफर है, जिसमें कभी परिस्थितियां उसकी परीक्षा लेती हैं तो कभी उसकी मेहनत नई राहें खोलती है। आर्थिक अभावों के बीच भी यदि परिवार में संस्कार, शिक्षा और परिश्रम का दीपक जलता रहे तो एक दिन वही परिवार सफलता की नई मिसाल बन सकता है। बल्ह घाटी के भंगरोटू स्कूल से जुड़ी यह कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक यात्रा को दर्शाती है।
भंगरोटू स्कूल से शास्त्री जी का वर्षों तक जुड़ाव एक यादगार प्रसंग रहा। स्कूल का समूचा स्टाफ शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए टीम भावना से समर्पित रहता था। मंडी-सुंदरनगर मुख्य मार्ग पर स्थित यह विद्यालय वर्ष 1905 में अस्तित्व में आया था। उस समय भंगरोटू एक छोटा और पिछड़ेपन से जूझता गांव हुआ करता था। विद्यालय का अधिकांश स्टाफ मंडी और सुंदरनगर से आता था। शास्त्री जी प्रतिदिन मंडी से साइकिल पर विद्यालय पहुंचते थे। सहकर्मियों के साथ उनका आत्मीय व्यवहार और आपसी सहयोग पूरे क्षेत्र में चर्चित था।
समय बीतता गया, लेकिन शास्त्री जी की यादें उनके विद्यार्थियों और समकालीनों के दिलों में आज भी जीवित हैं। भंगरोटू स्कूल से शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक विद्यार्थी आगे चलकर शिक्षक बने और कुछ तो इसी विद्यालय में अपनी सेवाएं देने लगे।
इसी विद्यालय में महन्त राम नाम के एक अत्यंत मेहनती, शरीफ और नेकदिल अध्यापक भी कार्यरत थे। उन्होंने सैकड़ों विद्यार्थियों को शिक्षा का अमूल्य धन दिया, लेकिन अपने बेटे गोविन्द सिंह को पढ़ाई में आगे नहीं बढ़ा पाए। तमाम प्रयासों के बावजूद गोविन्द सातवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका। आदर्श अध्यापक होने के नाते महन्त राम किसी प्रकार की सिफारिश या अनुचित तरीके से बेटे को अगली कक्षा में पहुंचाना नहीं चाहते थे। आखिरकार उन्होंने गोविन्द को उसकी रुचि के अनुसार काम करने के लिए छोड़ दिया।
घर में पशुधन काफी था, इसलिए गोविन्द पशु चराने लगा। ग्रामीण रीति-रिवाजों के अनुसार कम उम्र में ही उसका विवाह कर दिया गया। परिवार की आर्थिक जरूरतों ने उसे मंडी शहर पहुंचा दिया, जहां उसने लाहौरी टेलर मास्टर के पास दर्जी का काम सीखना शुरू किया। मेहनत खूब थी, लेकिन आमदनी बहुत कम। महन्त राम एक आदर्श शिक्षक के रूप में भंगरोटू स्कूल से सेवानिवृत्त हुए।
भंगरोटू स्कूल की यादगार घटनाएं
उस समय भंगरोटू स्कूल बल्ह घाटी के बड़े शिक्षण संस्थानों में गिना जाता था। बाद में जब यह वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बना तो बाहर से भी अनेक शिक्षक यहां नियुक्त हुए। इनमें बिलासपुर के सुशील पुंडीर, होशियारपुर के ओंकार दास और ऊना के शाहबेग सिंह सहित कई अध्यापक शामिल थे।
विद्यालय का वातावरण अनुशासन, आपसी सहयोग और हास-परिहास से भरपूर रहता था। एक दिन संगीत अध्यापक रामकृष्ण जी विद्यालय में देर से पहुंचे। वे विद्यार्थियों को संगीत और योगाभ्यास भी सिखाते थे। सुबह की प्रार्थना सभा में उनकी उपस्थिति आवश्यक रहती थी, लेकिन कई दिनों से उनकी लेटलतीफी चर्चा का विषय बनी हुई थी।
पुस्तकालय प्रभारी चुनीलाल ने उन्हें बताया कि प्रधानाचार्य हुक्म सिंह उनकी देरी से आने की आदत से नाराज हैं। इतने में सेवादार भीख्मू देवी भी संदेश लेकर पहुंच गईं कि प्रधानाचार्य ने उन्हें कार्यालय में बुलाया है।
रामकृष्ण जी कार्यालय की ओर बढ़े तो वहां जीव विज्ञान के प्रवक्ता जगजीत राणा भी मौजूद थे। प्रधानाचार्य हुक्म सिंह स्टाफ के अन्य सदस्यों के साथ बातचीत कर रहे थे। उनकी नजर जगजीत राणा पर पड़ी तो उन्होंने आवाज लगाई, “राणा जी, जरा रुकिए! आप रोज स्कूल देरी से क्यों आ रहे हैं?”
जगजीत राणा ने जवाब दिया, “हजूर, मोटरसाइकिल पंचर हो गई थी।”
प्रधानाचार्य ने कहा, “यह तो आपका रोज का बहाना हो गया है। सुना है आपने हल्दी वाले महाजन से किराये पर मकान लिया है और सुबह-शाम अतिरिक्त समय में विज्ञान की ट्यूशन भी पढ़ाते हैं।”
इतने में शारीरिक शिक्षा शिक्षक मस्तराम सहित अन्य कर्मचारी जोर-जोर से हंसने लगे। प्रधानाचार्य ने हंसने का कारण पूछा तो मस्तराम ने मजाकिया अंदाज में कहा, “हजूर, बेचारा घर का सताया हुआ है। सालियों का लाग दिया नहीं, बिना बूट के ही स्कूल आया है!”
सभी की नजरें जगजीत राणा के पैरों की ओर गईं। वे शानदार सफारी सूट और टाई पहने हुए थे, लेकिन पैरों में साधारण वी-शेप की चप्पल थी। जल्दबाजी में वे जूते पहनना ही भूल गए थे।
अपनी गलती का अहसास होते ही राणा जी वहां से भाग खड़े हुए। प्रधानाचार्य आवाज लगाते रहे कि एक दिन का वेतन काट दूंगा, वापस आ जाओ, लेकिन वे छोटे स्कूल गेट से बाहर निकल गए। पूरा स्टाफ ठहाके लगाने लगा। प्रधानाचार्य हुक्म सिंह भी अपनी हंसी नहीं रोक सके।
इस हास्यप्रद घटना में संगीत अध्यापक रामकृष्ण जी भी अपनी लेटलतीफी के सवाल से बाल-बाल बच निकले।
आर्थिक अभावों में गोविन्द का संघर्ष
इसी बीच विद्यालय में कुम्मी गांव का गोविन्द अपनी बेटी शालू की छात्रवृत्ति की राशि लेने पहुंचा। वह बेहद मेहनती व्यक्ति था। मंडी के भूतनाथ बाजार में लाहौरी टेलर मास्टर के यहां दर्जी का काम करते हुए उसने जीवन के कई कठिन दौर देखे थे।
कारीगर को एक कमीज सिलने के दस रुपये, पैंट के बीस रुपये और कोट-पैंट के पूरे सूट के मुश्किल से पचास रुपये मिलते थे। पूरा महीना मेहनत करने के बाद भी एक हजार से बारह सौ रुपये तक ही जुड़ पाते थे। कई बार रात को भी काम करना पड़ता था। ऊपर से कुम्मी से मंडी आने-जाने का बस किराया भी उसके लिए बड़ा खर्च था।
घर पर बूढ़े माता-पिता की जिम्मेदारी और बच्चों की पढ़ाई का बोझ भी उसी के कंधों पर था। उसकी बेटी शालू पढ़ाई में बेहद होशियार थी। गणित की प्रवक्ता इन्द्राणी कपूर भी उसकी प्रतिभा को पहचानती थीं और पढ़ाई में सहयोग करती थीं।
शालू ने अपनी मेहनत के दम पर मिडिल, मैट्रिक और प्लस वन की पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन किया। वह छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ाकर पिता की आर्थिक मदद भी करने लगी। उसका सपना उच्च शिक्षा हासिल करना था।
गोविन्द का बेटा हितेश भी दसवीं कक्षा में पहुंच चुका था। उसका ननिहाल भंगरोटू में होने के कारण दोनों बच्चों को नाना-नानी और मामा-मामी का सहयोग मिलता रहता था। ननिहाल की उपजाऊ जमीन से परिवार को अनाज की जरूरत पूरी करने में भी मदद मिलती थी।
गुरु रामकृष्ण की छत्रछाया में संगीत का सफर
हितेश को भंगरोटू स्कूल के संगीत अध्यापक रामकृष्ण जी से विशेष लगाव था। विद्यालय की प्रातःकालीन सभा में गुरुजी जब भजन और प्रार्थनाएं गाते तो हितेश पूरी तल्लीनता से उन्हें सुनता, समझता और आत्मसात करता था।
गुरुजी का एक प्रिय भजन था
करो हरि-राम का सुमिरन, अगर मुक्ति को पाना है। अरे प्राणी, ये वो घर है, जिसे एक दिन छोड़ जाना है।
कई बार गुरुजी हारमोनियम बजाते और भजन की प्रस्तुति का पूरा दायित्व हितेश को सौंप देते थे। धीरे-धीरे गुरुजी के मार्गदर्शन में हितेश संगीत की बारीकियां सीखने लगा। उसकी प्रतिभा निखरती गई और उसने राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की संगीत प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से हितेश ने संगीत को ही अपनी आजीविका का माध्यम बनाने का निर्णय लिया। उसने हारमोनियम, तबला, ढोलक, सितार, गिटार और बांसुरी जैसे वाद्ययंत्रों में दक्षता हासिल की। इसी दौरान उसने माता हाटेश्वरी संगीत मंडल की स्थापना की।
संगीत मंडल के माध्यम से वह जगरातों, धार्मिक आयोजनों और युवा सांस्कृतिक उत्सवों में प्रस्तुतियां देने लगा। सुंदरनगर के हरि बल्लभ संगीत सम्मेलन में बड़े-बड़े संगीत उस्तादों से मुलाकात ने उसके हुनर को और निखारा। उसने शास्त्रीय संगीत में भी महारत हासिल की और टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले भागवत, रामकथा तथा अन्य संगीतमय कार्यक्रमों में भाग लेने लगा।
धीरे-धीरे हितेश ने संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बना ली। उसकी मेहनत रंग लाई और परिवार की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होने लगा।
शालू ने भी हासिल की इंजीनियरिंग की मंजिल
दूसरी ओर शालू ने भी अपनी पढ़ाई जारी रखी। उसने सुंदरनगर के एमएल सेन मेमोरियल कॉलेज से बीएससी नॉन मेडिकल की पढ़ाई की। इसके बाद उसका चयन बेंगलुरु के इंजीनियरिंग कॉलेज में सिविल इंजीनियरिंग की ट्रेनिंग के लिए हो गया।
गोविन्द सिंह ने अपनी जमा-पूंजी बेटी की शिक्षा और प्रशिक्षण पर लगा दी। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उसने बेटी के सपनों को टूटने नहीं दिया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद शालू ने बद्दी-सोलन की एक निजी कंपनी में नौकरी शुरू की।
हितेश ने भी अपने संगीत के सपनों को आगे बढ़ाने के लिए मुंबई का रुख किया। मायानगरी में बड़े संगीतकारों के सानिध्य में उसने फिल्मों में सहयोगी संगीतकार के रूप में काम किया और धीरे-धीरे अपनी पहचान स्थापित की।
समय के साथ हितेश ने मुंबई के विले पार्ले-जुहू क्षेत्र में अपना फ्लैट खरीद लिया। उसका विवाह प्रसिद्ध अभिनेत्री एवं मॉडल टीना पंडित से हुआ। वहीं शालू को भी गैमन इंडिया के इंजीनियर सुबोध सक्सेना के रूप में जीवनसाथी मिला।
बल्ह घाटी के विकास का सपना
शालू ने अपने व्यक्तिगत जीवन में सफलता हासिल करने के साथ-साथ अपनी जन्मभूमि बल्ह घाटी के विकास के लिए भी योजनाएं बनाईं। उसने क्षेत्र में सड़कों के विस्तार, पुरानी सड़कों को चौड़ा करने और ब्रॉडगेज रेलवे लाइन के विस्तार से जुड़े सुझावों का एक विस्तृत खाका तैयार किया। इसमें बल्ह घाटी में रेलवे जंक्शन विकसित करने की परिकल्पना भी शामिल थी। यह प्रस्ताव प्रदेश की नई सरकार को आगामी आवश्यक कार्रवाई और क्रियान्वयन के लिए भेजा गया।
बल्ह घाटी की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को गोविन्द सिंह ने बहुत करीब से देखा था। कुम्मी से गागल और सकरोहा पुल घराट होते हुए मंडी तक पैदल या कठिन साधनों से सफर करने की उसकी पुरानी यादें आज भी उसके मन में थीं।
क्षेत्र की सुकेती खड्ड और ब्यास नदी से जुड़े पर्यावरणीय तथा कृषि संबंधी मुद्दों ने भी लंबे समय तक स्थानीय लोगों को प्रभावित किया। सुकेती खड्ड में गाद की समस्या को लेकर बल्ह घाटी के किसानों ने आंदोलन किए। गोविन्द के चाचा अमर सिंह ने भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभाई। तत्कालीन विधायक दामोदर दास सहित स्थानीय लोगों ने इस समस्या के समाधान के लिए आवाज उठाई। गागल के हरिसिंह और सकरोहा के मियां कश्मीर सिंह जैसे लोगों ने भी क्षेत्र के भविष्य को लेकर अपने विचार रखे।
मियां कश्मीर सिंह का विचार था कि सुकेती खड्ड के दोनों किनारों पर ब्रॉडगेज रेलवे लाइन विकसित करने की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए, जिससे मंडी, सुंदरनगर, हमीरपुर और बिलासपुर के बीच रेल संपर्क को विस्तार मिल सके। उस समय यह विचार कई लोगों को कल्पनात्मक लगा, लेकिन समय के साथ क्षेत्र में रेल विस्तार की चर्चाओं ने इस तरह की योजनाओं को नई प्रासंगिकता प्रदान की।
संघर्ष की सफलता पर गौरवान्वित हुआ पिता
गोविन्द सिंह ने जीवन में आर्थिक तंगी के अनेक थपेड़े सहे थे। उसने अपने माता-पिता की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी, हालांकि बीमारी के चलते उन्हें बचा नहीं सका। इसके बावजूद उसे इस बात का संतोष था कि उसने अपनी सामर्थ्य के अनुसार परिवार के प्रति सभी जिम्मेदारियां निभाईं और बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर दिया।
एक समय था जब वह रोजी-रोटी के लिए कुम्मी से मंडी तक लंबा सफर करता था। आज उसी परिवार के बेटे ने संगीत की दुनिया में और बेटी ने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी। यह उपलब्धि गोविन्द के लिए किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं थी।
अपने बच्चों की कामयाबी पर उसने बल्ह घाटी स्थित अपने पैतृक गांव कुम्मी में एक भव्य दावत का आयोजन किया। इस अवसर पर मुंबई से फिल्मी कलाकार और संगीत जगत से जुड़े कई प्रतिष्ठित लोग हितेश के साथ पहुंचे। भंगरोटू स्कूल के पुराने शिक्षकों और कर्मचारियों को भी विशेष रूप से आमंत्रित किया गया।
कार्यक्रम में जगजीत राणा, माधुरी, रवि, ब्रेस्तू राम, भीम सिंह, मान सिंह प्रवक्ता और सेवानिवृत्त सुपरिंटेंडेंट चमारू राम सहित पुराने स्टाफ के कई सदस्य उपस्थित रहे।
गोविन्द सिंह, हितेश और शालू अपने परिवारों के साथ सभी अतिथियों की आवभगत में जुटे थे। हर कोई गोविन्द को उसके बच्चों की उपलब्धियों पर बधाई दे रहा था और शगुन के रूप में उपहार भेंट कर रहा था।
तभी एक पुराना मजेदार प्रसंग फिर से जीवंत हो उठा। जगजीत राणा जी उपहार का पैकेट देकर बिना भोजन किए ही बाहर निकलने लगे। पुराने सहकर्मी उनकी भुलक्कड़ आदत से परिचित थे। उन्होंने उन्हें घेर लिया और हंसते हुए कहा, “राणा जी! हमारे साथ दावत खाए बिना कैसे जा सकते हैं? स्कूल में चुपचाप लेटलतीफी से आने-जाने वाला आपका पुराना सिद्धांत यहां लागू नहीं होगा!”
यह सुनते ही सभी पुराने साथी खिलखिलाकर हंस पड़े। जगजीत राणा जी भी अपनी पुरानी यादों में खोकर मुस्करा उठे।
उधर मंच पर मुंबई से आए कलाकारों की मनभावन संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों ने समारोह में चार चांद लगा दिए। संगीत की धुनों और सांस्कृतिक रंगों से पूरा वातावरण आनंदमय हो उठा।
संदेश : मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती
गोविन्द सिंह की आंखों में संतोष और गर्व झलक रहा था। जिस बेटे को कभी संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने के लिए गुरु का सहारा मिला, उसने अपनी प्रतिभा से परिवार का नाम रोशन किया। जिस बेटी ने आर्थिक अभावों के बीच ट्यूशन पढ़ाकर पिता का हाथ बंटाया, उसने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपनी मंजिल हासिल की।
भंगरोटू स्कूल की शिक्षा, गुरु रामकृष्ण का मार्गदर्शन, पिता का संघर्ष और बच्चों की लगन इस कहानी के चार मजबूत स्तंभ बनकर सामने आते हैं।
बल्ह घाटी का यह परिवार आज इस बात का प्रतीक है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, शिक्षा, संस्कार, परिश्रम और दृढ़ संकल्प के सहारे सफलता की नई इबारत लिखी जा सकती है।
वास्तव में हितेश और शालू केवल गोविन्द सिंह के परिवार के चमकते सितारे नहीं, बल्कि अपनी जन्मभूमि बल्ह घाटी के लिए भी प्रेरणा के उज्ज्वल प्रतीक हैं।
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