सावित्री और सत्यवान : पतिव्रता धर्म, अटूट प्रेम, संकल्प और बुद्धिमत्ता का अनुपम उदाहरण-ममता सक्सेना

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देवभूमि न्यूज 24

भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में सावित्री और सत्यवान की कथा नारी के अटूट प्रेम, दृढ़ संकल्प, त्याग और बुद्धिमत्ता का अनुपम उदाहरण मानी जाती है। यह कथा बताती है कि सच्चे प्रेम, धर्म के प्रति निष्ठा और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने से असंभव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों का भी सामना किया जा सकता है।

बहुत समय पहले मद्र देश में अश्वपति नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की कामना से उन्होंने 18 वर्षों तक देवी सावित्री की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें तेजस्वी कन्या प्राप्त होने का वरदान दिया। कुछ समय बाद उनके घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया।

सावित्री बचपन से ही अत्यंत सुंदर, गुणवान, बुद्धिमती और संस्कारी थी। जब वह विवाह योग्य हुई तो राजा अश्वपति ने उसे अपनी पसंद से वर चुनने की स्वतंत्रता दी। पिता की आज्ञा पाकर सावित्री अपने मंत्री और सैनिकों के साथ योग्य वर की तलाश में निकल पड़ी।

इसी यात्रा के दौरान वह एक वन में पहुंची, जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के परिवार से हुई। द्युमत्सेन शत्रुओं के हाथों अपना राज्य गंवा चुके थे और नेत्रहीन होकर पत्नी तथा पुत्र सत्यवान के साथ वन में जीवन व्यतीत कर रहे थे।

सत्यवान अत्यंत धर्मात्मा, तेजस्वी, विनम्र और सत्यवादी युवक था। उसे देखते ही सावित्री ने मन ही मन उसे अपना जीवनसाथी चुन लिया।

जब सावित्री अपने पिता के पास लौटी तो वहां देवर्षि नारद भी उपस्थित थे। उन्होंने सत्यवान के गुणों की प्रशंसा करते हुए बताया कि वह अत्यंत योग्य युवक है, लेकिन उसकी आयु बहुत कम है। आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु निश्चित है।

यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो उठे। उन्होंने अपनी पुत्री को दूसरा वर चुनने की सलाह दी, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही।

उसने दृढ़ स्वर में कहा, “पिताजी! आर्य कन्या अपने जीवन में एक बार ही पति का चयन करती है। मैंने सत्यवान को अपना पति स्वीकार कर लिया है। उसकी आयु चाहे एक वर्ष हो या सौ वर्ष, मैं अपने निर्णय से पीछे नहीं हटूंगी।”

बेटी की दृढ़ता देखकर राजा अश्वपति ने उसकी इच्छा स्वीकार कर ली और सावित्री का विवाह सत्यवान से संपन्न हो गया।

पति की सेवा और कठिन व्रत का संकल्प

विवाह के बाद सावित्री राजमहल के सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपने पति के साथ वन में रहने लगी। वह अपने अंधे सास-ससुर और पति की सेवा में पूरी निष्ठा से जुट गई। उसके मन में देवर्षि नारद की भविष्यवाणी हमेशा बनी रहती थी।

समय बीतता गया और सत्यवान की मृत्यु का निर्धारित दिन निकट आने लगा। सावित्री ने उस दिन से तीन दिन पूर्व ही कठोर व्रत और उपवास का संकल्प लिया।

आखिर वह दिन भी आ गया, जिसका उसे भय था। सत्यवान लकड़ियां काटने के लिए जंगल जाने लगा तो सावित्री ने भी उसके साथ चलने की इच्छा जताई। सत्यवान के मना करने पर भी वह साथ जाने की जिद पर अड़ी रही।

वन में लकड़ियां काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज पीड़ा होने लगी। वह असहाय होकर सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया।

तभी सावित्री ने देखा कि एक दिव्य पुरुष हाथ में पाश लिए वहां प्रकट हुए। वे स्वयं धर्मराज यम थे।

यमराज ने सावित्री से कहा, “हे सावित्री! सत्यवान की आयु पूर्ण हो चुकी है। मैं इसके प्राण लेने आया हूं।”

इतना कहकर यमराज ने सत्यवान के शरीर से उसके अंगूठे के बराबर सूक्ष्म जीव को पाश में बांधा और दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

सावित्री की बुद्धिमत्ता के आगे यमराज भी हुए प्रसन्न

अपने पति के प्राण लेकर जाते यमराज को देखकर सावित्री भी उनके पीछे चलने लगी।

यमराज ने उसे समझाया कि अब उसे वापस लौट जाना चाहिए, क्योंकि मनुष्य की मृत्यु के बाद उसका साथ देना संभव नहीं है।

सावित्री ने विनम्रता से कहा, “हे धर्मराज! जहां मेरे पति जा रहे हैं, वहां तक उनके पीछे चलना मेरा धर्म है। सत्पुरुषों की संगति कभी व्यर्थ नहीं जाती। आप धर्म के ज्ञाता हैं, इसलिए आपके साथ चलकर धर्म की बातें सुनना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात है।”

सावित्री की धर्मनिष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे वरदान मांगने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह सत्यवान के जीवन के अतिरिक्त कोई भी वर मांग सकती है।

सावित्री ने कहा, “हे धर्मराज! मेरे ससुर नेत्रहीन हैं। उन्हें पुनः नेत्रों की ज्योति प्राप्त हो और उनका खोया हुआ राज्य भी वापस मिल जाए।”

यमराज ने तथास्तु कहकर पहला वरदान दे दिया।

लेकिन सावित्री उनके पीछे चलती रही। उसकी निष्ठा देखकर यमराज ने फिर उसे लौट जाने के लिए कहा और दूसरा वर मांगने को कहा।

इस बार सावित्री ने अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्रों की प्राप्ति का वरदान मांगा। यमराज ने प्रसन्न होकर उसे भी तथास्तु कह दिया।

इसके बाद भी सावित्री पीछे चलती रही। यमराज ने तीसरी बार उसे वर मांगने का अवसर दिया।

सावित्री ने कहा, “हे धर्मराज! मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों की प्राप्ति का आशीर्वाद दीजिए।”

यमराज ने बिना विचार किए तथास्तु कह दिया।

तभी सावित्री ने विनम्रता से कहा, “हे धर्मराज! आपने मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया है। किंतु पति के बिना यह वरदान कैसे पूरा होगा? इसलिए धर्म की मर्यादा बनाए रखने के लिए आपको मेरे पति के प्राण लौटाने होंगे।”

सावित्री की बुद्धिमत्ता, अटूट प्रेम और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए।

उन्होंने कहा, “हे पतिव्रते! तुम्हारा पति पुनः जीवित होगा। वह दीर्घायु होगा और तुम्हें सौ पुत्रों की प्राप्ति होगी। तुम्हारा सौभाग्य सदैव अखंड बना रहे।”

सावित्री के प्रेम और संकल्प की हुई विजय

यमराज से वरदान प्राप्त कर सावित्री वापस उसी स्थान पर पहुंची, जहां सत्यवान का शरीर पड़ा था। कुछ ही क्षणों में सत्यवान ऐसे उठ बैठा, जैसे गहरी नींद से जागा हो।

दोनों प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रम लौटे। वहां उन्होंने देखा कि सत्यवान के माता-पिता की आंखों की ज्योति वापस आ चुकी है और उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें पुनः प्राप्त हो गया है।

इस प्रकार सावित्री ने अपने धैर्य, बुद्धिमत्ता, प्रेम और दृढ़ संकल्प से अपने पति के जीवन की रक्षा की तथा अपने ससुराल और मायके दोनों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

कथा का आध्यात्मिक संदेश

सावित्री और सत्यवान की यह पौराणिक कथा भारतीय नारी के त्याग, समर्पण, साहस और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि जीवन में कठिन से कठिन परिस्थिति आने पर भी धैर्य, विवेक और विश्वास का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

सावित्री का चरित्र केवल पतिव्रता धर्म का ही नहीं, बल्कि नारी की अदम्य इच्छाशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता का भी परिचायक है।

इसी कथा को अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक मानकर भारतीय परंपरा में वट सावित्री व्रत रखा जाता है। वहीं करवा चौथ का व्रत भी पति की दीर्घायु, दांपत्य सुख और पारिवारिक मंगल की कामना से किया जाता है।

सावित्री की कथा का सार यही है कि सच्चा प्रेम केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसमें त्याग, विश्वास, साहस, विवेक और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प भी समाहित होता है।

सावित्री-सत्यवान की पावन कथा से सभी के जीवन में प्रेम, विश्वास, सुख-शांति और अखंड सौभाग्य का मंगलमय संदेश पहुंचे।

स्वरचित एवं मौलिक प्रस्तुति ममता सक्सेना चित्रांश कोसीकलां, मथुरा (उत्तर प्रदेश)

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