रिश्ता टूटने के बाद आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने के चलन पर अदालत ने जताई चिंता, कहा- सहमति और धोखे के मामलों में अंतर करना जरूरी
देवभूमि न्यूज 24
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी रिश्ते के दौरान आपसी सहमति से बने यौन संबंध को केवल इस आधार पर दुष्कर्म नहीं माना जा सकता कि बाद में दोनों के बीच संबंध खराब हो गए या रिश्ता टूट गया। अदालत ने कहा कि उन मामलों में स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है, जहां शुरुआत से ही जानबूझकर धोखे या छल के जरिए सहमति प्राप्त की गई हो और जहां रिश्ता समाप्त होने के बाद पहले की सहमति पर सवाल उठाया जा रहा हो।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी केरल के एक व्यक्ति को दुष्कर्म और धोखाधड़ी के आरोपों से बरी करते हुए की। पीठ ने कहा कि असफल रिश्तों को आपराधिक मामलों में बदलने का चिंताजनक चलन देखने को मिल रहा है। केवल रिश्ता टूट जाने या संबंधों में कड़वाहट आने से पहले आपसी सहमति से बने संबंध अपराध नहीं बन जाते।
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी रिश्ते के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी इच्छा से संबंध बनाए हैं, तो बाद में रिश्ता समाप्त होने पर उसे स्वतः दुष्कर्म का मामला नहीं बनाया जा सकता। ऐसा दृष्टिकोण किसी व्यक्ति की अपनी इच्छा से रिश्ता समाप्त करने की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। किसी पुरुष को केवल इस आशंका के कारण रिश्ते में बने रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि अलग होने पर उसके खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज हो जाएगा।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि दुष्कर्म एक अत्यंत गंभीर अपराध है। ऐसे आरोपों का इस्तेमाल उन्हीं परिस्थितियों में होना चाहिए, जहां वास्तव में यौन हिंसा, जबरदस्ती अथवा सहमति प्राप्त करने में कानूनी रूप से प्रासंगिक छल शामिल हो। अदालत ने कहा कि आपसी सहमति से बने संबंधों में बाद में आई खटास को बिना कानूनी आधार के आपराधिक रंग देना उचित नहीं है।
क्या है पूरा मामला
मामले के आरोपी संतोष कुमार एन.पी. ने केरल उच्च न्यायालय के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उनकी आरोपमुक्त करने की याचिका खारिज कर दी गई थी। उन्होंने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने अपनी पहली शादी की बात छिपाकर उससे दूसरी शादी की और इस शादी को कानूनी रूप से वैध बताकर उसके साथ यौन संबंध बनाए। महिला का दावा था कि आरोपी ने उसे विश्वास दिलाया था कि उनकी शादी वैध है, जबकि उसकी पहली शादी उस समय बरकरार थी।
महिला का अपने पहले पति से तलाक हो चुका था। उसने आरोप लगाया कि मैसूर में आरोपी के साथ शादी करने के बाद दोनों वर्ष 1996 से 2003 तक साथ रहे। बाद में महिला ने आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोप लगाए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। हालांकि, यदि शुरुआत से ही धोखे से सहमति प्राप्त की गई हो, तो ऐसे मामलों का कानूनी मूल्यांकन तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाएगा।
देवभूमि न्यूज 24 | देश दुनिया गांव देहात की खबरों को पढ़ते रहिए | समाचार, विज्ञापन: 9816216579