✍️ देवभूमि न्यूज 24*
जिसके श्रवण से पापों का नाश हो जाए,
कार्तिक माहात्म्य का छठा अध्याय सुनाएं।
ब्रह्ममुहूर्त में स्नान का महत्व
नारद जी बोले—हे राजन! कार्तिक मास में मनुष्य को रात्रि के अंतिम पहर में अर्थात ब्रह्ममुहूर्त में उठकर तुलसी की मिट्टी, वस्त्र और जल से भरा कलश लेकर जलाशय पर जाना चाहिए। इस पवित्र महीने में जहां भी जलाशय उपलब्ध हो, वहां स्नान करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कार्तिक मास में ठंडे जल से स्नान करने का पुण्य गर्म जल से स्नान करने की अपेक्षा दस गुना अधिक माना गया है। बाहरी कुएं के जल से स्नान करने का पुण्य उससे सौ गुना बताया गया है। बावड़ी में स्नान करने का पुण्य कुएं से अधिक, पोखर में स्नान करने का पुण्य बावड़ी से अधिक और झरने में स्नान करने का पुण्य उससे भी अधिक माना गया है।
इसी प्रकार नदी में स्नान करने का पुण्य झरने से दस गुना तथा दो नदियों के संगम पर स्नान करने का पुण्य नदी स्नान से दस गुना बताया गया है। जहां तीन नदियों का संगम होता है, वहां स्नान का पुण्य असीम माना गया है।
स्नान से पहले करें भगवान विष्णु का ध्यान
स्नान करने से पहले भगवान का ध्यान करके स्नान का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद तीर्थ में विराजमान देवताओं को विधिपूर्वक अर्घ्य और आचमन आदि अर्पित करना चाहिए।
अर्घ्य देते समय भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए
हे कमलनाथ! आपको नमस्कार है। हे जलशायी भगवान! आपको प्रणाम है। हे ऋषिकेश! आपको नमस्कार है। मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें।
हे वैकुण्ठवासी भगवान! प्रयाग और बदरीनाथ सहित जिन-जिन पवित्र स्थानों पर आपने अपने चरण रखे हैं, वहां के ऋषि, वेद, यज्ञ और समस्त देवता मेरी रक्षा करें।
हे जनार्दन! हे दामोदर! हे देवेश! आपको प्रसन्न करने के लिए मैं कार्तिक मास में ब्रह्ममुहूर्त में विधिपूर्वक स्नान कर रहा हूं। आपकी कृपा से मेरे समस्त पापों का नाश हो।
हे प्रभु! कार्तिक मास में व्रत और विधिपूर्वक स्नान करने वाला मैं आपको यह अर्घ्य अर्पित करता हूं। हे राधिका सहित भगवान विष्णु! मेरे इस अर्घ्य को स्वीकार करें।
हे कृष्ण! हे बलशाली राक्षसों का संहार करने वाले भगवान! हे पापों का नाश करने वाले प्रभु! कार्तिक मास में प्रतिदिन अर्पित किए जाने वाले इस अर्घ्य से मुझे कार्तिक स्नान व्रत का पुण्य प्राप्त हो।
स्नान की विधि और नियम
इसके बाद भगवान विष्णु, भगवान शिव और सूर्यदेव का ध्यान करके जल में प्रवेश करना चाहिए। नाभि तक जल में खड़े होकर विधिपूर्वक स्नान करने की परंपरा बताई गई है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, गृहस्थों को तिल और आंवले के चूर्ण का प्रयोग करके स्नान करना चाहिए, जबकि विधवा स्त्रियों और संन्यासियों के लिए तुलसी की जड़ की मिट्टी का प्रयोग बताया गया है।
कुछ विशेष तिथियों जैसे सप्तमी, अमावस्या, नवमी, त्रयोदशी, द्वितीया और दशमी को आंवले तथा तिल से स्नान करना वर्जित बताया गया है।
स्नान करते समय भगवान विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए
जिस भक्तिभाव से भगवान ने देवताओं के कार्यों की सिद्धि के लिए विभिन्न रूप धारण किए थे, वही पापों का नाश करने वाले भगवान विष्णु अपनी कृपा से मुझे पवित्र करें।
जो मनुष्य भगवान विष्णु की आज्ञा के अनुसार कार्तिक व्रत का पालन करता है, उसकी इंद्र सहित समस्त देवता रक्षा करते हैं।
बीजों, रहस्यों और यज्ञों सहित वेदों के मंत्र, कश्यप आदि ऋषि तथा इंद्र आदि देवता मुझे पवित्र करें। अदिति आदि देवियां, यज्ञ, सिद्ध, सर्प, समस्त औषधियां और तीनों लोकों के पर्वत मुझे पवित्र करें।
देवताओं, ऋषियों और पितरों का तर्पण
इस प्रकार प्रार्थना करके स्नान करने के बाद हाथ में पवित्री धारण करके देवताओं, ऋषियों, मनुष्यों और पितरों का विधिपूर्वक तर्पण करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, तर्पण में जितने तिल अर्पित किए जाते हैं, उतने वर्षों तक व्रती के पितरों को स्वर्ग में निवास का पुण्य प्राप्त होता है।
तर्पण के बाद जल से बाहर निकलकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। सभी तीर्थों के धार्मिक कार्यों से निवृत्त होकर पुनः भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए।
इसके बाद समस्त तीर्थों और देवताओं का स्मरण करते हुए चंदन, पुष्प और फल अर्पित करके भगवान विष्णु को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देना चाहिए।
अर्घ्य देते समय इस भाव से प्रार्थना करनी चाहिए
हे भगवान विष्णु! मैंने इस पवित्र कार्तिक मास में स्नान किया है। आप माता राधा के साथ मेरे द्वारा अर्पित इस अर्घ्य को स्वीकार करें।
ब्राह्मण पूजन और तुलसी आराधना
इसके पश्चात चंदन, पुष्प और तांबूल आदि से वेदों के ज्ञाता ब्राह्मणों का श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहिए तथा उन्हें बार-बार प्रणाम करना चाहिए।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, ब्राह्मणों के चरणों में तीर्थों का, मुख में वेदों का और शरीर के समस्त अंगों में देवताओं का वास माना गया है। इसलिए अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को उनका अपमान अथवा अनादर नहीं करना चाहिए।
इसके बाद एकाग्रचित्त होकर भगवान विष्णु की प्रिय तुलसी माता की पूजा करनी चाहिए। तुलसी की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम करना चाहिए और इस मंत्र के माध्यम से प्रार्थना करनी चाहिए
हे देवि! हे तुलसी माता! प्राचीनकाल से देवताओं ने आपका निर्माण किया और ऋषि-मुनियों ने आपकी पूजा की है। हे भगवान विष्णु की प्रिय तुलसी! आपको बारंबार नमस्कार है। आप मेरे समस्त पापों का नाश करें।
कार्तिक व्रत का फल
नारद जी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रद्धा और भक्तिभाव से कार्तिक मास के व्रत का अनुष्ठान करता है, वह इस संसार में सुखों का भोग करता है और अंत में भगवान की कृपा से मोक्ष को प्राप्त होता है।
कार्तिक मास में स्नान, दान, तर्पण, भगवान विष्णु की पूजा और तुलसी आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। इस पवित्र महीने में श्रद्धा, भक्ति और सदाचार के साथ धार्मिक नियमों का पालन करना चाहिए।
।। श्री हरि विष्णु की जय ।।
।। राधे-राधे ।।
शेष जारी…
कथा एवं ज्योतिषीय मार्गदर्शन:
ज्योतिषाचार्य शैलेन्द्र सिंगला, पलवल, हरियाणा
मोबाइल/व्हाट्सऐप: 9992776726
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान
देवभूमि न्यूज 24
मेरा गांव, मेरा देश
निष्पक्ष, निर्भीक और जनहित की पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध
देश-दुनिया और गांव-देहात की खबरों को पढ़ते रहिए।
समाचार एवं विज्ञापन: 9816216579