साइकिल सवार कहानीलेखक: राजीव शर्मन

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अम्बिकानगर-अम्ब कॉलोनी, रेलवे स्टेशन क्रॉसिंग ब्रिज एवं कमांडेंट होमगार्ड कार्यालय के समीप, तहसील अम्ब, जिला ऊना (हिमाचल प्रदेश)।
देवभूमि न्यूज 24
तुंगल घाटी के कोटली हाई स्कूल का इतिहास शैक्षणिक उपलब्धियों और अनुकरणीय प्रयासों के लिए विशेष पहचान रखता है। स्कूल के तत्कालीन मुख्याध्यापक श्री लाभ सिंह के कार्यकाल में शैक्षणिक ढांचे को सुदृढ़ बनाने की दिशा में प्रेरणादायक पहल की गई थी। हालांकि इससे पहले भी कोटली हाई स्कूल को तुंगल घाटी का शैक्षणिक गढ़ माना जाता रहा था। स्थानीय लोगों ने भी ग्रामीण क्षेत्र में इस विद्या मंदिर की स्थापना और विकास के लिए भरपूर प्रयास किए थे।

कोटली हाई स्कूल का गौरवशाली रिकॉर्ड समूचे हिमाचल प्रदेश के लिए अनुकरणीय रहा है। विद्यालय में खेल गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए साठ के दशक में शारीरिक शिक्षा अध्यापक स्वर्गीय जिंदू राम का योगदान भी अविस्मरणीय रहा। उनकी प्रेरणा और प्रयासों ने विद्यालय में खेल संस्कृति की मजबूत नींव रखी।

उन दिनों स्कूली खेल प्रतियोगिताओं में साइकिल का विशेष आकर्षण हुआ करता था। गोपाल नाम का एक विद्यार्थी बचपन से ही साइकिल चलाने में माहिर हो चुका था। दूसरी कक्षा में पढ़ते हुए ही वह एटलस ब्रांड की साइकिल को कैंची-टंगड़ी लगाकर तुंगल घाटी की नई सड़कों पर दौड़ाने लगा था।

तुंगल घाटी के दो रास्ते गोपाल के लिए लगभग परिचित और पक्के हो चुके थे। पहला कोटली से भरगांव और दूसरा कोटली से साईगलू तक का रास्ता। उन दिनों सड़क निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा था। गोपाल के इतनी दूर तक साइकिल चलाने की शिकायतें धीरे-धीरे घर पहुंचने लगीं। आखिरकार माताजी ने उसकी साइकिल चलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया और पिताजी से साइकिल को ताला लगाकर रखने की व्यवस्था करवा दी।

लेकिन गोपाल का शैतान मन कहां मानने वाला था! उसने साइकिल का ताला खोलने का रास्ता तलाशना शुरू कर दिया। आखिर गांव के लोहार की मदद से उसने डुप्लीकेट चाबी का इंतजाम कर ही लिया।

एक दिन गर्मियों की दोपहर में गोपाल के पिताजी ने उसे बड़ियारा-भरगांव में साइकिल चलाते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। गुस्से में उन्होंने उसकी खूब पिटाई कर दी। गनीमत रही कि घरवाहण गांव के पोस्टमैन योगराज ने बीच-बचाव करके गोपाल को मास्टर जी के गुस्से से बचा लिया।

सबसे हैरानी की बात यह थी कि महज आठ साल का गोपाल गांव की पगडंडी से साइकिल को घरवाहण-कोटली के लगभग एक किलोमीटर लंबे पथरीले रास्ते से मुख्य कच्ची सड़क तक कैसे पहुंचा देता था?

छानबीन करने पर पता चला कि इस भागीरथी प्रयास के पीछे बाल मित्रों की एक तिकड़ी का कमाल था। एक साथी आगे साइकिल की नाल पर बैठता और दूसरा पीछे कैरियर पर। इस तरह तीनों बालक साइकिल की सवारी का भरपूर आनंद उठाते हुए अपना सफर तय करते थे।

कुछ समय बाद मास्टर जी का तबादला दूसरी जगह हो गया। इससे गोपाल को साइकिल चलाने की कुछ अधिक स्वतंत्रता मिल गई। माताजी साइकिल को छिपाकर रखतीं और उस पर ताला भी लगातीं, लेकिन गोपाल हर बार उसे ढूंढ निकालने में सफल हो जाता।

कोटली से नगर तक सड़क निर्माण पूरा होने के बाद स्वयं पिताजी भी एक-दो बार गोपाल को कच्ची सड़क से नगर ले गए। लेकिन अनजाने में उनसे एक ऐसी गलती हो गई, जिसने गोपाल के साइकिल प्रेम को और बढ़ा दिया। अब उसे गांव से नगर तक जाने वाला पूरा रास्ता समझ में आ चुका था।

लगातार पंक्चर होने की समस्या से परेशान होकर मास्टर जी ने साइकिल में रिक्शा के मजबूत टायर डलवा दिए। साथ ही पंक्चर लगाने के लिए लोशन और अन्य जरूरी सामग्री का इंतजाम भी कर लिया। घर में अतिरिक्त टायर-ट्यूब और हवा भरने का पंप भी रख लिया गया। धीरे-धीरे गोपाल साइकिल की मरम्मत और उसकी तकनीकी बारीकियों को भी समझने लगा।

उन दिनों गांव में साइकिल मैकेनिक या मरम्मत का सामान आसानी से उपलब्ध नहीं होता था। कोटली के आरा मशीन वाले लालाजी के यहां मास्टर जी की नियमित बैठक हुआ करती थी। तुंगल घाटी के समकालीन अध्यापक भी वहां इकट्ठा होते थे। घरवाहण के मास्टर नंदलाल, मास्टर लाल सिंह और मास्टर काहन सिंह जैसे अध्यापक गोपाल की साइकिल सवारी को भविष्य की विकासोन्मुखी तस्वीर के रूप में देखते थे। वे उसके पिताजी को भी उसकी प्रतिभा और जिज्ञासा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की सलाह देते थे।

समय ने करवट बदली। गोपाल के पिताजी घरेलू संपत्ति विवादों में उलझकर शहर की ओर पलायन कर गए, लेकिन वहां भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। इसका सीधा असर गोपाल की पढ़ाई-लिखाई पर पड़ना स्वाभाविक था।

मास्टर जी जहां भी सरकारी सेवा में अध्यापन कार्य करते, वहां भी संपत्ति विवादों से जुड़े अदालती समन पहुंच जाते। हालात ऐसे बने कि उन्हें गांव और शहर के मकान छोड़कर अन्यत्र किराये के मकानों में रहना पड़ा। इसके बावजूद विवादों का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। किराये के मकानों में भी उनकी तलाश कर अदालती समन पहुंचा दिए जाते। कई बार उन्हें सरकारी सेवा से छुट्टी लेकर अदालत में उपस्थित होना पड़ता।

ऐसे समय में गोपाल को भी अपनी पढ़ाई छोड़कर पिताजी की सहायता करनी पड़ती। वह साइकिल पर वकीलों की कानूनी किताबें लादकर शहर की अदालत पहुंचता और अदालती कार्यवाही में अपने पिता का सहयोग करता।

साइकिल सवार गोपाल को स्कूली जीवन में ही अदालती मामलों की जटिलताओं का अनुभव होने लगा था। शाम को पिता-पुत्र के बीच संपत्ति विवाद और मुकदमों को लेकर अक्सर संवाद होता था।

गोपाल एक दिन अपने पिताजी से पूछ बैठा,

“जब हमने गांव और शहर के मकानों को छोड़कर किराये के मकानों में ही गुजर-बसर करनी है, तो फिर इन अदालती मुकदमों में हमें क्यों घसीटा जा रहा है?”

मास्टर जी अपने पुत्र को गीता के उपदेशों के माध्यम से समझाने का प्रयास करते।

वे कहते, “यह मानवीय संघर्षमय जीवन का अटल सिद्धांत है कि मनुष्य को कई बार न चाहते हुए भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। परिस्थितियों से भागना समाधान नहीं है।”

वे भगवान श्रीकृष्ण और उनके प्रिय सखा अर्जुन का उदाहरण देते हुए बताते कि किस प्रकार कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे, लेकिन श्रीकृष्ण के गीता उपदेश से प्रेरित होकर उन्होंने अपने कर्तव्य का मार्ग अपनाया और निर्णायक युद्ध के लिए शस्त्र उठाए।

गोपाल को धीरे-धीरे जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और भविष्य की चुनौतियों का एहसास होने लगा। पिताजी के इन उपदेशों ने उसके मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी। उसने संकल्प लिया कि वह शिक्षा अर्जित करके अज्ञानता और कानूनी जटिलताओं के इस अंधकार को समझने तथा उससे बाहर निकलने का मार्ग खोजेगा।

अब गोपाल का साइकिल सवार जीवन एक नए मोड़ पर पहुंच चुका था। उसने साइकिल के पहियों से आगे बढ़कर विद्या के अमोघ रथ पर सवार होने का निर्णय कर लिया था।

गोपाल ने उच्च शिक्षा की राह पकड़ी। कॉलेज और विश्वविद्यालयों की डिग्रियां हासिल करने का उसका सिलसिला शुरू हुआ तो निकटवर्ती रिश्तेदारों और हिस्सेदारों को भी इसकी भनक लगने लगी। वे उसे हतोत्साहित करने का प्रयास करते।

कई बार उसे समझाया जाता कि पढ़ाई-लिखाई की डिग्रियों से कुछ हासिल नहीं होगा। गांव या शहर में कोई कारोबार करना चाहिए। लेकिन अब गोपाल की मानसिक स्थिति बदल चुकी थी। पिताजी के गीता उपदेशों ने उसे स्थितप्रज्ञ बना दिया था। बाहरी आलोचनाओं और नकारात्मक बातों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था।

समय के साथ गोपाल को एक उच्च शिक्षित जीवनसंगिनी भी मिली। उनकी धर्मपत्नी सुरेखा भी उच्च शिक्षा प्राप्त अधिवक्ता थीं। दोनों ने मिलकर जीवन की एक नई दिशा तय की।

सुरेखा और गोपाल ने अपने संघर्ष, शिक्षा और परिश्रम के बल पर ऐसी सफलता अर्जित की, जो पारिवारिक विवादों और सामाजिक झंझावातों में उलझे परिवारों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई।

आज दोनों देश की राजधानी दिल्ली में अपने आलीशान बंगले में रहते हैं और सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करते हैं। गांव और शहर में उनकी अनेक चल-अचल संपत्तियां भी निर्विवाद हैं। कभी मास्टर जी को संपत्ति विवादों में अदालतों के चक्कर लगवाने वाले रिश्तेदारों और हिस्सेदारों ने अंततः आत्मसमर्पण कर दिया।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। अब वही साइकिल सवार गोपाल अपनी धर्मपत्नी सुरेखा के साथ आलीशान कार में तुंगल घाटी पहुंचता है। कोटली, घरवाहण, भरगांव, द्रुबल, कोट और कुन्नतर तक के पुराने रास्तों पर घूमते हुए वह अपने बचपन के साथियों और सहयोगियों से मुलाकात करता है।

कभी जिन पथरीली पगडंडियों पर आठ साल का बालक अपनी साइकिल को कैंची-टंगड़ी लगाकर चलाया करता था, आज उन्हीं रास्तों पर उसकी सफलता की कहानी सुनाई देती है।

साइकिल के पहियों से शुरू हुआ गोपाल का सफर आज शिक्षा, संघर्ष, आत्मविश्वास और सफलता के मुकाम तक पहुंच चुका है।

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