पुलिस को औपचारिक गिरफ्तारी में देरी कर किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत में रखने की छूट नहीं
*देवभूमि न्यूज 24*
नई दिल्ली। नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य है। इस समयसीमा की गणना औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से नहीं, बल्कि उस समय से होगी जब व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में छीन ली गई हो।
शीर्ष अदालत के अनुसार, पुलिस केवल कागजी कार्रवाई में गिरफ्तारी का समय बाद में दिखाकर संवैधानिक समयसीमा को आगे नहीं बढ़ा सकती। हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर करके किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए बिना रखना संविधान के अनुच्छेद 22(2) की भावना के विपरीत है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही 24 घंटे की गणना से बाहर रखा जा सकता है। जांच, पूछताछ, तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया के नाम पर हिरासत में बिताए गए समय को अलग नहीं माना जा सकता।
यह फैसला त्रिपुरा के एक NDPS मामले में चार आरोपियों की अपील पर आया। आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब 2 बजे हिरासत में लिया गया था, जबकि उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन दर्ज की गई। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उन्हें निर्धारित समय के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया था।
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपियों को सात दिनों के भीतर संबंधित विशेष अदालत में पेश करने और उसके बाद उचित शर्तों पर रिहा करने का निर्देश दिया।
इस फैसले का संदेश स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ प्रक्रिया के नाम पर समझौता नहीं किया जा सकता। पुलिस को कानून और संविधान के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी होगी।
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