डॉ. विवेकानंद उपाध्याय
वरिष्ठ स्तंभकार, (देवरिया)
*देवभूमि न्यूज 24*
दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही कुम्हार बस्तियों में फिर से चाक घूमने लगे हैं। आंगन और बरामदों में हजारों कच्चे दीये कतार में सूख रहे हैं, जो कुछ दिन बाद किसी की दहलीज और पूजा की थाली को रोशन करेंगे। पर इस बार चाक की घरघराहट के साथ एक गहरी चिंता भी घूम रही है। आधुनिक तकनीक और मशीनरी ने इस सदियों पुराने पारंपरिक व्यवसाय पर गहरी चोट की है और कुम्हार परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। पूरा परिवार दिन भर मिट्टी में सना रहता है फिर भी त्योहार की खुशी चेहरे पर नहीं है, क्योंकि बाजार की अनिश्चितता ने हौसला तोड़ दिया है।
बाजार में आज मिट्टी के दीये का मुकाबला सीधे मशीन से है। बिजली की रंग-बिरंगी झालरें, चाइनीज LED लाइटें, प्लास्टिक के बल्ब वाले नकली दीये, थर्मोकोल और पीओपी की सजावटी मूर्तियों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है। एक मिट्टी का दीया बनाने में कुम्हार को तालाब से चिकनी मिट्टी खोदकर लाने, उसे घंटों गूंथने, चाक पर गढ़ने और धूप में सुखाने में पूरा दिन लग जाता है और दाम मिलता है सिर्फ दो से तीन रुपये। जबकि मशीन से बना प्लास्टिक का दीया मिनटों में हजारों की संख्या में तैयार हो जाता है और पचास से सौ रुपये में बिकता है। ऑनलाइन शॉपिंग और मॉल में बिकने वाले फैंसी कैंडल और डेकोरेशन लाइट ने तो कुम्हार के परंपरागत ग्राहक ही छीन लिए हैं और गांव के मेले भी अब सूने लगते हैं।
पुराने कारीगर बताते हैं कि पहले दीपावली से दो महीने पहले ही ऑर्डर आने लगते थे। गांव-गांव से लोग एडवांस दे जाते थे और पूरा परिवार महीनों तक दीये बनाने में लगा रहता था। महिलाएं मिट्टी तैयार करती थीं और बच्चे सूखे दीयों को संभालते थे। अब ग्राहक आखिरी दिन आता है और दस रुपये के दीयों पर भी मोलभाव करता है। कहता है महंगा दे रहे हो, सामने लड़ी सस्ती मिल रही है। बिचौलिये भी मजबूरी का फायदा उठाते हैं। वे गांव से दो रुपये का दीया लेकर शहर में दस रुपये में बेच देते हैं, मुनाफा वे खा जाते हैं और मेहनत कुम्हार की रह जाती है। कई बार बिना बिके हजारों दीये टूट जाते हैं और कर्ज का बोझ बढ़ जाता है।
आधुनिक तकनीक का सबसे बड़ा असर नई पीढ़ी पर पड़ा है। कुम्हारों के बेटे अब चाक पर बैठने की बजाय शहर में जाकर मजदूरी या ई-रिक्शा चलाना पसंद करते हैं। उन्हें लगता है कि मिट्टी के काम में भविष्य नहीं है। एक परिवार दिन-रात मेहनत करके इस सीजन में पचास हजार से एक लाख दीये तो बना लेता है, पर बाजार में सही दाम न मिलने और सुखाने की जगह की कमी से लागत भी नहीं निकल पाती। कई जगह कुम्हारों ने हमेशा के लिए चाक चलाना ही बंद कर दिया है।
हालांकि पिछले दो साल में तस्वीर थोड़ी बदली है। वोकल फॉर लोकल की मुहिम के बाद लोगों का रुझान फिर मिट्टी के दीयों की ओर लौटा है। लोगों को समझ आया है कि मशीन की लाइट एक सीजन में फ्यूज होकर ई-कचरा बन जाती है, जबकि मिट्टी का दीया उपयोग के बाद फिर मिट्टी में मिल जाता है। बुजुर्ग कहते थे कि मिट्टी के दीये जलाने से घर में लक्ष्मी का वास होता है। सरकार भी अब इलेक्ट्रिक चाक और पगमिल मशीन पर सब्सिडी दे रही है, ताकि वे कम मेहनत में अधिक उत्पादन कर सकें और बाजार में टिक सकें।
सच यह है कि एक दीया आज भी कई हाथों को रोजगार देता है। वह सिर्फ मिट्टी नहीं, हमारी संस्कृति और परंपरा की रोशनी है। अगर हमने इस दीपावली कुम्हार के आंगन से ही दीया नहीं खरीदा तो वहीं बिना बिके पड़ा हर दीया यही सवाल करता रह जाएगा कि आखिर “मेरा क्या कसूर”।
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