दैहिक,दैविक,भौतिक त्रय तापों का निवारण श्री मद्भागवत महापुराण की कथा – आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री

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दैहिक,दैविक,भौतिक त्रय तापों का निवारण श्री मद्भागवत महापुराण की कथा – आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री

देवभूमि न्यूज डेस्क
गगरेट

आज श्री ब्रह्मधाम श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट सन्निकट सोमभद्रा-स्वां नदी बाजार में श्री मद्भागवत महापुराण कथा के प्रथम दिवस की पावन कथा का माहात्म्य श्रवण करवाते हुए व्यासपीठ आचार्य श्री गणेश दत्त शास्त्री जी ने कथा माहात्म्य बतलाया।
उन्होंने कहा कि घोर कलिकाल में मानव कल्याणार्थ श्री मद्भागवत महापुराण कथा प्रसंग का वृतान्त तत्चित्त होकर श्रद्धा से सुनना चाहिए। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। बाल्यकाल से लेकर हम सभी वृद्धावस्था के अन्तिम पड़ाव की ओर अग्रसर होते जा रहे हैं किन्तु हमारे जन्म-जन्मांतर के क्लेशों की निवृत्ति नहीं हो पाई है। जब कभी अविद्या के क्लेशों ने मानव को अपना घेरा डाला,वह विष्णु मयी त्रय तापों की माया में उतरोतर फंसकर चौरासी के चक्कर में पड़ता चला आया है। ऐसे में भागवत भगवान की कथा प्रसंग ही इस घोर कलियुग से परमार्थ की ओर अग्रसर करा मानव का बहुविधि कायाकल्प और कल्याण का एकमात्र उपाय है।
उन्होंने नैमिषारन्य महातीर्थ का सुंदर चित्रण करते हुए कहा कि एक बार समस्त देवी-देवताओं ने कहा कि श्री हरि विष्णु जी, हमें आपके सचिदानंद स्वरूप के सानिध्य में सत्त सनातन का अवलम्बन करना है। भगवान श्री विष्णु जी ने कहा कि वह अपना सुदर्शन चक्र आपके मार्गदर्शन के लिए छोड़ रहे हैं। आप सभी देवताओं को मेरे सुदर्शन चक्र का अनुसरण करना है। भगवान श्री ने कहा कि जहां पर मेरे सुदर्शन चक्र की नैमि (धार) स्पर्श करेगी वहीं पर महातीर्थ नैमिषारन्य का कल्याणकारी पुन्य क्षेत्र होगा। धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष कैवल्य प्राप्ति का यही नैमिषारन्य अठासी हजार शौनकादि ऋषियों का महातीर्थ बन गया। इसी परम पुनीत महातीर्थ पर भगवान श्री हरि विष्णु जी ने देवताओं को मानवीय जीवन के त्रय तापों का निवारण करवाने हेतु श्री मद्भागवत महापुराण कथा प्रसंग का श्रवण करवाने का सतत् निर्देश दिलवाया।इसी महातीर्थ श्री नैमिषारन्य महातीर्थ में श्री वेदव्यास जी के सुपुत्र श्री सूतजी प्रकट हुए वहां पर हजारों वर्षों में आयु से बड़े ऋषियों मुनियों ने उन्हें प्रणाम किया। इस पर ऋषि गणों को प्रणाम करता देख श्री सूतजी ने कहा कि उनकी आयु तो मात्र सोलह वर्ष की है। “आप सभी मुझे प्रणाम कर लज्जित ना करें”?
इस पर ऋषियों मुनियों ने कहा कि हम आयु में निःसंदेह आप से बड़े हैं किन्तु बुद्धि बल से आप अग्रज है तथापि आप हमारे कल्याण का मार्ग प्रशस्त करवायें।
इस तरह से नैमिषारन्य महातीर्थ में श्री मद्भागवत महापुराण कथा का माहात्म्य कथा प्रसंग का वृतान्त सभी ऋषियों मुनियों को श्रवण करवाया गया।