*गिरिपार क्षेत्र में दीपावली के एक माह बाद मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली
देवभूमि न्यूज डेस्क
कार्तिकेय तोमर
शिलाई
यूं तो पूरे भारत वर्ष में दीपावली का त्योहार मनाया जाता है । लेकिन जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की सेकड़ो पंचायतो में इसे अनूठी परम्पराओं के साथ आयोजित किया जाता है। जिसमे आतिशबाजियों, फुलझड़ियां, व पटाखों की धूम मचाई जाती है। वहीं एक माह बाद मनाई जाने वाली बूढ़ी दीवाली में पहाड़ी पकवानों व व्यंजनों व अखरोट मूड़ा, शाकुली से इसकी शुरूआत की जाती है जिसके लिए तैयारियां एक माह चलती रहती है अमावस्या की रात मशालों को जलाकर बूढ़ी दिवाली का शुभारम्भ हो जाता है यह कहीं तीन,पाँच व कहीं-कहीं सात दिनों तक भी मनाई जाती है

गिरिपार क्षेत्र में शिलाई क्षेत्र के जेलभोज क्षेत्र व लाधी क्षेत्र के कुछ गावों में नई दीपावली बूढ़ी दिवाली की तर्ज पर मनाई जाती है अमावस्या की रात को सुबह करीब चार बजे उठकर चीड़ की लकड़ी की मशाले सबसे पहले मन्दिर परिसर के चारो ओर जलाई जाती है। ततपश्चात यंहा पर लिम्बर नृत्य करके दूर ले जाकर सुबह तक मशालों के साथ पहाड़ी गीतों में नृत्य किया जाता है। इसके बाद लोगो द्वरा सामूहिक प्रांगण में सिया गीत गाया जाता। किन्ही गावों में रात्रि को मशाल जलूस निकाला जाता हैअमावस्या के दूसरे दिन भिंयुरी गीत व पडोई तथा जौंउदरा आदि मनाया जाता है। जिसमे लोगो द्वरा पहाड़ी गीत व रासे तथा हारूल आदि गीतों से खूब मनोरंजन किया जाता है। गांव में लोगो द्वरा इस त्योहार के अवसर पर पारंपरिक वयंजन मुड़ा, शकुली, सिडकु, तेलपाकि आदि का भी खूब लुफ्त उठाया जाता है।