कहानी
तुगंल घाटी की लाटरी
राजीव शर्मन्,
अम्बिकानगर-अम्ब,ऊना
हिमाचल प्रदेश
देवभूमि न्यूज डेस्क
कोटली घुराण में पहली बार बस आने से उत्सव का माहौल धा। हम भी बे़ैंड बजने से खूब नाचे थे। यह ऐतिहासिक और यादगारी माहौल था। मंडी नगर की तुंगलघाटी बहुत दुर्गम इलाका था।सारा इलाका साधनहीनता का शिकार हुआ करता था।

मानवीय जीवन बहुत जटिल और दुष्कर था।यहां रहना पत्थर पर पेड़कर रोटी बेलने वाली कहावत थी।मंडी नगर से कुनतर व्यास दरिया तक का सारा पिछड़ा इलाका था। पुरोहित गौरीशंकर इस इलाके के कुल पुरोहित थे।वह कुनतर तक पुरोहित कार्य को अमली जामा पहनाने के लिये पैदल ही कड़ा संघर्ष करते रहे। सुबह चार बजे मंडी नगर से चीड़ की मशालें लेकर गांव पटनाल और भरगांव तक का १५ मील रास्ता सूर्योदय से पहले तय कर लेते। अपने यजमानों के घर कथा-वार्ता,पुरोहित पांडित्य,कर्मकांड पूरा कर अगले दिन दान का लश्कर-पस्कर लेकर नगर लौट आते थे। तुंगल घाटी को जाने के उनके कई स्थानों पर पड़ाव थे। मंडी नगर से सिद्धयाणा की बावड़ी,देवनाल-चलोह,साईगलू,कसाण-पटनाल,भरगांव-कोट मुख्य पड़ाव थे। इन स्थानों पर प०गौरीशंकर चर्चा करते!”ना जाने कौन दिन आयेगा?जब यहां से बस मोटर की सुविधा मिलेगी?” अस्पताल स्कूल ,डाकखाना तो सपना है। हमारे पुरखे तो पैदल चल चलकर थक हार महापरायण कर गये। हम पता नहीं सड़क और मोटर बस देख पाये! इलाकावासी पिछड़े है। कोई विकासवादी राह नही निकल पाई है। सैंकड़ों लोग इलाज के बिना मारे जा चुके है। सारा तुंगल इलाका सोने की लंका है। ” ना जाने कब उद्धार होगा?” इलाके में आज जिगरी लाल की माता कई दिनों से बीमार थी। गांव में एक मात्र लाजपत वैद्य का उपचार हांफ चुका था। वैद्य ने हाथ खड़े कर दिये थे कि अब शहर के बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा। गांव में टेढी-मेढी पगडंडियों का रास्ता शहर तक घुराण गांव से १५ मील दूर था। सरपंच लालमन ने भरगांव से अपनी जद्दी जायदाद के खेत सड़क बनवाने के लिये सरकार को दे दिये थे। घुराण से पटनाल-कसाण-साई से सड़क का काम साठ के दशक तक लटका चला आ रहा था। पटनाल के प०गौरी शंकर पुरोहित ने भी दरियादिली दिखाते हुये अपनी माली जमीन का रास्ता सड़क बनवाने को देने का एलान कर रखा था। इन तमाम साकारात्मक पहल के चलते कुछ लोग अपनी जमीन कदापि सड़क के लिये नहीं देना चाहते थे। हालांकि सरकार ने उचित मुआवजे की भी घोषणा कर रखी थी।गांव में अनपढ़ता व नालायकी का साम्राज्य चरमसीमा पर था। अधिकांश ग्रामीण कच्ची लाहन,ध्रुवली-चाटकी व लोकल शराब का धंधा अपनाकर इलाकावासियों से खिलवाड़ कर रहे थे।सतर के दशक तक शराब के प्रचलन से कई घर उजड़ चुके थे। बीमारियों की चपेट का सिलसिला हावी था। तुंगल घाटी में शराब का दावानल हावी था। इलाकावासी कृषि कर्म से निवृत होकर घोड़ो पर शहर से रसकट-गुड़ लाद लाते और शराब निकालते। पटनाल की भाट (शराब की हाट) भी काफी नाम कमा रही थी। प० गोरीशंकर पुरोहित ने इसका पुरजोर विरोध किया तो कई ग्रामीण दुश्मन बन गये। प० गौरी शंकर पुरोहित ने हार-फारकर शहर का रूख कर लिया था।उन्होनें इलाकावासी ग्रामीणों सन्तराम,धूंगल,पूर्ण चंद,लाला राम,हाड़ूराम को साफ साफ बता दिया था कि जब तक शराब की दुनियां से नहीं निकलोगे तो लोग यहां पर मरते रहेंगें। आज जिगरी लाल की माता मर रही है।” अक्ल के अंधों! कल को एक-एक शराब का काल ग्रास बनोगे!! कोई अस्पताल नहीं खुलेगा”। थोड़ी देर के लिये ग्रामीण चुप्पी साधते, फिर वही शराब की दुनियां में रंग जाते थे। गांव में शराब की रोक-टोक नही थी। कृषि कर्म के अतिरिक्त यहां के ग्रामीण भारतीय सेना में सैनिक भर्ती को ही तब्बजो देते थे। जिन युवाओं ने तुंगल घाटी को छोड़ा वह मुड़कर यहां शायद ही वापिस आये। शराब के कारोबार में लगे इलाकावासियों ने यहां पर पुलिस थाना / चौकी भी खुलने नहीं दी थी। जब कभी विरोध का स्वर उभरता उसको बहुविधि दबन कर दिया जाता था। प० गौरीशंकर के पलायन के बाद उनके बड़े लड़के लाहौर से आचार्य की डिग्री करके लौटे तो ग्रामीणों ने उनके पांव भी टिकने नहीं दिये। बड़ी मुश्किल से वह रगड़ घसीट कर तीन साल निकाल पाये। उनका डाकखाना खुलवाना,धनीराम कामरेड के साथ गांव में हाई स्कूल खुलवाना,नारी निकेतन की स्थापना का प्रस्ताव उनके पलायन का कारण बन गया। एक समय वह इस कद्र द्रवित हुये कि सरकारी अध्यापक की नौकरी छोड़कर तुंगल इलाके की बेहतरी के लिये चुनाव लड़ा जाये। स्पष्टवादी अध्यापक ने अपने चेलों और शुभ चिंतकों की एक पिकनिक पटनाल गांव में आयोजित कर डाली।बस फिर क्या था? अवैथ धंधा करने वालों को सांप सूंघ गया। बड़े बड़े शराब माफिया तत्कालीन मुख्यमंत्री परमार से मिले कि अध्यापक को कोटली स्कूल से बदल डालो। कानों के कच्चे सियासत दान इलाकावासी के बहकावे में आ गये। एक सच्चे विकासवाद के पर्याय अध्यापक का तबादला ननखड़ी शिमला करा अवैध धंधा करने वालों ने सुख की सांस ली। जिगरी लाल ने अपनी बीमार माता को बांस की पालकी में डालकर कई बार शहर के अस्पताल कई महीने चक्कर काटे। सही खुराक,परहेज,दवाईयों के अभाव में उसकी जान नही बचाई जा सकी।एक दिन पालकी में शहर ले दाते जाते उसने दम तोड़ दिया। एक जिगरी लाल की माता का सवाल नहीं? इलाके की कई महिलाओं,बुजुर्गो,बच्चों ने ईलाज ना मिलने पर दम तोड़ा था। अध्यापक रूपचंद जी ने इलाके के समग्र विकास के लिये कई सुनहरे सपने संजोये थे। वह गांव में सड़कों का जाल बिछाना चाहते थे। उनका एक लड़का किरन कुमार ईलाज ना मिलने के कारण चल बसा था।पटनाल में ” रोडे की आल” ओटू नाले समीप जब किरन कुमार को दफनाया गया तो अध्यापक रूप चंद ने कसम खाई थी कि एक दिन वह इस इलाके को समस्याओं से निकाल कर साधन सम्पन्न बनवायेगें! जहां से उनके बेटेे किरण कुमार की तरह किसी को अल्प मृत्यु का शिकार ना होना पड़े । भाग्य की बिडम्बना ही कुछ और थी। इस नियती के खेल में आदमी सब कुछ हार जाता है।अध्यापक रूपचंद के मानस पटल पर जो विकास का तैयार हुआ ,उसे पूरा करने के लिये सिर धड़ की बाजी लगा दी थी। वह अपने पिट्ठू (बस्ता) में अक्सर दवाईयां/इजैक्शन रखा करते। जब कभी गम्भीर बीमार की बीमारी का सामना करना पड़ता को सभी सीमायें लांघकर स्वंय डाक्टरी करने पर आमदा हो जाते। बहुत थोड़ा बेतन पाने वाले अध्यापक रूपचंद अपना बेतन नगर के हकीम मुरारी लाल (नन्दू) वैद्य के पास से दवाईयां और टीके खरीद लाने में व्यय कर देते थे।अपने पास “दीन जन चिकित्सा सागर” का फार्मूला रखा करते। गरीब इलाकावासियों को किस तरह गम्भीर बीमारियों से बचाया जा सके, उनकी दिनचर्या की शुरूआत ही इससे हुआ करती थी। नगर में वह कई जगह इसी ऱोजबीन में लगे रहते कि गांव के इलाकावासी स्वास्थ्य सेवाओं को तरसते है। उनको स्वस्थ बनवाने और गम्भीर बीमारियों के निराकरण के लिये आजीवन आयुर्वेद के माध्यम से भी लम्बी आरोग्य यात्रा पर चलते रहे। आर्थिक तंगी अध्यापक रूपचंद के मार्ग में कभी आड़े नहीं आई। उनका एक मात्र सिद्घान्त था कि बीमार दरिद्र नारायण की सेवा करो।अध्यापक रूपचंद की मित्र मंडली हितैषी बनकर पारिवारिक निर्वहन का परामर्श देती तो वह सहजता से चाल गेते। मेरे बच्चे पड़ रहे है। मेहनत ,संघर्ष करके कुछ ना कुछ बन ही जायेहें।उनका इलाके से तबादला और पलायन विकास की राह में रोड़ा ना बन सका। सचिवालय में कार्यरत अपने शिष्यों के माध्यम से उन्होनें कई योजनायें इलाकावासियों की बेहतरी के लिये अपने गांव के लिये क्रियान्वित करवाई। ऱूपचंद अध्यापक ने उस समय जो वैचारिक विकासवादी नींव रखी थी। उसका सपना उन्ही की इच्छाओं के अनुरूप क्रियान्वयन हो रहा है। साठ के दशक की पुरानी पानी स्कीमे,सब तहसील,कालेज,आई०टी०आई०,बस स्टैंड कोटली, कोटली महाविद्यालय का सपना,कुनतर पुल,किसान भवन-सब्जी मंडी के सपने सब साकार हो रहे है। शराब के साम्राज्य की चंगुल से तुंगलघाटी छूट गई है। सभी लोगों की विकासवादी लाटरी खुल गई है। आने वाले दिनों तुंगल घाटी की माता सुरगणी देवी,भरगांव,श्री देव रछेरा,श्री देवनाल धार्मिक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित होने दा रहे है। शराब माफिया का समूलोनाश हो चुका है। अध्यापक रूपचंद आज इस दुनियां में नहीं है। उनके पढ़ाये विधायक चेले दुर्गागत और कन्हैया लाल भी जानते है कि उनके गुरूजी का तुंगल इलाके का विकासवादी सपना साकार हो रहा है। यही सबसे बड़ी विकासवादी लाटरी थी।सचमुच इस लाटरी का ताला अब खुल चुका है। वर्तमान में बहुआयामी योजनाओं का क्रियान्वयन एवं चहुंमुखी सर्वांगीण विकास का कायाकल्प पूर्ववत जारी है।
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