श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट में श्री मद्भागवत महापुराण कथा

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श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट में श्री मद्भागवत महापुराण कथा

देवभूमि न्यूज डेस्क
ऊना

हिमाचल प्रदेश: सोमभद्रा-स्वां नदी समीप धार्मिक महातीर्थ श्री छोटा हरिद्वार श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट में श्री मद्भागवत महापुराण कथा का व्यासपीठ श्री गणेश दत्त शास्त्री जी द्वारा सरस संचार किया जा रहा है।
आज की चारों वेदों को रचने वाले कथा प्रसंग में पराशर ऋषि के सुपुत्र श्री वेद व्यास जी (श्री कृष्ण द्वैपायन) तदन्तर श्री शुकदेव जी का श्री मद्भागवत महापुराण का श्रोताओं को रसास्वादन करवाया।

पराशर ऋषि के शुक्र को मत्स्य गंधा ने ग्रहण करके वेदव्यास को जन्म दिया। उन्हीं वेदव्यास जी ने चारों वेदों की संरचना की। उन्हीं के तेजोमय प्रताप से उनके सुपुत्र शुकदेव का जन्म हुआ। शुकदेव जी,अंडज रूप में कैलाश पर्वत पर भोलेशंकर के सानिध्य में छद्म आश्रय में रहने लगे। जब भगवान शंकर जी ने देवी पार्वती जी को अमरकथा का रसपान करवा रहे थे। हालांकि शंकर भगवान जी ने पार्वती को सावधान किया कि ओम का उच्चारण करते हुए जागते रहना चाहिए। पार्वती जी ओम का उच्चारण करते रही। इसी दौरान अलौकिक सत्ता के संचार में पार्वती को नींद आ गई। उनकी जगह शुकदेव जी ओम का उच्चारण करना शुरू कर दिया था। उनकी जगह शुकदेव जी ही कथा श्रवण करके कथा श्रवण की पुष्टि कर रहे थे। जब अमर कथा की समाप्ति पर शंकर भगवान ने पार्वती से पूछा कि पूरी कथा का श्रवण किया?

इस पर जगदम्बा पार्वती भगवती बहुत विस्मित हुई तथापि बताया कि उन्हें तो नींद आ गई।
तभी शंकर भगवान जी कुपित हुए कि अवश्य ही इस कैलाश पर्वत पर किसी ने अमर कथा को सुनने का दुस्साहस किया है। वह त्रिशूल से उसके संहार हेतु खोजवीन करने लगे।
ऐसे में शुकदेव जी दिखाई दिए जो कि अमर कथा श्रवण कर अमरत्व प्राप्त कर चुके थे।
शुकदेव जी भय से आतुर होकर बद्री नाथ धाम की ओर उड़ चले।
वहां पर श्री वेदव्यास जी की धर्मपत्नी मुंह खोलकर उवासी ले रही थी। बस फिर क्या था? शुकदेव जी तो उनके गर्भ में जाकर छुप गये। वेदव्यास जी ने शंकर भगवान जी के उनके आश्रम में आने का कारण पूछा?
शंकर भगवान जी ने बताया कि मेरा चोर यहां आया है। वेदव्यास जी ने दिव्य दृष्टि से पता लगा लिया कि अब तो शुकदेव जी मेरे यहां सुपुत्र बनकर संसार सागर को पार लगाने वाली श्री मद्भागवत महापुराण कथा से जगत के समस्त त्रय तापों का निवारण करवायेंगे।
सूतजी कहते हैं कि अठ्ठासी हजार शौनकादि ऋषियों के नैमिषारन्य महातीर्थ में सर्वप्रथम श्री मद्भागवत महापुराण कथा का आयोजन किया गया था।