श्रद्धा-भाव से सरावोर होने पर श्री नारायण भवसागर से बेड़ा पार करवाते हैं।- आचार्य श्री गणेश दत्त।
देवभूमि न्यूज डेस्क
ऊना
श्री राम मंदिर अंदौरा-गगरेट सुप्रसिद्ध स्थल श्री छोटा हरिद्वार समीप पौराणिक सोमभद्रा स्वां नदी सानिध्य में श्री मद्भागवत महापुराण कथा प्रसंग श्रोताओं को श्रवण करवाया। कथा व्यास आचार्य श्री गणेश दत्त जी ने तृतीय दिवस कथा में श्रद्धा भक्ति का अलौकिक समर्पण की सीख से साध संगत को निहाल कर दिया।

उन्होंने ने महाभारत प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जग चक्र,काल चक्र और युग चक्र एक साथ घुमाने वाले अखिलात्मा श्री कृष्ण भगवान दूत बनकर कौरवों की सभा में उपस्थित हुए।श्री कृष्ण जी के लिए स्वर्ण,रजत, हीरे-जवाहरात के सुंदर सुसज्जित आसन उपलब्ध करवाये गये थे। अन्तर्यामी भगवान जी ने दुर्योधन के भाव को भली-भांति पहचान लिया था।जब दुर्योधन ने श्री कृष्ण को बैठने का आग्रह किया तो श्री कृष्ण ने बेवाकी से प्रत्युत्तर दिया कि वह बैठने नहीं आये बल्कि महाभारत युद्ध से सभी को बचाना चाहते हैं। श्री कृष्ण जी ने खड़े होकर कौरवों और पांडवों में समझौते का प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

धृतराष्ट्र की मौजूदगी में दुष्ट दुर्योधन अभिमान से अभिशप्त था। श्री कृष्ण जी ने मध्यस्थता करते हुए पांडवों को पांच गांव देने का आग्रह करके महाभारत युद्ध टालने का सुझाव सुझाया। दुर्योधन ने विना युद्ध के सुई की नोक के बराबर भी भूमि देने से साफ इन्कार कर दिया।
दुर्योधन ने अपनी हठधर्मिता प्रकट कर दी और भगवान कृष्ण से भोजन करने का पुरजोर आग्रह किया। श्री कृष्ण ने कहा कि हे दुर्योधन! भोजन तो क्षुधा व्याप्त होने पर ही किया जाता है। इसलिए मुझे तो भूख ही नहीं है। दूसरे दुर्योधन को सचेत भी किया कि अगर भोजन खिलाने वाले का भाव भी ठीक होना चाहिए। ऐसा शुद्ध भाव होने पर व्यक्ति भूख ना होने पर भी कुछ भोजन ग्रास खा लेता है। भगवान ने अप्रत्यक्ष रूप से दुर्योधन को चेताया कि उसका भाव कलुषित है। इसके साथ ही पांडवों की ओर से युद्ध का ऐलान करके भगवान महामंत्री विदुर के घर जा पहुंचे। वहां पर भगवान श्री कृष्ण जी ने विदुराणी काकी से रूखा- सूखा साधारण भूमि आसन पर बैठकर ग्रहण किया।
आचार्य श्री गणेश ने श्रोताओं को भाव विभोर करते हुए कहा कि भगवान केवल मात्र भक्तों की भावनाओं के वशीभूत रहते हैं।
उन्होंने सभी से सत्त सनातन धर्म की उच्च परम्पराओं का पालन करते हुए अपना इह लोक और उह लोक सुधारने का आह्वान करवाया। इस सुअवसर पर उन्होंने अपनी मधुर वाणी से एक से बढ़कर एक सरस भजन सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध एवं नाचने पर विवश कर दिया।