अम्बिकानगर-अम्ब कॉलोनी समीप रेलवे-स्टेशन क्रासिंग ब्रिज, कंमाडैंट होम गार्डज कार्यालय अम्ब तहसील उपमंडल अम्ब-177203 जिला ऊना-हिमाचल प्रदेश।
*देवभूमि न्यूज 24.इन*
मित्रदेव -मित्रभाव से सराबोर होकर चेतराम आज भी तुंगलघाटी का रास्ता पैदल तय करते आए है। सर्दी, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो इसका चेतराम पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। मित्र देव चेतराम से पहली भेंट लाला लछमण- लच्छू की दुकान पर साठ दशक के मध्यांतर में हुई थी। उस समय तुंगल घाटी में सड़क निकाली जा रही थी। चेतराम का उस सड़क से कोई जयादा सरोकार नहीं था। कोटली स्कूल में कार्यरत मास्टर पीईटी जिंदूराम ने चेतराम को एक बाई साईकिल खरीदने का परामर्श दिया था। चेतराम ने इस सुझाव को ठुकरा दिया था। चेतराम लकीर का पक्का फकीर था। सर्दियों में गांव के बेल्लू गुजर से खरीदी लांघ ( मोटा ऊनी वस्त्र) का लम्बा कोट टांगों तक पहने ग्रामीण चेतराम का उपहास खूब उड़ाते थे। घरवाण प्राईमरी स्कूल में सेवारत काहन सिंह मास्टर जी से चेतराम का हाथापाई की नौबत आई थी। मास्टर काहन सिंह का कहना था कि चेतराम केवल लम्बे कोट के अतिरिक्त कोई भी वस्त्र नहीं पहनता है। “गुरिया गुजर का कहना था कि वह धनीराम कामरेड द्वारा बुलाई गई बैठक में पट्टेदार जांघिया पहनकर चला जाता है।”
लकड़ी चरान की मशीन आरा चलाने वाले लाला राम ने बतलाया था कि यहां तुंगल घाटी में विकासोन्मुखी सर्वांगीण क्रान्ति ले आओ, तुंगल घाटी की मिट्टी से जुड़े ग्रामीण आने वाले सौ सालों में भी अपनी तुंगली संस्कृति की परम्परागत पहचान छोड़ने वाले नहीं है। चेतराम-चलन्त राम का तार्किक मंथन था कि हमारे कुल पुरोहित ब्राह्मण पंडित भवदेव जी, शिमला पैदल जाकर देशी घी बेच आते है तो उसे पंद्रह मील शहर जाकर दूध- घी बेचने में कौन सी कठिनाई है?
सभी चेतराम का प्रत्युत्तर सुनकर निरुत्तर हो जाते थे। चेतराम अरनोडी खड्ड को लांघकर लागधार पहुंच जाता था। कड़-कोह ग्राम में थोड़ा-बहुत पुश्तैनी जमीन थी। पारिवारिक कबीलदारी में बहुत कठिनाई से गुजर बसर होती थी। नगद पैसों की किल्लत-अभाव दूर करने हेतु रोजमर्रा शहर दूध घी बेचना पड़ता था। बरसात में अरनोडी खड्ड उफान पर होती तो जनेतरी धार के रास्ते नालसन-साईगलू निकलने का लम्बा रास्ता तय करना पड़ता था।घरवाण प्राईमरी स्कूल के गुरूजन नंदलाल, मस्तराम और काहन सिंह जी विद्यार्थियों को मेहनतकश चेतराम-चलन्त राम की मेहनतकश गतिविधियों का उदाहरण प्रस्तुत करते थे।
सचमुच चेतराम-चलन्त राम की दिनचर्या प्रात: 3 बजे प्रारम्भ हो जाती थी। कृषक, पशुपालक व दिहाड़ी दार मजदूर चेतराम-चलन्त राम की तमाम गतिविघियों से सभी ग्रामीण अत्याधिक प्रभावित थे। सर्दियों के दिनों में चेतराम-चलन्त राम पांच बजे सुबह सुराड़ी- कोटली से हाथों में जुगणूं मसाल लिए क्रास करता था।
कभी कभी ग्रामीण चेतराम-चलन्त राम को जल्दसिरा राक्षस कहकर भी व्यंग कसते थे। पटनाल-कसाण के पंडित गौरीशंकर को एक बार रात को जच्छणीं की आल जलाशय पर देर रात चेतराम-चलन्त राम वहां के सरल रास्ते जुगणूं लेकर दिखाई दिया तो चिल्लाहट -चीख से सारा गांव जाग गया था। दरअसल सारा दिन शहर में दिहाड़ी दार मजदूर चेतराम-चलन्त राम शार्टकट रास्ते पटनाल- कसाण -घरवाण-बडियार-अरनोडी खड्ड को लांघकर अपने गांव कडकोह-सपलोह पहुंचना चाहता था। पंडित गौरीशंकर पानी की किल्लत-अभाव के चलते रात्रिकालीन दड़बे-टटमोर बावड़ी से पानी की गागर उठाकर लौट रहे थे तो चेतराम-चलन्त राम से टक्कर होकर बेहोश होकर गिर पड़े थे। आसपास के गांवों के ग्रामीण दौड़ कर एकत्रित हुए कि कहीं किसी हिंसक जंगली जानवर ने आक्रमण किया है। जब वहां पर चेतराम-चलन्त राम को पाया तो सभी खिलखिलाकर ठहाके लगा रहे थे।
चेतराम-चलन्त राम का यह दुर्गम सफर सालों साल तक चलता रहा था। वैकल्पिक तौर पर चलाए गए घरवाण प्राईमरी स्कूल बंद हो गया था। बहुत दशकों बाद भी चेतराम-चलन्त राम की यादों की अमिट यादें तरोताजा बनी हुई थी।
कुछ पुराने समकालीन सहपाठियों को चेतराम-चलन्त राम की गतिविधियां मानस पटल पर जस की तस थी। सपलोह गांव के नेकराम पिलपिली ने शहर के व्यास देव जज के घर बतौर नौकरी की थी कि बतलाया कि चेतराम-चलन्त राम को स्वर्ग सिधारे हुए तीस साल से भी ज्यादा समय व्यतीत हो चुका है।
सभी गुरूजन जिंदूराम, मस्तराम, नंदलाल, काहन सिंह स्वर्ग सिधार चुके है।
आजकल चेतराम-चलन्त राम के गांव का कायाकल्प हो चुका है। जगह-जगह अरनोडी खड्ड पर पुल बन चुके है। पक्की सड़कों का जाल बिछाया जा चुका है। भविष्य में युद्ध स्तर पर सपलोह-धर्मपुर-सरकाघाट का हाई वे को साकार किया जा रहा है।
पुराने सहपाठी जब सपलोह गांव पहुंचे तो चेतराम-चलन्त राम के पोते हेमचंद से भेंट हो गई थी।
हेमचंद ने अपने दादा जी की कर्मठ यादों का चित्रण प्रस्तुत कर दिया था। हेमचंद के पिताजी कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे।
सारी पुरानी यादें तरो-ताजा हो गई थी।
सभी चेतराम-चलन्त राम को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करके अपने अपने घरों को लौट आए थे।
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