देवभूमि न्यूज नेटवर्क
नई दिल्ली
ऑपरेशन सिंदूर में मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान की मुश्किलें और भी बढ़ने वाली हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ऐसे एक्शन प्लान पर काम कर रही, जिससे आने वाले वक्त में पड़ोसी मुल्क बूंद-बूंद पानी के लिए तरसेगा। सरकार ने 2029 लोकसभा चुनावों की तैयारी तेज कर दी है। यही वजह है कि सरकार उत्तर भारत के बड़े हिस्से में सिंधु नदी का पानी लाने की योजना पर काम कर रही। यह योजना पहले तकनीकी तौर पर शुरू हुई थी, अब यह राजनीतिक, रणनीतिक और विकास से जुड़ी योजना बन गई है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद सस्पेंड सिंधु जल संधि
पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला लिया था। केंद्र का नया एक्शन प्लान उसी फैसले का नतीजा है। बीते शुक्रवार को दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने एक बड़ी बैठक की। इस बैठक में भारत सरकार के कई बड़े अधिकारी शामिल हुए। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी वहां मौजूद थीं। बैठक में सिंधु-ब्यास लिंक और यमुना रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट पर बात हुई।
खास एक्शन प्लान में जुटी मोदी सरकार
इस योजना का सबसे अहम हिस्सा 14 किलोमीटर लंबी सुरंग है। यह सुरंग ब्यास और सिंधु नदियों को जोड़ेगी। सूत्रों से पता चला है कि इस सुरंग की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) बनाने का काम शुरू हो गया है। देश की बड़ी कंपनी L&T को यह रिपोर्ट एक साल में तैयार करने का काम सौंपा गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह सुरंग बनाना आसान नहीं है। हिमालय का इलाका बहुत मुश्किल है। पहाड़ों की चट्टानों की ताकत का पता लगाने के लिए Geological studies की जाएंगी। जहां चट्टानें कमजोर होंगी, वहां पाइपलाइन बिछाई जाएंगी। इससे निर्माण का काम तेजी से और सुरक्षित तरीके से हो सकेगा।
सुरंग के साथ नहर बनाने पर जोर, इन राज्यों को फायदा
सुरंग के साथ-साथ एक नहर बनाने की योजना भी बन रही है।

इससे राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब को लंबे समय से जो पानी की समस्या हो रही, उससे मुक्ति मिल जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानी की सुरक्षा को हमेशा से ही अहमियत दी है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जोड़ा है। ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के बाद अपने पहले भाषण में उन्होंने कहा था कि आतंक और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। आतंक और व्यापार साथ-साथ नहीं चल सकते। पानी और खून साथ-साथ नहीं बह सकते।
पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, बूंद-बूंद के लिए तरसेगा PAK
इसी के बाद भारत सरकार ने सख्त रुख अख्तियार किया। अप्रैल में सिंधु जल संधि को रोकने के फैसले के बाद से कई पानी से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम तेजी से शुरू हो गया। इनमें से एक है ब्यास नदी को गंगा नहर से जोड़ने वाली 130 किलोमीटर लंबी नहर। इसे यमुना तक बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। यह योजना लगभग 200 किलोमीटर लंबी होगी और इसमें 12 किलोमीटर लंबी सुरंग भी शामिल होगी। इससे यमुना का पानी गंगासागर तक पहुंच सकता है। सरकार का कहना है कि ब्यास-गंगा-यमुना कॉरिडोर पर काम तेजी से चल रहा है और यह दो-तीन साल में पूरा हो सकता है।
कैसे पाकिस्तान को लगेगा झटका, खेती पर असर
भारत के सिंधु जल संधि को रोकने के फैसले से राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर काफी असर पड़ा है। विशेषज्ञों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इससे पाकिस्तान की रबी की फसल पर बुरा असर पड़ सकता है। इससे खेती की योजना बनाने और शहरों में पानी की सप्लाई में दिक्कत आ सकती है। हालांकि, खरीफ की फसलों पर इसका कम असर होने की उम्मीद है, लेकिन लंबे समय में लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और सिंचाई पर इसका बुरा असर पड़ सकता है।
पाकिस्तान ने वर्ल्ड बैंक से की अपील
उधर पाकिस्तान ने वर्ल्ड बैंक से इस मामले में दखल देने की अपील की थी। उसने सिंधु जल संधि से जुड़े नियमों का हवाला दिया था। लेकिन वर्ल्ड बैंक ने दखल देने से मना कर दिया। उसने कहा कि भारत का फैसला उसका अंदरूनी मामला है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि 1950 और 60 के दशक में बनी यह संधि अब सही नहीं है, क्योंकि अब ग्लेशियर पिघल रहे हैं। मानसून अनियमित हो गया है, जनसंख्या बढ़ रही है और ऊर्जा की मांग बढ़ रही है। उनका कहना है कि पाकिस्तान इस समझौते को बदलने या फिर से बातचीत करने को तैयार नहीं है।
केंद्र सरकार ने शुरू की 2029 चुनाव की तैयारी
केंद्र सरकार ने जून में सिंधु जल संधि को रोकने के फैसले के बारे में लोगों को समझाने के लिए एक अभियान शुरू किया है। इस अभियान का मकसद उत्तरी राज्यों के मतदाताओं को यह बताना है कि यह फैसला क्यों लिया गया। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सी.आर. पाटिल और भूपेंद्र यादव पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जाएंगे। वे किसानों, स्थानीय अधिकारियों और सिविल सोसाइटी समूहों के साथ बैठकें करेंगे। इसका मकसद यह बताना है कि यह सिंधु जल संधि का फैसला सिर्फ विदेश नीति से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय संसाधन रणनीति का हिस्सा है। इससे स्थानीय सिंचाई, सूखे से बचाव और पानी की सुरक्षा में मदद मिलेगी