पापकुंशा एकादशी 2025: सभी पापों से छुटकारा दिलाने वाली पापाकुंशा एकादशी कथा-डॉ दीपक दुबे

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  *देवभूमि न्यूज 24.इन*

⭕आश्विन के शुकृपक्षमें जो एकादशी होती है, वह पापांकुशा एकादशी है। वह सब पापों को हरनेवाली तथा उत्तम है। यहां पढ़ें पापांकुशा एकादशी व्रत महात्मय और कथा।

युधिष्ठटिर ने पूछा-मधुसूदन ! अब कृपा करके यह बताएं कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है ? भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले-आश्विनके शुकृपक्षमें जो एकादशी होती है, वह पापांकुशा एकादशी है। वह सब पापों को हरने वाली तथा उत्तम है। उस दिन सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्यों की स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान वासुदेव का पूजन करना चाहिए। पृथ्वी पर जितने तीर्थ हैं, उन सबके सेवन का फल भगवान्‌ विष्णु के नाम कीर्तन मात्र से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। जो भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी यमलोक की यातना नहीं भोगनी पड़ती। जो पुरुष विष्णुभक्त होकर भगवान्‌ शिव की निन्दा करता है। वह भगवान्‌ विष्णु के लोक में स्थान नहीं पाता। उसे निश्चय ही नरक में गिरना पड़ता है| यह एकादशी स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाली, शरीर को निरोग बनाने वाली तथा सुन्दर स्त्री, धन एवं मित्र देनेवाली है।

कथा के अनुसार विंध्य पर्वत पर एक बहेलिया रहता था। वह बहुत ही क्रूर था। उसका सारा जीवन पाप कर्म में निकल गया। जब उसका अंतिम समय आया तब यमराज के दूत बहेलिए को लेने आए । यह बात सुनकर बहेलिए बहुत भयभीत हो गया। महर्षि अंगिरा के चरणों में गिरकर प्रार्थना करने लगा और बोला कि मैंने जीवन भर पाप कर्म किए हैं। कृपा कर आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं। उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने को कहा। बहेलिए ने यह व्रत किया और किए गए सभी पापों से छुटकारा पा लिया। इस व्रत पूजन के बल से बहेलिया भगवान विष्णु के लोक को गया।

जो पुरुष सुवर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, जूते और छाते का दान करता है, वह कभी यमराज को नहीं देखता। जो होम, स्नान, जप, ध्यान और यज्ञ आदि पुण्यकर्म करनेवाले हैं, उन्हें भयंकर यम यातना नहीं देखनी पड़ती ।

एकादशी को दिन में व्रत और रात्रि में जागरण करने से ही विष्णुधाम की प्राप्ति हो जाती है। वह पुरुष मातृ-पक्षकी दस, पिता के पक्षकी दस तथा खस्त्री के पक्षकी भी दस पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। एकादशी व्रत करने वाले मनुष्य दिव्यरूपधारी, चतुर्भुज, गरुड़ की ध्वजासे युक्त, हार से सुशोभित ओर पीताम्बरधारी होकर भगवान्‌ विष्णु के धाम को जाते हैं।

           *🚩हरिऊँ🚩*