कुल्लू दशहरा देवी देवताओं का महाकुंभ,अयोध्या से लाई गई थी रघुनाथ की अंगुष्ठ मूर्ति

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देवभूमि न्यूज नेटवर्क
कुल्लू
हिमाचल प्रदेश

भगवान रघुनाथ के सम्मान में मनाया जाने वाला कुल्लू दशहरा 365 साल का हो गया है। 1650 ईसवी को भगवान रघुनाथ की अंगुष्ठ मूर्ति को अयोध्या से राजा जगत सिंह को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए लाया गया था। मूर्ति दामोदर दास द्वारा लाई गई। मूर्ति को लाने के लिए उन्हें त्रेतानाथ मंदिर में एक साल तक पुजारियों की सेवा करनी पड़ी थी। भगवान रघुनाथ की मूर्ति को 1650 ईसवी को अयोध्या से कुल्लू लाया गया था, लेकिन कुल्लू का दशहरा 1660 ईसवी से मनाना शुरू किया गया था।

जानकारी के अनुसार सन 1650 ईसवी में कुल्लू रियासत के राजा जगत सिंह ने अपनी राजधानी नग्गर से सुल्तानपुर स्थानांतरित की। तब एक दिन राजा को किसी दरबारी ने सूचना दी कि मडोली (टिप्परी) गांव के ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास सुच्चे मोती हैं। राजा ने उससे सुच्चे मोती मांगे, लेकिन उसके पास मोती नहीं थे। राजा के भय से दुर्गादत्त ने अपने परिवार सहित स्वयं को अग्नि में जला कर समाप्त कर दिया। इसके बाद राजा को ब्रह्महत्या के दोष के कारण रोग लग गया।

ब्रह्महत्या के दोष के निवारण के लिए राजा जगत सिंह के राजगुरु तारानाथ ने उन्हें सिद्धगुरु कृष्णदास पयहारी से मिलने को कहा। पयहारी बाबा ने अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर में अश्वमेध यज्ञ के समय निर्मित राम-सीता की मूर्तियों को कुल्लू में प्रतिष्ठापित करने को कहा और उन्होंने अपने शिष्य दामोदर दास को अयोध्या से राम-सीता की मूर्तियां लाने का कार्य सौंपा। दामोदर दास त्रेतानाथ मंदिर में एक वर्ष तक पुजारियों की सेवा करते हुए पूजा विधि को समझते रहे। एक दिन वे राम-सीता की मूर्तियों को उठाकर हरिद्वार पहुंचे। अयोध्या का गुटका सिद्धि का ज्ञाता जोधावर भी उनके पीछे हरिद्वार पहुंच गया। दामोदर दास वहां राम-सीता की पूजा कर रहे थे।

जोधावर ने पूछा कि तुम मूर्तियां क्यों चुरा लाए। दामोदर दास ने कहा मैं इन मूर्तियों को कुल्लू के राजा जगत सिंह को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति दिलाने के लिए ले जा रहा हूं। भगवान रघुनाथ भी कुल्लू आना चाहते हैं, यदि विश्वास नहीं है तो मूर्तियों को उठाकर ले जाओ। जोधावर मूर्ति उठाने लगा लेकिन उससे अंगुष्ठ मात्र मूर्तियां उठाई नहीं गईं। जबकि दामोदर दास ने मूर्तियों को उठा लिया था।

इसके बाद मूर्तियां गड़सा घाटी के मकराहड़, मणिकर्ण, हरिपुर, नग्गर होते हुए आश्विन की दशमी तिथि को कुल्लू पहुंचीं। यहां भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में देवी-देवताओं का बड़ा यज्ञ हुआ। तब से कुल्लू का दशहरा धूमधाम से मनाया जाने लगा। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने कहा कि मूर्ति को 1650 ईसवी को लगाया था। लेकिन सुल्तानपुर में यह मूर्ति 1660 ईसवी को पहुंची थी। उन्होंने कहा कि देवी-देवताओं का महाकुंभ कुल्लू का दशहरा भगवान रघुनाथ के सम्मान में मनाया जाता है।