*देवभूमि न्यूज 24.इन*
⭕भगवान का जन्मदिन जन्माष्टमी और रामनवमी तो हम सभी मनाते हैं और भगवान को बाहर खोजते फिरते हैं, लेकिन क्या भगवान बाहर हैं। क्या हम अपने अंदर भगवान को नहीं जगा सकते हैं। भगवान का साक्षात साक्षात्कार नहीं कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कैसे हम अपने अंदर भगवद् तत्व को जागृत कर सकते हैं।
संसार में शरीर तो बहुत जन्म लेते हैं और मर जाते हैं, उनको कौन याद करता है। पर श्री कृष्ण की देह 5000 साल पहले आई और उसमें भगवान प्रकट हुए। इसलिए गीता में कहा गया है भगवान उवाच, यानी श्री कृष्णा की देह के अंदर भगवान बोले। तो ये जो जन्म अंदर हुआ वो भगवान का जन्म हुआ। श्री कृष्ण तो बाहर के शरीर का नाम था। भगवान तो अंदर वो निराकार स्वरूप है जो साकार बनकर श्रीकृष्ण की देह में प्रकट हुए।
तो इसलिए हम कहते हैं श्री कृष्ण भगवान! पर श्री कृष्ण भगवान की देह भी चली गई क्योंकि देह तो मरणशील काया है। तो जन्माष्टमी और श्रीकृष्ण पर हम जो ये सजावट और उल्लास देखते हैं, जो जन्मदिन मना रहे हैं तो किसका! श्री कृष्ण का जन्मदिवस नहीं पर भगवान का कि भगवान उतरे, श्री कृष्ण की देह में अवतरित हुए। तो हर देह भगवान की ही तो है।
तुम्हारी और हमारी देह किसने बनाई, उसी ‘एक’ ने! वही एक है जिसने श्री कृष्ण की देह बनाई, श्री राम की देह बनाई, सभी भगवता उपलब्ध लोगों की देह चाहे वो बुद्ध हो, महावीर हो, गुरु नानक देव, कबीर, फरीद, मीरा, सहजो, लल्ला, लाओत्से, सुकरात, संत नामदेव, संत तुकाराम हों । सबकी देह, तेरी और मेरी देह भी उस ‘एक’ ने ही बनाई। आज हम इस युग में देखें तो सबने हमारी तरह ही जन्म लिया था। बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद, कबीर, फरीद, मीरा, सहजो, लल्ला, लाओत्से, सुकरात, संत नामदेव, इनके अंदर भगवान प्रकट हुए क्योंकि आज हम बुद्ध को भगवान कहते हैं, महावीर को भगवान कहते हैं, गुरु नानक देव को भगवान कहते हैं, जीसस को भगवान का दूत कहते हैं, साईं बाबा को भगवान कहते हैं।

तो इतने भगवान या भगवान के दूत कैसे हुए जबकि इनकी देह भी हमारे जैसी थी, क्योंकि देह में भगवान अवतरित होते हैं। उस देह में अवतरित होते हैं जो अंदर से माया को बाहर निकाल लेते हैं। कहते हैं जिसके अंदर माया है वो शैतान है पर जिसके अंदर भगवान आ गया यानी माया नहीं है वो भगवान हो गया, माया क्या है? मैं-मेरा माया है।
जो कुछ बाहर दिखाई देता है, जो सुनाई देता है जिसको तू मैं-मैं-मैं कहता है, मैं डॉक्टर, मैं मिनिस्टर, मैं चार्टर्ड अकाउंटेंट, मैं स्टार! ये जिसको तू ‘मैं’ कहता है पर सिर के बाल से लेकर पाँव के नाखून तक तेरा कुछ भी नहीं है! तेरा क्या है, कुछ भी नहीं! जब शरीर में तेरा कुछ नहीं तो क्या मेरा! क्या मेरा बँगला, क्या मेरी गाड़ी! श्वास निकल जाए तो गिर जाएगा, शरीर को उठाना पड़ता है और चिता जला देते हैं क्योंकि उसमें एक रुपए का भी सामान नहीं है जो रखा जा सके।
तो यही जन्माष्टमी, रामनवमी के दिन का संदेश है, जन्माष्टमी मनाओ, खूब मनाओ कि श्री कृष्ण की देह में भगवान अवतरित हुए पर तेरी देह में तू कब भगवान को लाएगा? हनुमान जी ने भी रामजी को प्रकट कर लिया पर तू कब लाएगा? बुद्ध ने भी किया, महावीर ने, जीसस ने, मोहम्मद साहब ने, कबीर ने, फरीद ने, मीरा, सहजो, लल्ला, लाओत्से, सुकरात ने किया पर तू कब लाएगा। अंदर से माया को बाहर कर, तू भिखारी है।
जिस दिन तू समझ गया कि मैं अफसर, मिनिस्टर, स्टार ये सब नहीं हूं तो तू भगवता को उपलब्ध होगा। उस दिन श्री कृष्ण भगवान पारब्रह्म तेरे ऊपर फूलों की बारिश करेंगे। पूरा ब्रह्मांड तेरे ऊपर फूलों की बरसात करेगा। यही तो श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण भगवान कह रहे हैं कि क्या लाया था और क्या ले जाएगा। भिखारी की तरह खाली हाथ आया और जाएगा भी खाली हाथ भिखारी की तरह। आज जो तेरा है वो कल किसी और का था, कल किसी और का हो जाएगा। इसलिए कहा हे मूर्ख! इस मरने वाले शरीर पर बिल्कुल भी गर्व मत कर, अंदर उस आत्मचेतन को देख जो तेरे देह के अंदर भगवान को लेकर आएगा। जो शरीर में, माया में जीते हैं वो भगवान को कभी नहीं देख पाते। वो सिर्फ मूरत को देख लेंगे, आज मंदिरों में सजी हुई मूर्ति मिलेंगी पर सूरत को नहीं देख पाएंगे यानी साक्षात् श्रीकृष्ण भगवान को नहीं मिल पाएंगे, साक्षात राम भगवान को नहीं मिल पाएंगे। अगर साक्षात से साक्षात्कार करना है तो अंदर से माया को बाहर करना पड़ेगा यानी मैं कुछ भी नहीं हूँ यह भाव लाना होगा।
*🚩हरिऊँ🚩*