अच्छे कार्य के लिए मुहूर्त नहीं देखें

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 *देवभूमि न्यूज 24.इन*

⭕हम सभी की इच्छा अच्छे कार्य करने की होती है, लेकिन हम अकसर उसे टाल देते हैं। हम उसे तुरंत करने के बजाय यह सोचने में समय बिता देते हैं कि कोई अच्छा समय देखकर यह कार्य करेंगे। जबकि अच्छा कार्य करने के लिए किसी मुहूर्त की जरूरत नहीं होती, वह जीवन में कभी भी किया जा सकता है।

हमें मिथ्यात्वरूपी परिग्रह को छोड़ना पड़ेगा, यही जन्म-मरण का कारण है। जन्म और मरण के बीच में है— ‘जरा’। हमें इसका भी संहार करना है। भगवान ने जब इन तीनों को नहीं चाहा तो भक्त को भी इन तीनों को नहीं चाहना चाहिए।

संसारी व्यक्ति को रास्ता बताने की जरूरत पड़ती है। जिस प्रकार आकाश में अनेक पक्षी उड़ते हैं पर उनके पद-चिह्न नहीं पड़ते हैं। उसी प्रकार मोक्ष के रास्ते में अनेक व्यक्ति चलते हैं, पर चिह्न नहीं पड़ते। नमस्कार हमें किस लक्ष्य को लेकर करना है? यह हमें देखना है। अनेक व्यक्ति रात-दिन भगवान का नाम लेते हैं, उपासना करते हैं। तन-मन-धन व वचन से नाम लेते हैं पर इससे ऊपर भी एक चीज है, वह है लक्ष्य की ओर ध्यान देना, निदान की ओर ध्यान देना। जब तक रोग का निदान नहीं होगा, तब तक रोगी का रोग दूर नहीं होगा, उसी प्रकार हमें भी लक्ष्य को पहले देखना होगा। हमें यह देखना होगा कि जिस वस्तु (लक्ष्य) को हम चाह रहे हैं, उसे प्राप्त करने का रास्ता भिन्न तो नहीं है, हमारी गति दूसरी दिशा की ओर तो नहीं है।

परिग्रह महा खतरनाक है, जिसको आप लोग अच्छा मानते हैं। बाह्य परिग्रह से भी ज्यादा अभ्यंतर में मिथ्यात्व सबसे बड़ा परिग्रह है। स्थिति क्या है हमारी? हम बहुत संतप्त हैं, तड़प रहे हैं। पर हवा ठंडी नहीं है, पानी भी शीतल नहीं है। अनंतकाल से यही मिथ्यात्व रूपी हवा हमें लग रही है, और जब तक ऐसी हवा लगती रहेगी, तब तक हमारे नमस्कार, उपासना को भगवान स्वीकार नहीं कर सकते। उपासना तो दुनिया में सब करते हैं, पर कोई विषय-वासना की पुष्टि के लिए, शरीर की रक्षा करते हुए डॉक्टर के कहने पर रस त्याग करते हैं। पर उपासना—उपासना, त्याग-त्याग में फर्क होता है। डॉक्टर के कहने से एक बार भोजन करने का नियम ले लेने से, रस त्याग कर देने से कोई व्यक्ति त्यागी-मुनि नहीं बन सकता है। एक को जीने की, संपोषण की, शरीर को रखने की, पर की इच्छा है। वहां मुनि का त्याग भिन्न है। हम नमस्कार तो कर रहे हैं, पर अलग ही लक्ष्य को लेकर। संतान के न होने पर, रोगी होने पर, कचहरी में मुकदमा जीतने के लिए उपासना करना मिथ्यात्व है, विपरीत उपासना है। इससे संसार का अभाव, चारों तरफ की भटकन कभी नहीं रुकेगी। वासना, तृष्णा के पीछे भटकते हुए हमारी यही गति हो रही है।

जो भगवान की दृष्टि है, वही भक्त की दृष्टि होनी चाहिए। भिन्न दृष्टि होने पर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। हम में यह विवेक नहीं है कि उपासना किसलिए करनी है। तो सबसे बढ़िया यही है कि सुबह उठकर चक्की को धोक दें, जिसके चलाने से कम-से-कम आटा तो मिलेगा, भगवान से क्या मिलेगा?

हमें मिथ्यात्वरूपी परिग्रह को छोड़ना पड़ेगा, यही जन्म-मरण का कारण है। जन्म और मरण के बीच में है—‘जरा’। हमें इसका भी संहार करना है। भगवान ने जब इन तीनों को नहीं चाहा तो भक्त को भी इन तीनों को नहीं चाहना चाहिए। हमें तो मृत्युंजयी बनने की कोशिश करना चाहिए, जो इस उद्देश्य को लेकर चलेगा, उसका रास्ता समीचीन बनता चला जाएगा। इस मिथ्यात्वरूपी परिग्रह को हमें गृहस्थाश्रम में ही छोड़ना है, बाकी परिग्रह तो बहुत जल्दी अपने आप छूट जाएंगे।

अनादिकाल से जो बुरे कर्म अर्जित हैं, वह भी एक बार नमस्कार, स्तुति करने से नाश हो जाते हैं। जैसे बहुत सारे कचरे को दियासलाई से जरा जलाने पर वह जलकर राख हो जाएगा और उस राख को हवा उड़ाकर ले जाएगी। हालांकि नमस्कार स्तुति का फल मिलता है, पर वह फल संसार वृद्धि का कारण नहीं होना चाहिए। हमें विषय-वासना आदि के लिए स्तुति, उपासना नहीं करनी है।

यद्यपि कीचड़ में कमल है पर सुरक्षित है, उसका लक्ष्य काई से अलग रहना है। हमें लक्ष्य कमल के फूल के समान कीचड़ से अलग होने का बनाना है। हमें प्रभु के सामने कोर्ट केस में जीतने,धन-वैभव बढ़ाने आदि संसार वृद्धि के लिए स्तुति नहीं करनी है।

दृष्टि में (उपयोग में) समीचीनता है, तो वचनों में भी समीचीनता आ जाती है। नमस्कार के लिए अंदर का उपयोग जरूरी है, समय, क्षेत्र आदि का ज्यादा महत्व नहीं है। स्तुति, गुरु के न होने पर भी फल देगी, क्योंकि गुरु तो हृदय में विराजे हुए हैं। गुरु प्रत्यक्ष में हों या न हों पर गुरु के प्रति विनय होनी चाहिए। गुरु के प्रति आत्मसमर्पण करने पर ही (विद्या) फल की प्राप्ति होगी। हमें शब्दों में नहीं उलझना है, भाव को पकड़ना है। शब्दों में उलझकर समय व शक्ति खर्च नहीं करनी है। महावीर भगवान का कहना है कि आठ साल की उम्र के बाद अच्छे कार्य करने के लिए जीवनभर मुहूर्त है।

        *🚩हरिऊँ🚩*