हमें तय करना होगा कि हम विनाश की राह पर आगे बढ़ेंगे या प्रकृति के साथ पुनर्संतुलन की दिशा में कदम बढ़ाएं – गुमान सिंह

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  *देवभूमि न्यूज 24.इन*

हिमालय बचाओ नीति के संयोजक गुमान सिंह ने प्रैस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि हमारे हिमालय जो हमारे देश की धरोहर के साथ साथ जीवन रेखा है। आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। हिमाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य जलवायु परिवर्तन, अवैज्ञानिक अव्यवस्थित, विकास और बढ़ती आपदाओं के प्रभावों को प्रत्यक्ष रूप से झेल रहे हैं। यह एक निर्णायक समय है
जब हमें तय करना होगा कि हम विनाश की राह पर आगे बढ़ेंगे या प्रकृति के साथ पुनर्संतुलन की दिशा की ओर कदम बढ़ा रहे है। औद्योगिक विकास की क्रांति के बाद आज के मौजूदा समय में पृथ्वी का औसत तापमान 1,2*C बढ़ चुका है हिमालय क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दो गुना तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे यहां की पारिस्थितिकी हिमनद और जल स्रोतों पर गंभीर संकट खड़ा हो रहा है। अंतराष्ट्रीय समझौतों के बावजूद, कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं हो पाई है विकसित देश जो विकासशील देशों की तुलना में कहीं अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं और अपने दायित्वों से पीछे हट रहे हैं, वहीं भारत जैसे विकासशील देश न्यायपूर्ण जलवायु समाधान के लिए तकनीकी सहयोग और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
इसी संदर्भ में 15,16 नवम्बर को दो दिवसीय हिमालय बचाओ सम्मलेन मंडी मुख्यालय साक्षरता भवन मंडी निकट सोलीखड्ड (हि ,प्र)में रखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश में असामान्य बारिश, हिमखंडों के पिघलने के कारण हिम नदियों में बाढ़ और भयंकर भूस्खलन जैसी आपदाओं ने हजारों परिवारों को प्रभावित करके बेघर कर दिया है। इन आपदाओं के पीछे सिर्फ प्रकृति का क्रोध नहीं बल्कि हमारे असंतुलन विकास मॉडल की अहम भूमिका भी है वनों की अंधाधुंध कटाई, नदी घाटियों में अव्यस्थित निर्माण, जल स्रोतों की अनदेखी और पर्यावरण आकलन के बिना सड़कों व अन्य परियोजनाओं का विस्तार इसके प्रमुख कारण हैं।
इन आपदाओं के कारण ही हजारों परिवार भूमिहीन के साथ बेघर हो चुके हैं बल्कि 2023की आपदा से प्रभावित लोग आज तक पुनर्वास की प्रतिक्षा में हैं, जबकि हर साल नई आपदाएं और नए विस्थापनो की संख्या बढ़ती जा रही है, केंदीय बन और पर्यावरण कानूनों के कारण प्रदेश सरकार पुनर्वास की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा पा रही है, क्योंकि हिमाचल का लगभग 67 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, और राज्य के पास पर्याप्त गैर वन भूमि उपलब्ध नहीं हैं।
अंधाधुंध सड़के, बिजली या पर्यटन का विस्तार विकास का प्रतीक नही हो सकते हैं सच्चा विकास वह है जो जीवन की गुणवत्ता, पारिस्थितिक संतुलन ओर स्थानीय समुदायों की आत्मनिर्भरता को मजबूत करे, कुल्लू, मंडी, शिमला, किन्नौर, ओर लाहुल स्पीति क्षेत्रों में अति पर्यटन, भूमि क्षरण और अन्य संसाधनों पर बढ़ते दवाब से खतरे की घंटी बज गई हैं। अभी भी वक्त है कि विकास की दिशा बदलकर पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (ईको रिस्टोरेशन,) जल ग्रहण क्षेत्र प्रबंधन ( वाटरशेड मैनेजमेंट) और सतत आजीविका पर ध्यान केंद्रित करना होगा,
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था, कृषि, बागवानी, वानिकी, और पर्यटन पर आधारित है। आज के बदलते समय के साथ पहाड़ों के लोगों के सामने नई चुनौतियों और नए अवसर दोनों है। इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर सामूहिक चर्चा और समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के उद्वेश्य से तारीख 15_16 नवम्बर 2025 को मंडी में दो दिवसीय हिमालय सम्मेलन किया जा रहा है। सभी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं शोधकर्ताओं, और बुद्धिजीवी नागरिकों से आग्रह करते हैं कि इस जनजागृति पहल में शामिल हो कर अपने अमूल्य विचार, अनुभव, और सहयोग साझा करें।
इस दो दिवसीय हिमालय सम्मेलन के आयोजक –
एकल नारी शक्ति संगठन, भूमि अधिग्रहण प्रभावित मंच, हिमालय नीति अभियान, हिम लोक जागृति मंच, हिमाचल ज्ञान – विज्ञान समिति, हिम धरा पर्यावरण समूह, जिभी वैली टूरिज्म डेवलपमेंट ( बंजार)एसोसिएशन , लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान, मंडी साक्षरता समिति, पीपल फॉर हिमालय अभियान, पर्वतीय महिला अधिकार मंच, सेव हिमालय लाहुल स्पीति,सामाजिक आर्थिक समानता के लिए जन अभियान,, आदि की सक्रिय भागीदारी से ही संभव व सफल हो पाएगा,

जय हिमाचल
जय सुंदर हिमाचल,