शिलाई क्षेत्र में चालदा महासू महाराज के पशमी प्रवास को लेकर चर्चा तेज, शिलाई खत के जेलदार की जगह मस्तभोज के नंबरदार पर उठे सवाल

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देवभूमि न्यूज नेटवर्क
सिरमौर/शिलाई

चालदा महासू महाराज जब भी किसी स्थान की ओर प्रस्थान करते हैं, तो पारंपरिक रीति के अनुसार उनकी पूज उठाने की प्रथम विधि खत के मुखिया जेलदार द्वारा ही की जाती है। 52 गाँवों की शिलाई खत, जिसका मुख्यालय शिलाई गाँव है, परंपरागत रूप से इस दायित्व को निभाती आई है।
शिलाई क्षेत्र के कोटी गांव स्थित चालदा महासू महाराज 12 वर्ष बाद शिलाई क्षेत्र के 52 गाँवों की परिक्रमा (ब्रवांश) करते हैं, जो 12 दिनों व 12 रात्रियों में पूरी होती है। इस पूरी धार्मिक यात्रा की पूजा–व्यवस्था और पड़ाव निर्धारण ठेंडाऊ के निर्देशानुसार होता है, जिसे पूरी खत मान्यता देती है।
कोटी गांव में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कोटी पंचायत के कोटी गाँव में स्थित चालदा महासू का इतिहास 14वीं शताब्दी से जुड़ा है। मान्यता है कि ठेंडाऊ के साथ ओजोउ द्वारा हुए अत्याचार के कारण चालदा महाराज को शिलाई आना पड़ा एक मछली के विवाद में शिलाई गांव के 18 लोगों की हत्या की गई जिसके बाद इंसाफ के लिए चालदा महासू शिलाई आए और बाद में ठेंडाऊ ने उन्हें अपनी खत के कोटी गांव में स्थापित किया।
आज भी मान्यता है कि शिलाई क्षेत्र के लोगों के बिना चालदा महासू कोटी मंदिर से बाहर नहीं आते।
मुद्दा गर्म—शिलाई का जेलदार क्यों नहीं गया?
इस बार, उत्तराखंड से पश्मी क्षेत्र में चालदा महाराज के आगमन को लेकर जहाँ लोगों में उत्साह है, वहीं एक चर्चा जोर पकड़ रही है
खत का पारंपरिक मुखिया (शिलाई का जेलदार) देवता को उठाने के लिए नहीं पहुँचा।
स्थितियां ऐसी बनीं कि
पश्मी क्षेत्र की 9 गांव मस्तभोज खत के जेलदार सबलाइक तथा प्रदेश के उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान द्वारा देवता की अगुवाई करनी पड़ी।
इसी कारण लोगों में यह प्रश्न उभर रहा है कि क्या चालदा महासू अब मस्तभोज के 9 गांव की खत पर अपना अख्तियार जमा देंगे?
क्या 9 गांव को भी भविष्य में ब्रवांश जैसी पूजन परंपरा निभानी पड़ेगी?
सिरमौर के इतिहास में पहला अवसर
13 दिसंबर को चालदा महासू महाराज उत्तराखंड से हिमाचल की सीमा में प्रवेश करेंगे और शिलाई उपमंडल के द्राबिल गांव में पहुँचेंगे। अगले दिन वे पश्मी गांव की ओर प्रस्थान करेंगे।
सिरमौर के इतिहास में पहली बार चालदा महासू इस क्षेत्र में आ रहे हैं—
लेकिन यहाँ आश्चर्य यह है कि शिलाई खत की परंपरागत जिम्मेदारी निभाने के बजाय मस्तभोज खत का नंबरदार इसकी अगुवाई कर रहा है।