देवभूमि न्यूज 24.इन
सिरमौर जिला के उपमंडल शिलाई की ग्राम पंचायत कुंहट से मानवता को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां दो नाबालिग सगे भाई—अरुण और विजय—आज बेसहारा जिंदगी जीने को मजबूर हैं, जबकि प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना विशेष रूप से ऐसे ही बच्चों के लिए बनाई गई है।
जानकारी के अनुसार इन दोनों बच्चों की माता पहले ही उन्हें और उनके पिता को छोड़कर चली गई थी। इसके बाद पिता गंभीर बीमारी की चपेट में आए और कुछ समय पश्चात उनका निधन हो गया। पिता की मृत्यु के बाद दोनों भाई पूरी तरह अनाथ हो गए। उनका पुश्तैनी घर भी जर्जर हालत में है, जहां रहना जान जोखिम में डालने जैसा है।
बच्चों की इस दयनीय स्थिति को देखकर एक पड़ोसी ने मानवता दिखाते हुए उन्हें अपने घर में आश्रय दिया। लेकिन वह व्यक्ति स्वयं दिहाड़ी-मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। सीमित साधनों के चलते वह किसी तरह भोजन और रहने की व्यवस्था तो कर पा रहा है, लेकिन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और भविष्य की जिम्मेदारी उठाना उसके सामर्थ्य से बाहर है, क्योंकि उसके अपने बच्चों की जिम्मेदारियां भी उसी पर हैं।
बताया जा रहा है कि उक्त व्यक्ति ने कई बार इस गंभीर मामले को लेकर एस.डी.एम. शिलाई और स्थानीय विधायक से गुहार लगाई, लेकिन हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी। न तो प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम उठाया गया और न ही जनप्रतिनिधियों ने संवेदनशीलता दिखाई।
सबसे हैरानी की बात यह है कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बेसहारा बच्चों के लिए मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना चलाई जा रही है, जिसके तहत बच्चों को निःशुल्क शिक्षा, भोजन और आवास की सुविधा दी जाती है। इसके बावजूद अरुण और विजय इस योजना से आज तक वंचित क्यों हैं? क्या स्थानीय अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और तथाकथित समाज के ठेकेदारों को इस योजना की जानकारी नहीं है, या फिर “कौन पचड़े में पड़े” जैसी मानसिकता के चलते इस मामले को जानबूझकर टाल दिया गया?
प्रश्न यह भी उठता है कि यह मामला अब तक मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया। यह सर्वविदित है कि मुख्यमंत्री ऐसे मामलों में अत्यंत संवेदनशील हैं। कुछ दिन पूर्व जिला चंबा की बझोतरा पंचायत में सामने आए इसी तरह के एक मामले में मुख्यमंत्री ने स्वयं अनाथ बच्चों से वीडियो कॉल पर बात कर उन्हें मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना के तहत हरसंभव मदद का आश्वासन दिया था।
फिर कुंहट पंचायत के अरुण और विजय के साथ यह भेदभाव क्यों? क्या प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही इसके लिए जिम्मेदार है, या जनप्रतिनिधियों की उदासीनता? आखिर इन मासूम बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब यह देखना अहम होगा कि इस खबर के सामने आने के बाद जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार कितनी संवेदनशीलता दिखाती है और कब तक अरुण व विजय को उनका हक सम्मान, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य मिल पाता है।