देवभूमि न्यूज 24.इन
धर्म एवं संस्कृति की रक्षा हेतु अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों के बलिदान दिवस ‘वीर बाल दिवस’ के अवसर पर एक श्रद्धापूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद श्री सुरेश कश्यप मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अध्यक्ष श्री केशव चौहान ने की, जबकि कार्यक्रम के संयोजक श्री परमजीत चड्ढा रहे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री सुरेश कश्यप ने “वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह” के उद्घोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि वीर साहिबजादों और दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी को स्मरण करते हुए मन शोक से भी भर जाता है और गर्व से भी। जिन बच्चों ने जीवन को ठीक से देखा भी नहीं था, उन्हें अत्यंत क्रूरता के साथ शहीद किया गया, किंतु उन्होंने धर्म के समक्ष कभी भी शीश नहीं झुकाया।
उन्होंने माता गुजरी जी के त्याग, धैर्य और संस्कारों को नमन करते हुए कहा कि बाबा जोरावर सिंह (9 वर्ष) और बाबा फतेह सिंह (7 वर्ष) ने लोभ, भय और दबाव के बावजूद अपने धर्म से विचलित होना स्वीकार नहीं किया और सिंहों की भांति वीरगति को प्राप्त हुए। यह माता गुजरी जी द्वारा दिए गए संस्कारों का ही परिणाम था कि साहिबजादों में गुरु परंपरा के मूल्य कूट-कूट कर भरे थे।
श्री कश्यप ने कहा कि विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण अत्यंत दुर्लभ है, जहाँ किसी पिता ने धर्म की रक्षा के लिए स्वयं, अपनी माता और अपने चारों पुत्रों का बलिदान दिया हो। इसी कारण गुरु गोबिंद सिंह जी को “सरबंस दानी” कहा जाता है। यह कोई सरकारी उपाधि नहीं, बल्कि राष्ट्र की जनता द्वारा दिया गया सर्वोच्च सम्मान है।
उन्होंने नवम गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान को स्मरण करते हुए कहा कि कश्मीर के पंडितों की रक्षा के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मात्र आठ वर्ष की आयु में बालक गोबिंद राय द्वारा अपने पिता से धर्म की रक्षा हेतु बलिदान देने का आग्रह भारतीय इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। दिल्ली स्थित सीसगंज गुरुद्वारा आज भी देशभक्तों और श्रद्धालुओं के लिए महान तीर्थ स्थल के रूप में विद्यमान है।
उन्होंने कहा कि यदि नवम गुरु और दशम पिता न होते, तो आज न हिंदू धर्म बचता और न ही सिख परंपरा। हमारी धर्म और संस्कृति का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता। इसी कारण गुरु तेग बहादुर जी को “हिंद की चादर” कहा गया। दशम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी में वीरता और बलिदान दोनों का अद्वितीय संगम था। चमकौर साहिब के युद्ध में उन्होंने अपने पुत्रों को हँसते-हँसते धर्म रक्षा हेतु बलिदान के लिए भेजा, जो अद्वितीय साहस और समर्पण का उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जब चारों साहिबजादों की शहादत का समाचार आया और यह प्रश्न उठा कि अब क्या शेष रहा, तब गुरु गोबिंद सिंह जी के वचन—
“चार मुए तो क्या हुआ, जीवित कई हजार”
त्याग, धैर्य और दृढ़ संकल्प की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं।
इस अवसर पर श्री सुरेश भारद्वाज, श्री कर्ण नंदा, श्री कमलजीत सूद, श्री संजय सूद, श्री संजीव कटवाल, श्री संजीव दृष्टा, श्रीमती रमा ठाकुर, श्री गौरव कश्यप, श्री विजय परमार सहित अनेक वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।