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देवभूमि कहे जाने वाले हमारे पहाड़ी क्षेत्र में यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि क्या देव आस्था के नाम पर आज भी जीव हत्या और नशावृत्ति को जायज़ ठहराया जाएगा? जिन देवताओं को न्याय, करुणा और लोक कल्याण का प्रतीक माना जाता है, उन्हीं के नाम पर पशुओं की बलि और नशे का खुलेआम प्रदर्शन हमारे समाज की चेतना पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।
स्थानीय देव मेलों और जातरों में होने वाली जीव हत्या किसी भी रूप में आस्था नहीं, बल्कि हिंसा का खुला प्रदर्शन है। यह न तो परंपरा का सम्मान है और न ही देवताओं की मर्यादा। यदि देव प्रसन्नता के लिए रक्त बहाना आवश्यक होता, तो फिर करुणा और दया जैसे शब्दों का अर्थ ही समाप्त हो जाता। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक ओर हम स्वयं को सुसंस्कृत समाज कहते हैं और दूसरी ओर ऐसी कुप्रथाओं को ढोते चले जा रहे हैं।
इससे भी अधिक शर्मनाक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब धार्मिक आयोजनों में शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन सामान्य बात बना दिया जाता है। नशे में धुत्त होकर होने वाले विवाद, मारपीट और अव्यवस्था न केवल देव स्थलों की गरिमा को तार-तार करते हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र को बदनामी की ओर धकेलते हैं। क्या यही देव आस्था है?
इसी पृष्ठभूमि में हाटी समिति के महासचिव कुंदन शास्त्री की चेतावनी को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि देवताओं के नाम पर जीव हत्या और नशावृत्ति हमारी सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का प्रतीक है। उनका कहना है कि परंपरा के नाम पर अमानवीय कृत्यों को ढोते रहना समाज को अंधकार की ओर ले जाएगा। यह आवाज़ किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि जागरूक समाज की पुकार है।
आज प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रथा कब से चली आ रही है, बल्कि यह है कि इसे अब तक क्यों ढोया जा रहा है। परंपराएं समाज को दिशा देती हैं, लेकिन जब वही परंपराएं हिंसा, भय और नशे को बढ़ावा देने लगें, तो उन्हें चुनौती देना ही सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी बन जाती है।
देव समितियों, पंचायतों और प्रशासन की चुप्पी भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है। यदि समय रहते सख्त निर्णय नहीं लिए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें निर्दयी और संवेदनहीन समाज के रूप में याद करेंगी।
अब भी समय है। देव आस्था को रक्त और नशे से मुक्त करने का संकल्प लेना होगा। हाटी समिति जैसे सामाजिक मंचों और कुंदन शास्त्री जैसे जागरूक विचारकों की आवाज़ को समाज का समर्थन मिलना चाहिए। देवता भय नहीं, विवेक चाहते हैं। हिंसा नहीं, मानवता चाहते हैं।
यदि आज हमने जीव हत्या और नशावृत्ति के विरुद्ध स्पष्ट और कठोर रुख नहीं अपनाया, तो यह अपराध केवल करने वालों का नहीं, बल्कि चुप रहने वालों का भी होगा।
संपादक
देवभूमि न्यूज 24
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शिलाई,सिरमौर,हिमाचल प्रदेश