*देवभूमि न्यूज 24.इन*
देव मान्यताएं हमारे ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। सभी गांव में अपने कुल देवी देवता हैं जिनसे परम्पराग श्रद्धा से पूरा समाज जुड़ा हुआ है। जिन देवालयों में स्वच्छता,पवित्रता, समानता, अनुशासन, ईमानदारी और सुव्यवस्था होगी वहां जाकर श्रद्धालुओं को शान्ति भी मिलती है और देवशक्ति का एहसास भी होता है वर्ना आज अनेक देवस्थान मात्र पर्यटक स्थल बनते जा रहे हैं।

आज कल छत्रधारी चालदा महासू देवता सिरमौर जिला के पश्मी गांव में विराजमान हो गए हैं। उनके आगमन की शोभा यात्रा में जोंसार बावर, सिरमौर तथा शिमला जिला सहित हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

देवता की इस शोभा यात्रा में परम्परा के नाम पर की गई जीव हत्याएं (बलि प्रथा) और शराब सेवन भी चर्चा का विषय बन गया है। बहुत से प्रबुद्ध लोग देवता के नाम पर ऐसी गलत परम्परा को बंद करने की सलाह देते हैं लेकिन कुछ लोग अन्धविश्वास के चलते समर्थन भी करते हैं।

समाज से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रबुद्ध जनों को तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर चर्चा करनी चाहिए उसी से सही निष्कर्ष भी निकलता है। हमारा सनातन धर्म वेद शास्त्रों द्वारा प्रमाणित है और देव परम्पराएं भी उसी का अंश है लेकिन लोक संस्कृति और मान्यताओं के कारण कुछ ऐसी परम्पराएं जोड़ दी गई हैं जो सनातन धर्म या वेद शास्त्रों से मेल नहीं खाती।

देवताओं के नाम पर बलि प्रथा (जीव हत्या) या नशावृत्ति भी उन्हीं में से हैं। चूड़धार के शिरगुल देवता,सराहां के बिजट देवता, हरिपुरधार की भंगायणी माता और रेणुका माता आदि कुल देवी देवताओं की मान्यता करने वाले अनेक गांवों में इन विकृत प्रथाओं को देव व्यवस्था से जुड़े कारिंदों ने पंचराय (पंचों की सलाह) और देवता की सहमति लेकर बन्द कर दिया गया है।

छत्रधारी चालदा महासू देवता के लिए भी ऐसा किया जाना चाहिए। जो लोग बिना सोचे समझे बलिप्रथा को उचित ठहराने के लिए अपने अल्पज्ञान से वेद शास्त्रों का हवाला देते हैं। उनके लिए बलि प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध वेद शास्त्रों के ही कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं आशा है वे इसे पढ़ेंगे, समझेंगे और अपना ज्ञानवर्धन भी करेंगे:-

1- “सुरां मत्स्यान् मधु मांस आसवं कृसरौदनम्।
धूर्तै: प्रवर्तितं ह्येतत् नैतद् वेदेषु कल्पितम्।।
अर्थात सुरा, मत्स्य, शराब,मांस,आसव आदि सब व्यवहार धूर्तों का चलाया हुआ है। उसका वेदों में कोई प्रमाण नहीं है।
(महाभारत शांति पर्व अ० 265 श्लोक 9)
2- “जानाति को वेद पुराण तत्वं ये कर्मठा: पण्डितमानयुक्ता:।
लोकाधमास्ते नरकं पतन्ति कुर्वन्ति मूर्खा: पशु घातनं चेत।।
अर्थात जो अभिमानी कर्मकांडी वेद और पुराण के तत्व को नहीं समझते और पशुओं की हत्या करते हैं वे अवश्य नरक में जाते हैं।
(पद्म पुराण पद्मोत्तर खंड अ०105)

3- “इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्।
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने मा हिंसी परमे व्योमन्।।
अर्थात ऊन जैसे बालों वाले बकरी, ऊंट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पांव वालों को मत मार।
(यजुर्वेद 13/50)
4- “बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति वै वैदिकी श्रुति:।
अजसंज्ञानि बीजानि च्छागं नो हन्तुमर्हथ।।
“नैष धर्म: सतां देवा यत्र बध्येत वै पशु:।।
अर्थात यज्ञ में बीजों से ही हवन करना चाहिए यह वेद की श्रुति है जिस कर्म में बकरे आदि जीव की हत्या होती है वह श्रेष्ठ पुरुषों का धर्म नहीं है।
(महाभारत शांति पर्व 337 4-5)
5- चार्वाक सम्प्रदाय के ग्रंथ में तो यहां तक लिखा है कि-
“पशूश्चेन्निहित: स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते।।

अर्थात यदि ज्योतिष्टोमादि में मरा हुआ पशु स्वर्ग को जाता है तो यजमान अपने पिता को यज्ञ में क्यों नहीं मार डालता।
वेदों शास्त्रों में मनुष्य के काम क्रोध जैसे अवगुणों को भी पशु की संज्ञा दी गई है जैसे-
6- “कामक्रोधौ द्वौ पशू इमावेव मनसा बलिमर्पयेत्।
कामक्रोधौ विघ्नकृतौ बलिं दत्वा जपं चरेत।।”
अर्थात काम और क्रोध रुपी दोनों विध्नकारी पशुओं को बलिदान करके उपासना करनी चाहिए,यही शास्त्रों में कहे गए बलिदान का रहस्य है। (पाशुपत ब्रह्मोपनिषद)
ऐसे अनेक प्रमाण हमारे वेद शास्त्रों और धर्मग्रंथों में बलि प्रथा जैसी कुरीतियों के विरुद्ध दिए गए हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय में तो मनुष्य के सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का विस्तार से वर्णन किया गया है। फिर भी यदि कोई नहीं समझ सके तो वह उनका अज्ञान ही है। उनके लिए हम सन्त कवीरदास की वाणी में यही कह सकते हैं कि-
“कवीरा तेरी झोंपड़ी गल कटियन के पास।
जो करे सो भरे तू क्यों भया उदास।।”
आशा है प्रबुद्ध लोग इस विषय पर चिंतन मनन करते हुए अपनी तथ्यपूर्ण प्रतिक्रिया देंगे।
कुन्दन सिंह शास्त्री