अचेतन के शुक्ल पक्ष को जाग्रत करता है ध्यान

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 *देवभूमि न्यूज 24.इन*

⭕मनुष्य अपनी इच्छाओं के अधीन रहता है। ये इच्छाएं मन द्वारा संचालित होती हैं। जब तक मनुष्य इन इच्छाओं के वश में रहता है, ये इनसान को भटकाती रहती हैं। इच्छाओं से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है, अपनी चेतना को जाग्रत करना। यह चेतना तभी जाग्रत होती है, जब आप ईश्वर का ध्यान करते हैं।

जब इच्छा और मन की चंचलता जीवन का संचालन करती है, तब महानता प्रगट नहीं हो पाती। उन्हीं व्यक्तियों में महानता प्रगट हुई है, जिनके जीवन की लगाम इच्छा के हाथ में नहीं थी, मन की चंचलता से जीवन संचालित नहीं था। जब सुप्त चेतना जागती है, तब इच्छा और मन पर नियंत्रण होता है। या यों कहें, जब इच्छा और मन पर अनुशासन होता है, तब सुप्त चेतना जागती है। हमारी चेतना शरीर में बंदी बनी हुई है।

मनोवैज्ञानिकों ने कहा, सचेतन मन को शांत करो और अचेतन मन को जाग्रत करो, शक्तियां बढ़ेंगी। जब इस तथ्य पर दार्शनिक दृष्टि से सोचते हैं तो प्रतीत होता है कि यह सही तो है, पर है अपूर्ण। इसमें कुछ परिष्कार अपेक्षित है। अचेतन मन के जागरण की बात कही गई तो क्या अचेतन मन में भद्दापन, कुरूपता, हिंसा और घृणा नहीं है? सारे आवेश और आवेग का अड्डा है यह। बेचारे सचेतन मन के पास ये आते कहां से हैं? ये सारे बुरे भाव अचेतन मन से ही तो सचेतन मन में संक्रांत होते हैं। हमें अचेतन मन को दो भागों में बांटना होगा। एक वह अचेतन मन जिसका रूप भद्दा है और वह अचेतन मन जो सुंदर है, सरस और मधुर है। एक है कृष्ण पक्ष और एक है शुक्ल पक्ष। हम अचेतन मन के शुक्ल पक्षवाले भाग को जगाएं और कृष्ण पक्षवाले भाग को सोया रहने दें। केवल अचेतन मन को जगाने से काम नहीं होगा। अचेतन मन के उस भाग को जगाएं, जहां अच्छाइयां हैं। सैद्धांतिक भाषा में कहें तो उस धारा को जगाना है, जो क्षायोपशमिक (क्षय और उपशम) भाव है। उस धारा को शांत रहने देना है, जो औदयिक भाव है। इसलिए केवल सचेतन मन को ही नहीं, अचेतन मन के कृष्ण पक्षवाले भाग को भी शांत करना है।

हमें प्रेक्षा ध्यान की साधना में केवल जगाना ही नहीं है, किसी को जगाना है तो किसी को सुलाना है। एक को जगाना है तो एक को सुलाना है। सचेतन मन और अचेतन मन के कृष्ण पक्ष को सुलाना है और उसके शुक्ल पक्ष को जगाना है। इसका उपाय है— चैतन्य-केंद्र-प्रेक्षा।

शरीर के दो भाग हैं— नाभि से नीचे का भाग और नाभि से ऊपर का भाग। नीचे का भाग कृष्ण पक्ष है और ऊपर का भाग शुक्ल पक्ष। जब दर्शन केंद्र और ज्योति केंद्र पर ध्यान करते हैं तो अचेतन मन का शुक्ल पक्ष जाग्रत होता है।

‘इच्छा आकाश के समान अनंत है’— यह मैं भी जानता हूं और आप भी जानते हैं। सब जानते हैं कि इच्छा पूर्ण नहीं होती। अपूर्ण बनी रहती है। पर सचाई का साक्षात्कार करनेवाले विरले ही मिलेंगे। साक्षात्कार वही व्यक्ति कर पाता है, जिसका शुक्ल पक्ष जाग गया है।

कपिल दो मासे सोने के लिए राजा के पास गया। राजा ने कहा— ‘मांगो।’ अब इच्छा को खेलने के लिए अनंत आकाश मिल गया। इच्छा बढ़ती गई और पूरे राज्य को पा लेने और राजा को रंक बनाने की बात सोचकर ही शांत हुई। मोड़ आया। सच्चाई का भान हुआ। शुक्ल पक्ष जाग गया। राजा ने कहा— ‘मांगो।’ कपिल बोला— ‘क्या मांगू? कुछ है ही नहीं इस संसार में। अब मैं जा रहा हूं, उस देश में जहां मांग नहीं है, चाह नहीं है।’ कपिल संन्यासी बन गया।

सच्चाई का साक्षात्कार होते ही मांग पूरी हो जाती है, चाह समाप्त हो जाती है। जब तक सचाई का अवबोध नहीं होता, तब तक मांग कभी पूरी होती ही नहीं, चाह मिटती ही नहीं।

सिद्ध पुरुष ने अपने भक्त से कहा— ‘प्रसन्न हूं। कुछ मांगो।’ भक्त बोला— ‘कुछ नहीं चाहिए।’ सिद्ध पुरुष ने देखा, यह कैसा भक्त! अमूल्य क्षण को खो रहा है। मांगने के लिए आग्रह किया। भक्त बोला— ‘यदि आप देना ही चाहते हैं तो यह वरदान दें कि मेरे मन में चाह उत्पन्न ही न हो, मांग रहे ही नहीं।’

यह तब संभव है, जब सत्य का साक्षात्कार हो जाता है। अन्यथा लोग मांग को पूरी करने के चक्कर में कितने देवी-देवताओं की मनौतियां मनाते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं। वे कहां-कहां नहीं भटकते। फिर भी एक के बाद दूसरी मांग बनी रहती है। इच्छा पर अंकुश नहीं रहता। वह पराक्रम के द्वारा पूरी नहीं होती। तब देवताओं की शरण ली जाती है। कोई भी व्यक्ति देवताओं की मनौती उनके गुणों के कारण नहीं मनाता। उसके दिव्य गुणों के प्रति कोई आस्था भी नहीं है। मुझे दिव्य बनना है, देवता सदृश बनना है, इस भावना से कोई देवता के पास नहीं जाता, किंतु स्वार्थ से प्रेरित होकर अपनी निरंकुश इच्छा को पूरी करने के लिए वहां जाता है, उनकी शरण लेता है। बेचारे देवता भी क्या करेंगे? किस-किस की इच्छा पूरी करेंगे? कितनों को संभालेंगे?

🛑आज ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आदमी ने आदमी पर भरोसा करना छोड़ दिया, श्रम और पुरुषार्थ पर भरोसा करना छोड़ दिया और पूरा विश्वास देवताओं के चरणों में समर्पित कर डाला। देवताओं के सामने भी समस्या है कि किस-किस की मांग पूरी करे? कहां से करे? कितनी करे? कोई भी व्यक्ति देवता के पास इसलिए नहीं जाता कि उसका सोया मन जग जाए, चेतना जागृत हो जाए, दिव्यगुणों की प्राप्ति हो। यदि आदमी ने इच्छा पर नियंत्रण करना नहीं सीखा तो वह दिन दूर नहीं है, जब देवता भी मनुष्य को ठुकरा देंगे। संभव है मंदिर के सारे द्वार ही बंद हो जाएं। वे केवल उनके लिए ही खुले रह सकें, जो मंदिर में इच्छापूर्ति के लिए नहीं, आराधना और सद्भावना से आते हैं।

         *🚩हरिऊँ🚩*