धर्मन-कर्मन गति।(कहानी)राजीव शर्मनअम्बिकानगर-अम्ब कॉलोनी समीप रेलवे-स्टेशन क्रासिंग ब्रिज व कमांडर होम गार्डज कार्यालय अम्ब तहसील उपमंडल अम्ब-177203 हिमाचल प्रदेश।

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देवभूमि न्यूज 24.इन
टारणा पहाड़ी पर प्राची से उगता सूर्य सबसे पहले टारना माता मंदिर स्थित पीपल ब्रह्म का स्पर्श करता है। टारणा माता मंदिर सैंकड़ो सालों से दस महा-विद्याओं का तांत्रिक गढ़ माना जाता है। रियासतकालीन राजा श्याम सेन ने यहां किसी युद्ध की विजय श्री मिलने उपरांत श्यामाकाली जी का भव्य मंदिर बनवाया था। यह मंदिर विद्वान पंडित-पुरोहितों की साधना स्थली और तांत्रोक्त शास्त्रार्थ का भी केंद्र रहा है। आज भी सारे पौराणिक महत्व के पुरातन नगर श्री मांडव्य नगर जनपद छोटी काशी के शिखर पर स्थित टारना माता मंदिर से सारे शहर के बीचोंबीच बहती मांडव्य ऋषि की मांडव्य शिला से बहती विपाशा नदी का विहंगम दृश्य दृष्टिगोचर होता है। चारों दिशाओं के प्राचीन मंदिरों के मनभावन दृश्य भी यहीं से साकार होते रहते है। आज दोपहर बाद पंडित मणी ज्योतिषी, पुरानी मंडी के पद्म नाभ, पंडित जयकृष्ण ज्योतिषी, भगवाहन मोहल्ला के सदानन्द और सनातन धर्म सभा मंडी समीप के पंडित देवी चरण जी कोई हवन अनुष्ठान में लगे हुए थे। मुसीबत के मारे इन सभी पंडितों-पुरोहितों के अनन्य भक्त और यजमान गौरीशंकर किसी समस्या का समाधान करवाने की गर्ज से टारना मंदिर परिसर में पहुंच गए थे। सभी पंडितों ने इशारा करके गौरीशंकर को वहां बैठकर इंतजार करने का निर्देश दिया था। अपने धर्म-कर्म की निवृति उपरांत मुख्य पुरोहित मणी ज्योतिषी ने गौरीशंकर की समस्या का बिवरण पूछा था। गौरीशंकर ने सविस्तार समस्याग्रस्त होने का खुलासा किया कि उसका समखेतर का जद्दी जायदाद का पुश्तैनी मकान पड़ोसी ने साजिश रचते हुए खरीद लिया है। इसके परिणामस्वरूप उसके परिवार पर घोर आपत्ति आन पड़ी है। इसका निवारण शीघ्रातिशीघ्र खोजा जाना चाहिए। वहां पर पुरानी मंडी के वरिष्ठतम वयोवृद्ध पंडित पद्म नाभ ने सबको बतलाया कि यह सब गौरीशंकर के घरेलु कलह क्लेश का ही दुष्परिणाम है। कोई समय इसका छोटा भाई बृजलाल इससे मोर्चाबंदी लगाता रहा। वह जब असमायिक निधन से स्वर्ग सिधारा तो उसकी धर्म पत्नि ने हिस्सा मांगा था। यही नहीं गौरीशंकर के स्वर्गीय पिताजी भागीरथ ने तीन विवाह किए थे। इस पर विमाता सौतेली मां ने आधी जायदाद पर दावेदारी करते हुए गौरीशंकर की छोटी भाभी के साथ-साथ मिलकर गौरीशंकर को कानूनी तौर पर जायदाद की रजिस्ट्रेशन से गहरा आघात पहुंचा कर जबरदस्त कुठाराघात कर दिया है। उधर सदानन्द पुरोहित ने तो गौरीशंकर के वंशजों का पुराना रिकार्ड प्रस्तुत कर दिया था। सभी अचंभित हो गए थे। सभी ने गौरीशंकर की वर्तमान सम्पति का पुराना रिकॉर्ड विस्तारीकरण से खंगाल दिया था। पंडित देवी चरण ज्योतिषी ने कहा कि हम गौरीशंकर की सात पुश्तों के कुल पुरोहित है। हमारे रजिस्टर में इनकी वंशावली का सारा रिकॉर्ड दर्ज है। पंडित जयकृष्ण जयोतिषी ने तो चार कदम बढ़कर सारे मामले का सार निकाल कर प्रस्तुतीकरण कर दिया था। पंडित जयकृष्ण ने सबको बतलाया कि गौरीशंकर मेरे बचपन का सहपाठी मित्र है। इनके घर के एक एक घटनाक्रम से वाकिफ रहता आया हूं। जयकृष्ण ज्योतिषी ने विवाह को सभी सम्पत्तियों का कारक एवं कारण बतलाया। जयकृष्ण पंडित के अनुसार देर-सवेर विवाह ही सम्पति-ठगतंत्र बनता आया है। गौरीशंकर के मकान की विवादास्पद रजिस्ट्री का मूलकारण इनके पिताजी के तीन विवाह से जुड़ा हुआ है। कुछ भी हालात बने हो?गौरीशंकर का कहना था कि इस मकान विक्री रजिस्ट्रेशन से घर की सारी महिलाएं सहमी है। बहु-रानियों पर दबाव बढ़कर पोते -पोतियां भी सोचने पर बिवश है कि आने वाले भविष्य में उनका क्या होगा? यही नहीं कुछ बड़े पोते- पोतियां विवाह योग्य है किन्तु मकान की रजिस्टरी ने रिश्तेदारी स्थापित करवाने में जबरदस्त विघ्न डाल दिया है। पंडित जयकृष्ण का कहना था कि सभी ब्राह्मण परिवार से है। रजिस्ट्री करवाने वाला पड़ोसी दौलतराम भी पंडित-पुरोहिताई करता है।अत: किसी तरह पारस्परिक सामंजस्य से मामला सुलटाना चाहिए। जयकृष्ण पंडित ने गौरीशंकर के पुराने वंशजों की सम्पति जमीन जायदाद पर टिप्पणीकार बनकर पूरी वास्तविक यथा स्थिति से सभी को अवगत करा दिया था।
उनका कहना था कि बुजुर्ग सुनाते आयें है कि शहर के गुसाऊं बजीर बहुत कल्याणकारी स्वभाव के जाने जाते थे। उनका प्रखर बुद्धि कौशल रियासतकालीन राजाओं के लिए किसी दैविक वरदान से कम नहीं बल्कि अलौकिक था। जयदेव जोशी का कहना था कि यह सब जन्म-जन्मांतर की कठोर तपश्चर्या से ही सिद्ध हुआ करता है। वस्तुत: नित्यप्रति की दैनिक व्यस्तता के चलते बजीर साहब दीनजनों के कल्याणार्थ सक्रिय भूमिका अदा करते थे। राज दरवार के साथ-साथ निजी तौर पर वह पीड़ित मानवता के लिए समय निकाल लेते थे।दूरदराज के गांवों के फरियादी बजीर साहब के आवास में बेझिझक प्रवेश कर लेते थे। हर समय गुसाऊं बजीर के यहां अन्न पूर्णा जी की कृपा से भोजन परोसा जाता था। पंडित चरणदास का मकान बजीर साहब की कोठी से सटा हुआ था। यहां पर चरणदास घरेलू कलह व अपनी पंडित विरादरी के अनावश्यक कलह- क्लेश से बहुत परेशान रहने लगे थे। उन दिनों रोजगार के सीमित साधन थे। शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल आदि भी नहीं थे। अठारहवीं शताब्दी के अंत में राजा विजय सेन ने मांडव्य नगर जनपद छोटी काशी में एक भव्य काष्ठनुमा ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थान की इमारत बनवाई। यहां इस विद्यालय भवन को विजय हाई स्कूल के नाम से प्रसिद्ध होने का अमरत्व प्रदान हुआ। इस विजय हाई स्कूल ने कालांतर में लाखों विद्यार्थियों को शिक्षित करवाने का रिकॉर्ड स्थापित किया। पंडित चरणदास अठारहवी शताब्दी के अंत में यहां पढ़ने वाले पहले बैच के विद्यार्थी हुए जिनकी घनिष्ठता पंडित चरणदास,जयदेव जोशी, गुसाऊं बजीर,नन्दलाल पुरानी मंडी,बालकी मियां सभी सहपाठी थे।
उन दिनों पंडित समाज का प्रमुख आजीविकोपार्जन मंदिरों की पूजा पाठ व सोलह संस्कारों का पुरोहिताई पांडित्य एक मात्र साधन था। पंडित चरणदास के पंडित विरादरी के लोग चरणदास की राजदरबार में पहुंच व कर्मकांड की पुरोहिताई से आतंकित रहने लगे थे। अब इन सभी पंडितो ने मिलकर पंडित चरणदास के छोटे से मकान पर जबरन अतिक्रमण करके बहुविधि घेराबंदी करके चरणदास के लिए विकट समस्या पैदा कर दी थी। चरणदास पंडित ने अपने सहपाठी गुसाऊं बजीर से इस समस्याग्रस्त स्थिति से निजात दिलाने की जोरदार गुहार लगाई थी। उदारचित्त गुसाऊं बजीर साहब ने बाबा भूतनाथ मंदिर के पीछे समखेतर के मैदान में खाली पड़ी समतल एक बीघा जमीन को चरणदास को मालिकाना हक देकर झगड़े टंटे से निजात दिला दी थी। पंडित चरणदास ने अपनी भूमि का एक बड़ा कमरा जो कि गुसाऊं बजीर साहब की कोठी से लगा हुआ था,वह बजीर साहब की कोठी की हदबंदी के लिए तामीर करा दिया था।
इस न्यायाधिकरण फैसले के चलते पंडित चरणदास के वंशजों ने गुसाऊं बजीर द्वारा प्रदत्त जमीन पर रघुनाथ का पद्धर,चाण-मारी,खल्यार और पंचवक्त्र मंदिर परिसर से प्रत्येक दिन चार-पांच दरियाई पत्थर ढोकर एक साल के भीतर बहुत बड़ा मिट्टी लकड़ी का कच्चा मकान निर्मित कर दिया था। इस मकान निर्माण की इमारती लकड़ी ,सलोट पोश (चाक्के) तुंगल घाटी की जनेत्तरी धार से घोड़ों पर लादकर लाये गये थे। रियासतकालीन राजा विजयसेन ने तुंगल घाटी के पटनाल- कसाण की कसाणीं-खड्ड से सटी 55 बीघा जमीन दो सिद्ध साधू- महात्माओं की अलौकिक तपश्चर्या,लोक कल्याणार्थ परोपकारी भावनाओं व सिद्धियों की करामात के चलते महात्मा भगवान दास व नारायण दास को दी थी।पंडित-पुरोहित चरणदास के वंशजों जगतराम, भूतनाथ व भागीरथ का पुराना अनाज कठियार भरगांव-द्रुबल गांव में था। पंडित चरणदास के वंशज महात्माओं के धार्मिक सत्संग के चलते सम्पर्क में आते रहते थे। पंडित-पुरोहिताई के कारण कसाणीं-खड्ड का रास्ता ओट्टू नाल,रछौड़ा-खड्ड व अरनोडी खड्ड से समूची तुंगल घाटी को पगडण्डी रास्ते से जोड़ता था। इन वंशजों का रात्रिकालीन पड़ाव बाबा भगवान दास व नारायण दास के सानिध्य में ही रहता था। पंडित-पुरोहित भागीरथ की सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर दोनों महात्माओं भगवान दास और नारायण दास ने सारी 55 बीघा जमीन भागीरथ के नाम पट्टा लिखकर मालिक बना दिया था।
वर्तमान में गौरीशंकर सालोंसाल पड़ोसी की रजिस्ट्री के विरुद्ध अनिर्णीत लडाई लड़ी थी।
सभी पंडित-पुरोहितों ने पैसे का लेन-देन करके समाधान खोजने की कवायद करने का परामर्श दिया था।
इस विवादास्पद और विवादग्रस्त सम्पति की अदालती लड़ाई में गौरीशंकर व उसके मकान की रजिस्ट्री करवाने वाले पड़ोसी के वंशज भी अदालती विवाद में उलझकर रह गए थे। गौरीशंकर के पुराने प्रतिद्वंदी पंडित-पुरोहितों ने वंशजों के शादी विवाह रोक दिये थे। इसका कारण साफ था कि अगर जगह- जमीन नहीं है तो वैवाहिक संबंध स्थापित कराकर मुसीबत क्यों मोल ली जाए?
वर्तमान में प्रखर मति एक कुलदीपक ने पड़ोसी की रजिस्ट्री को हमेशा हमेशा के लिये निरस्त करने का भागीरथी दृढ़संकल्पित दृष्टिकोण अपनाकर सभी को चारों खाने चित्त कर दिया था। इसमें पड़ोसी की तीसरी पीढ़ी की भाणजी पूनम ने प्रारम्भिक वंशज सूत्रधार चरणदास के वर्तमान वंशज योगेन्द्र को पारस्परिक वैवाहिक संबंध स्थापित करने का निर्णायक ऐतिहासिक समाधान निकाल लिया था। इसमें दौलतराम पड़ोसी की नातिन ने अपने ननिहाल में योगेंद्र से शादी करने ही नहीं मनाया बल्कि गौरीशंकर की रजिस्टरी से खरीदी पुश्तैनी सम्पति को योगेंद्र के नाम हस्तांतरित करवा दिया था।सभी हिस्सेदारो द्वारा योगेन्द्र बारे पारस्परिक रजामंद होने से किसी ने भी सम्पति पर हस्ताक्षेप नहीं किया था। क्योंकि पूनम सभी की नातिन थी। उधर योगेन्द्र ने सबको अपनी सम्पन्नता व व्यापारिक बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार से संतुष्ट कर संतुलन कायम कर दिया था। घर गृहस्थाश्रम के इस वैवाहिक संबंध ने योगेन्द्र व पूनम को सरसव्ज बनाकर स्थापित कर दिया है। पांचो पंडितों की टारणा माता मंदिर में विवाह और सम्पति को लेकर सुझाई गई अलौकिक घटनाक्रम की भविष्यवाणी अक्षरश: सत्य सिद्ध हुई है। वर्तमान में दौलतराम की नातिन पूनम और गौरीशंकर के प्रपौत्र योगेंद्र ने एक नया आशियाना बना लिया है। दोनों सरकारी सेवारत है।

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