लौट आओ! मेरे भाई!!(कहानी)राजीव शर्मन

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अम्बिकानगर-अम्ब कॉलोनी समीप रेलवे-स्टेशन क्रासिंग ब्रिज अम्ब व कमांडर होम गार्डज कार्यालय तहसील अम्ब-177203 जिला ऊना-हिमाचल प्रदेश।
देवभूमि न्यूज 24.इन

हमारे पड़ोस में सूरज की डाकघर में मामूली पोस्टमैन की नौकरी क्या लगी? कुछ ईर्ष्यालु लोगों के बेवजह हाथ-पैर सूजने लग गए थे। सबसे ज्यादा दर्द सिद्ध सिंह को हो रहा था। सिद्ध सिंह ने सूरज का कच्चा मकान गिराने को पूरी ताकत झौंक डाली थी। सबसे पहले नगरपालिका के कूड़े का ट्रेक्टर चलाने वाले अनन्त राम को सिद्ध सिंह ने मुफ्त की शराब पिलाकर काबू कर लिया था। देखने में सिद्ध सिंह दुनियावी-मायावी तौर पर सत्त सनातन धर्म का पथ संचलन अनुसरण का सूत्रधार बना रहता था। प्रतिदिन की दिनचर्या में पुरातन मांडव्य नगरी की माता महाकाली की घंटी बजाने वाला जटा-जूट लम्बी शिखा धारण करने वाला सिद्ध सिंह सबको शहर के हर मंदिर में दिखाई देता रहता था। सूरज की दादी अम्मा कहती रहती थी कि ” यह सिद्ध सिंह धर्म परायण होने का आडम्बर रचता आया है, एक तरफ गाय को घास डालता है,दूसरी तरफ उसकी बछिया को चुरा लेता है।”
सिद्ध सिंह आडम्बरी ही नहीं तांत्रिक प्रयोग करने हेतु भी प्रसिद्ध हो गया था। मंदिर-मंदिर घंटियां बजाकर दस्तक देने वाला सिद्ध सिंह पड़ोस की चेतना को विक्षिप्त करने का पापाचारी भी गिना जाता था। चेतना के गरीब माता पिताजी का मकान सिद्ध सिंह की सटी हुई हदबंदी में था। सर्वप्रथम चेतना के माता पिताजी को कर्ज के बोझ में लादने वाला सिद्ध सिंह झूठे अदालती मामलों में घसीटकर आर्थिक तौर पर खोखला करता रहा था। जब यहां पर सिद्ध सिंह को सफलता नहीं मिली तो सिद्ध सिंह ने इकलौती बेटी चेतना पर तांत्रिक प्रयोग करके विक्षिप्त बनाकर एक कली को फूल बनने से पहले समाप्त कर दिया था। चेतना के ननिहाल वालों ने सिद्ध सिंह को मकान दुकान कब्जाने की सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। चेतना के माता पिताजी ने अपने भाई के लड़कों को अपना उत्तराधिकारी बना लिया था।

सूरज के कच्चे मकान की दीवार को नगरपालिका के ट्रैक्टर ड्राइवर अनन्त राम ने पहले सिरे से अन्तिम सिरे तक कूड़े का ट्राली से जोरदार टक्कर लगाकर ध्वस्त करने की पुरजोर कोशिश कर डाली थी। “एक सच्ची कहावत कहती आई है कि ईश्वर सबका रखवाला है। ” सर्वशक्तिमान ने सूरज का मकान गिरने से बचा लिया जबकि अनन्त राम के पैर की हड्डी दीवार की रगड़ से बुरी तरह टूटकर चकनाचूर हो गई थी।
इस घटनाक्रम पर प्रबुद्ध पडोस के बुध्दिजीवी सिद्ध सिंह का सारा गणित जान गए थे।
सिद्ध सिंह अपने नाम के विपरीत आचरण करने से चूकने वाला नहीं था। भगवान कृष्ण ने महाभारत के सुयोधन जो बाद में कुकर्मों के कारण ऐतिहासिक दुर्योधन बना से एक बार प्रश्न किया था? ” दुर्योधन ! यह धर्म विरोधी आचरण करके पांडवों पर अत्याचार क्यों करता है? धर्म का आचरण क्यों नहीं करता है? क्या तूझे धर्म-अधर्म का अंतर समझ नहीं आता है? दुराचारी दुर्योधन ने युग चक्र, जग चक्र व काल चक्र एक साथ घूमा देने वाले अखिलात्मा को तपाक जबाव दिया थी। हे केशव! धर्म क्या है! अधर्म क्या है!! ” मैं बखूबी जानता हूं किंतु धर्म में आचरण की मेरी कोई रुचि नहीं है। मेरा जन्म तो पापाचार का अधर्म कमाना है।”
भगवान अपने बचनानुसार मंद मंद मुस्कराहट बिखेर गए थे। ” हे दुर्योधन! समय आने पर सभी कर्मों का फलादेश मिलता है।”
सूरज की दादी अम्मा ने सिद्ध सिंह पर भविष्य वाणी कर दी थी कि इस पापाचारी को समय ही अपने आप फलादेश देगा।
सूरज की पोस्टमैन की नौकरी पर सिद्ध सिंह ने बहुत सवालिया निशान लगा दिए थे। हालांकि सूरज की नौकरी अपने पिताजी पोस्टमास्टर वीरी सिंह के मृत्यु उपरांत करूणा मूलक आधार पर मिली थी। सिद्ध सिंह ने आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर जमकर सूचनायें प्राप्त करके इसके विरोध में सवालिया निशान खड़े कर दिए थे। सिद्ध सिंह का आरटीआई एक्टिविस्ट बनकर सूचना मांगने का प्रयोजन था कि सूरज की गांव में जमीन व शहर में काफी जगह है,इस कारण जमीन की कृषि आमदनी के चलते सरकारी नौकरी क्यों दी गई?
सिद्ध सिंह को इसमें कोई सफलता नहीं मिल पाई थी।
इस चित्त वृति के कारण सिद्ध सिंह की किरकिरी पूरे समाजिक परिवेश में हो चुकी थी। सूरज के प्रति सबकी सहानुभूतिपूर्वक दृष्टिकोण के चलते सिद्ध सिंह अलग थलग पड़ चुका था।
सूरज का विवाह करवाने की बागडोर पडोस ने संभाल ली थी। एक साल के भीतर ही पोस्ट आफिस में ही काम करने वाली रचना से सूरज का विवाह तय हो चुका था। सिद्ध सिंह ने आदतन सूरज के ससुराल जाकर भड़काने की भरसक कोशिश की किंतु यहां भी सिद्ध सिंह कामयाब नहीं हो पाया था।
“मनुष्य बनाए, ईश्वर ढाये ” सिद्ध सिंह दूसरों का घर उजाड़ने में लगा हुआ था।
वास्तविक तौर पर सिद्ध सिंह की अपने घर चार लड़कियां विवाह के योग्य हो चुकी थी। दो लड़के बेरोजगार होकर दर दर भटक रहे थे।
सिद्ध सिंह का बड़ा लड़का कमल सूरज का ही सहपाठी था। दोनों में व्यवहारिक तौर पर काफी घनिष्टता थी।
यहां भी सिद्ध सिंह को दोनों का मिलना जुलना वार्तालाप करना कतई रास नहीं आता था। एक दूसरे के मध्य जब कभी सहकारिता और सहानुभूतिपूर्वक आदान-प्रदान सुनिश्चित होता तो सिद्ध सिंह अपने बड़े लड़के कमल की घेरेबंदी कर देता था।
हालांकि कमल और सूरज का आत्मिक मित्रतापूर्ण संयोग अब मूक दर्शित हो चुका था।
समय व्यतीत होने पर सिद्ध सिंह के अपने घर में ही भाईयों में सम्पति विवाद का महाभारत की शुरुआत हो चुकी थी। कर्मो का लेखा-जोखा सामने आने लगा था। सिद्ध सिंह को ठेकेदारी में जबरदस्त घाटा पड़ा परिणामस्वरूप वह आर्थिक तौर पर बुरी तरह प्रभावित हो गया था। सूरज और कमल अभी भी चोरी छिपे संवाद स्थापित कर लेते थे।
संयोगवश एक दुखद घटनाक्रम के चलते कमल की एक बस दुर्घटनाग्रस्त होने से मौत ने सबको शोकाकुल कर दिया था।
सूरज को अपने सहपाठी कमल की मृत्यु का दुखदाई एहसास था किन्तु वह संवेदना जतलाने के लिए सिद्ध सिंह के घर नहीं जा सकता था। सिद्ध सिंह अपने बड़े लड़के कमल की मौत से टूट चुका है । सिद्ध सिंह का आजकल अद्ध-रंग लकवे का बुरी तरह शिकार है। सिद्ध सिंह बिस्तर पर पड़ा रहता है। कोई भाई बहन व रिश्तेदार भी उसकी सुध नहीं लेता है। वह अपने कर्मो का फल भोग रहा है। कहते है इसी धरती पर स्वर्ग -नर्क यहीं है।
कभी-कभार सूरज चोरी छिपे कमल की वृद्ध माताजी की आर्थिक सहायता करके सांत्वना दे आता है। एक साल व्यतीत होने पर भी सिद्ध सिंह की हालत में कोई सुधार नहीं हो पाया है।
सूरज आज भी कमल को खोने से शोकाकुल रहता है। वह अपनी धर्मपत्नी रचना का बतलाता रहता है कि उसने कमल सहपाठी को अपने सगे भाई की तरह मानकर बेहद चाहा था।
रचना और सूरज संयोगवश संवाद कायम करके मौन हो जाते है।
कभी कभी ढेर सारी यादें लेकर कमल सूरज के स्वप्न व मानस पटल पर प्रकट होकर संवाद करता है। ” कमल अपने जिगरी दोस्त सूरज से कहता है कि उसके दिमागी पैदल पिताजी सिद्ध सिंह को वह माफ कर देव” सूरज बदहवास हो जाता है । वह नींद से उठ खड़ा होता है। “कमल मेरे भाई! लौट आओ मेरे भाई!!

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