देवभूमि न्यूज 24.इन
हिमाचल प्रदेश की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूमि सदियों से शिव-शक्ति उपासना, ऋषि परंपरा और पौराणिक संस्कृति की जीवंत साक्षी रही है। जिला मंडी और जिला ऊना इस सांस्कृतिक विरासत के दो ऐसे केंद्र हैं, जिन्हें क्रमशः श्री मांडव्य नगर छोटी काशी और श्री छोटा हरिद्वार कहा जाता है। दुर्भाग्यवश, यह गौरवशाली पहचान आज भी सरकारी योजनाओं और विकास दृष्टि में अपेक्षित स्थान नहीं पा सकी है।
मंडी जिला, जहां व्यास (विपाशा) नदी के तट पर श्री मांडव्य ऋषि की तपस्थली स्थित है, पांडवकालीन शिवालयों, पंचवक्त्र महादेव और स्वयंभू बाबा भूतनाथ जैसे अलौकिक शिवधामों के कारण सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। वहीं ऊना जिला, चिंतपूर्णी शक्तिपीठ, श्री द्रोणाचार्य शिव मंदिर, शिवबाड़ी गगरेट और सोमभद्रा-स्वां जैसी पौराणिक नदी के कारण श्री छोटा हरिद्वार की संज्ञा से विभूषित रहा है।

यह एक विडंबना ही है कि जहां मंडी में अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि उत्सव अपने 500 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है, वहीं ऊना का राज्य स्तरीय सोमभद्रा-स्वां महोत्सव बंद कर दिया गया है। यह असंतुलन केवल आयोजन का नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक नीति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आस्था आधारित सांस्कृतिक आयोजन किसी जिले की पहचान होते हैं, न कि बोझ।
रेल संपर्क जैसे बुनियादी ढांचे में भी असमानता स्पष्ट है। ऊना को ब्रॉडगेज रेलवे लाइन उपलब्ध हो चुकी है, जबकि मंडी जिला आज भी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब मंडी जैसे धार्मिक व सांस्कृतिक केंद्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की बातें की जाती हैं।
आज आवश्यकता है कि हिमाचल प्रदेश सरकार, विशेषकर भाषा, कला एवं संस्कृति तथा पर्यटन विभाग, इन दोनों जिलों को सिर्फ नामों तक सीमित न रखकर उनके वास्तविक स्वरूप में विकसित करें। ऊना में सोमभद्रा-स्वां नदी पर प्राकृतिक व कृत्रिम झीलों का निर्माण और मंडी में व्यास नदी के तट पर श्री मांडव्य ऋषि झील जैसी परियोजनाएं धार्मिक पर्यटन को नया आयाम दे सकती हैं। इससे न केवल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय रोजगार, संस्कृति संरक्षण और आर्थिक सुदृढ़ता भी सुनिश्चित होगी।
धार्मिक पर्यटन केवल मंदिरों तक सीमित नहीं होता, वह नदी, पर्वत, इतिहास और लोकविश्वास का समन्वय होता है। यदि मंडी वास्तव में छोटी काशी है और ऊना छोटा हरिद्वार, तो इन उपनामों को योजनाओं, बजट और विकास कार्यों में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए।
अब समय आ गया है कि आस्था को केवल उत्सवों तक सीमित न रखकर, उसे सतत विकास का आधार बनाया जाए। छोटी काशी और छोटा हरिद्वार की यह मांग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक न्याय और क्षेत्रीय संतुलन की भी है।
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