देवभूमि न्यूज 24.इन
आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन जहां जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है, वहीं यह बच्चों के लिए धीरे-धीरे एक खामोश खतरा साबित हो रहा है। खेल के मैदानों से दूर होते बच्चे अब मोबाइल स्क्रीन में कैद होते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों के ताज़ा अध्ययनों में यह स्पष्ट हुआ है कि मोबाइल का अत्यधिक उपयोग बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
बढ़ता ‘डिजिटल नशा’
डॉक्टरों के अनुसार जो बच्चे प्रतिदिन 4 से 5 घंटे मोबाइल पर गेम खेलने या वीडियो देखने में बिताते हैं, उनमें चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी, नींद न आना और व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। मोबाइल गेम्स और सोशल मीडिया की लत बच्चों को वास्तविक दुनिया से काटकर एक काल्पनिक दुनिया में ले जा रही है, जिससे अकेलेपन और अवसाद (डिप्रेशन) का खतरा बढ़ रहा है।
शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर हो रहे बच्चे
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी और रेडिएशन बच्चों की नाज़ुक आंखों और मस्तिष्क पर बुरा असर डाल रही है। लगातार मोबाइल उपयोग से
आंखों की रोशनी कमजोर होना
गर्दन व रीढ़ की हड्डी में दर्द
कम उम्र में मोटापा
जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं। खेल-कूद से दूरी बच्चों की शारीरिक क्षमता को भी कमजोर कर रही है।
माता-पिता की लापरवाही बन रही कारण
अक्सर व्यस्त दिनचर्या के चलते माता-पिता बच्चों को शांत रखने के लिए उनके हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। यह आदत बच्चों को गलत कंटेंट, ऑनलाइन लत और साइबर अपराध की ओर धकेल सकती है, जिसका असर लंबे समय तक बना रहता है।
पढ़ाई और सामाजिक जीवन पर गहरा असर
मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की सीखने की क्षमता घट रही है। किताबों से दूरी और केवल वीडियो पर निर्भरता के कारण बच्चों की सोचने-समझने की शक्ति सीमित हो रही है। शिक्षकों के अनुसार अधिक मोबाइल उपयोग करने वाले बच्चे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं।
‘डिजिटल भेंगापन’ बन रही गंभीर समस्या
नेत्र विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मोबाइल की छोटी स्क्रीन को लंबे समय तक पास से देखने के कारण बच्चों में ‘डिजिटल स्ट्रैबिस्मस’ (डिजिटल भेंगापन) की समस्या तेजी से बढ़ रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार 5 से 12 वर्ष की आयु के बच्चे इस खतरे की चपेट में सबसे ज्यादा आ रहे हैं।
लक्षण:
बार-बार आंखें मलना
देखने के लिए सिर टेढ़ा करना
धुंधला दिखाई देना
आंखों में सूखापन व जलन
समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या स्थायी भी हो सकती है।
क्या करें माता-पिता
बच्चों के स्क्रीन टाइम पर सख्त निगरानी रखें
मोबाइल की जगह खेल, किताबें और रचनात्मक गतिविधियां बढ़ावा दें
खुद भी मोबाइल के सीमित उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करें
बच्चों से संवाद बनाए रखें और डिजिटल आदतों पर नजर रखें
निष्कर्ष:
मोबाइल सुविधा है, विकल्प नहीं। समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो यह बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर संकट बन सकता है। माता-पिता की जागरूकता ही बच्चों को इस डिजिटल जाल से बचा सकती है।