देवभूमि न्यूज 24.इन
घुमारवीं उपमंडल की ग्राम पंचायत बरोटा के लग्नेश कुमार ने विपरीत परिस्थितियों, आर्थिक संघर्ष और शारीरिक चुनौती को मात देकर ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है। लग्नेश हिमाचल प्रदेश के पहले नेत्रहीन अधिवक्ता बनकर न केवल कानून के क्षेत्र में सक्रिय हैं, बल्कि समाज को हौसला देने वाली मिसाल भी पेश कर रहे हैं।
वर्तमान में 33 वर्षीय लग्नेश घुमारवीं सिविल कोर्ट में नियमित रूप से वकालत कर रहे हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा है। वर्ष 2009 में एक सामान्य-सा आंखों का संक्रमण धीरे-धीरे गंभीर होता गया और तमाम बड़े अस्पतालों में इलाज के बावजूद वे पूरी तरह दृष्टिहीन हो गए। इस दौरान उनके सामने शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक चुनौतियाँ भी खड़ी हो गईं।
इसी बीच पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई। उनकी माता आंगनबाड़ी में हेल्पर के रूप में कार्य कर घर का गुजारा करती रहीं, लेकिन उन्होंने कभी अपने बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया। मां के इसी संबल और आत्मविश्वास ने लग्नेश को आगे बढ़ने की ताकत दी।
लग्नेश ने वर्ष 2016 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद कानून की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। केके फाउंडेशन ने उनकी प्रतिभा और जज्बे को पहचानते हुए उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की। इसके फलस्वरूप लग्नेश ने देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से वर्ष 2020 में एलएलबी की डिग्री हासिल की।
लग्नेश के संघर्ष और लगन का प्रभाव इतना गहरा रहा कि बार काउंसिल ऑफ हिमाचल प्रदेश को अपने नियमों में बदलाव करना पड़ा। बार काउंसिल ने न केवल उनका पंजीकरण किया, बल्कि भविष्य के लिए यह नीति भी बनाई कि किसी भी दिव्यांग अधिवक्ता से पंजीकरण शुल्क नहीं लिया जाएगा।
लग्नेश कुमार की यह सफलता कहानी साबित करती है कि मजबूत इच्छाशक्ति और सही सहयोग से कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। वे आज न सिर्फ एक सफल अधिवक्ता हैं, बल्कि हजारों युवाओं और दिव्यांगजनों के लिए उम्मीद की रोशनी भी बन चुके हैं।