75 की उम्र में पद छोड़ना… मोहन भागवत की बात में छिपा है बड़ा संदेश

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देवभूमि न्यूज 24.इन


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत का बार-बार “रिटायरमेंट” पर बोलना कोई सामान्य या औपचारिक टिप्पणी नहीं है। न ही यह महज आत्मचिंतन है। इसके पीछे एक वैचारिक संदेश, संगठनात्मक चेतावनी और सत्ता के लिए तय किया जाने वाला मापदंड छिपा हुआ है संघ, सरकार और भाजपा तीनों के लिए।
भागवत यदि चाहें तो सीधे यह कह सकते हैं कि वे संघ प्रमुख का पद छोड़ देंगे, लेकिन वे ऐसा नहीं करते। वे बात करते हैं मर्यादा, परंपरा और समय-सीमा की। असल में, वह यह स्थापित करना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं होता, और नेतृत्व का एक स्वाभाविक अंत होना चाहिए।
परंपरा या दीवार?
मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी—दोनों ही 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। संघ और भाजपा के भीतर यह उम्र लंबे समय तक एक अनौपचारिक रिटायरमेंट लाइन मानी जाती रही है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने कहा था कि 2024 तक प्रधानमंत्री पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं है। उस वक्त यह संकेत माना गया कि 75 की उम्र पार करने के बाद वे पद छोड़ सकते हैं।
लेकिन 2024 के बाद भी यह नहीं हुआ। शायद यही वजह है कि भागवत बार-बार इस विषय को सार्वजनिक मंचों से दोहराते हैं—मानो यह याद दिला रहे हों कि परंपरा को सुविधा के मुताबिक नहीं बदला जा सकता।
चिंता की असली वजह
संघ और भाजपा के रिश्ते को अक्सर “दिल और दिमाग” का रिश्ता कहा जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में इस रिश्ते में सूक्ष्म तनाव के संकेत मिले हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत 75 वर्ष से अधिक उम्र के 20 से ज्यादा नेताओं को टिकट नहीं दिया गया। उस वक्त तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कहा था कि यह पार्टी का फैसला है।
तब यह धारणा बनी कि पार्टी और सरकार, दोनों एक ही सोच पर चल रही हैं। लेकिन समय के साथ यह संतुलन बदलता दिखा।
बदली रणनीति
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के रिटायरमेंट को लेकर तीखी राजनीति हुई। अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि भाजपा जीतने पर मोदी केवल एक साल प्रधानमंत्री रहेंगे, क्योंकि 75 साल का नियम उन्होंने ही बनाया है। जवाब में अमित शाह को सामने आना पड़ा और कहना पड़ा कि भाजपा के संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है और मोदी 2029 तक नेतृत्व करेंगे।
यहीं से तस्वीर बदली। अब रिटायरमेंट का सवाल विपक्ष से नहीं, बल्कि घर के भीतर से उठता दिखा।
घर से उठती आवाज
कम से कम पांच मौकों पर मोहन भागवत सार्वजनिक रूप से रिटायरमेंट या जिम्मेदारी छोड़ने की बात कह चुके हैं। जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था
“जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।”
हाल ही में मुंबई में उन्होंने कहा कि संघ ने उनसे उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन यदि पद छोड़ने को कहा गया तो वे तुरंत छोड़ देंगे। यह बयान साधारण नहीं है यह आत्मघोषणा नहीं, बल्कि वैचारिक उदाहरण है।
संगठन सबसे ऊपर
RSS और BJP औपचारिक रूप से अलग संगठन हैं, लेकिन दोनों की धुरी एक ही है—राष्ट्र सर्वोपरि, संगठन व्यक्ति से बड़ा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। मोदी स्वयं कई बार कह चुके हैं कि पार्टी संगठन से बढ़कर कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नागपुर में संघ के कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी और मोहन भागवत के साथ दिया गया वक्तव्य इसी रिश्ते का प्रतीक था।
दरार की वजह
यह भी सच है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में संघ की निर्णायक भूमिका रही। संघ के तीन बड़े एजेंडे राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता में से दो पूरे हो चुके हैं। इसके बावजूद रिश्तों में खटास तब दिखी, जब पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि पार्टी अब संघ के बिना भी चुनाव लड़ सकती है।
इस बयान का असर चुनाव नतीजों में दिखा। बाद में दोनों संगठनों ने दूरी कम की और विधानसभा चुनावों में भाजपा को सफलता मिली, लेकिन वैचारिक असहजता बनी रही।
वैचारिक अपेक्षा
अब असली सवाल यही है मोहन भागवत बार-बार रिटायरमेंट की बात क्यों कर रहे हैं? क्या यह प्रधानमंत्री के लिए एक वैचारिक संकेत है कि अब नेतृत्व परिवर्तन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए?
भले ही रिटायरमेंट का कोई लिखित नियम न हो, लेकिन संघ की राजनीति में वैचारिक अपेक्षा का महत्व नियमों से कम नहीं होता। और यहीं से वह सवाल उभरता है, जिसे कोई सीधे नहीं पूछता नरेंद्र मोदी पद क्यों नहीं छोड़ना चाहते?
संभव है, उन्हें लगता हो कि उनका राजनीतिक और वैचारिक मिशन अभी अधूरा है। या फिर यह भी सच हो सकता है कि उनके बाद प्रधानमंत्री पद के उत्तराधिकारी को लेकर तस्वीर साफ नहीं है।
लेकिन मोहन भागवत का संदेश साफ है
संगठन व्यक्ति से बड़ा है, और नेतृत्व की भी एक समय-सीमा होती है।
अब देखना यह है कि यह संदेश केवल नैतिक उपदेश बनकर रह जाता है या सत्ता के गलियारों में कोई वास्तविक बदलाव लाता है।