देवभूमि न्यूज 24.इन
नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसके जरिए उन्होंने प्रोबेशनरी पीरियड के दौरान नौकरी से अपनी बर्खास्तगी के आदेशों को चुनौती दी। हाई कोर्ट को कार्रवाई पूरी तरह से सामान्य और कानून के दायरे में नजर आई। अमन प्रताप सिंह की याचिका खारिज करते हुए जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने कहा कि टर्मिनेशन पूरी तरह से साधारण है, यह न तो सजा देने वाला है और न ही कलंकित करने वाला।
कोर्ट ने मानी ये बात
कोर्ट ने माना कि इस पर संविधान के आर्टिकल 311(2) के तहत सुरक्षा उपाय या अनुशासनात्मक कार्रवाई पर लागू होने वाले नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत लागू नहीं होते। नौकरी से निकाले जाने वाले फैसले को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि यह फैसला याचिकाकर्ता के परफॉर्मेंस, व्यवहार और सर्विस रिकॉर्ड के पूरे असेसमेंट पर आधारित है, जिसमें खराब ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) और फुल कोर्ट के सामने रखी गई शिकायतें शामिल हैं।
क्या था मामला?
कोर्ट ने माना कि यह किसी भी साबित गलत काम पर आधारित कार्रवाई नहीं है। दरअसल 9 सितंबर, 2024 को एक विडियो वायरल हुआ था जिसमें याचिकाकर्ता एक वादी के साथ कथित तौर पर अमर्यादित तरीके से बोलते हुए और असभ्य व्यवहार करते हुए दिखाई दिए। उस वक्त याचिकाकर्ता द्वारका कोर्ट में साउथ वेस्ट डिस्ट्रिक्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर कार्यरत थे।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दी दलील
हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने विडियो का संज्ञान लिया। जांच के बाद 2024 में फुल कोर्ट मीटिंग बुलाई गई, जिसमें याचिकाकर्ता की सर्विस से बर्खास्तगी का फैसला लिया गया। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसका वायरल विडियो सर्कुलेट होना, उसे सर्विस से हटाने का पक्का और ठोस कारण बन गया। तर्क दिया कि इस तरह का निष्कासन असल में कथित गलत काम पर आधारित एक सजा है और इसलिए यह प्रोबेशनर के सजा वाले टर्मिनेशन नियमों पर लागू कानून के उलट सजा है।
प्रतिवादियों ने दिया ये तर्क
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को नौकरी से निकालना और उसकी सर्विस के संबंध में पहले उठाए गए कदम, उसका विडियो वायरल होने का नतीजा नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता का साल 2023 का ACR इंस्पेक्टिंग जजों की कमेटी ने अगस्त 2024 को ही रिकॉर्ड पर ले लिया था।