देवभूमि न्यूज 24.इन
हर वर्ष 13 फरवरी को विश्वभर में विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। इस दिन की घोषणा यूनेस्को द्वारा की गई थी, ताकि रेडियो की उस शक्ति को सम्मान दिया जा सके जिसने दशकों से समाज को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन से जोड़े रखा है। डिजिटल युग में जहां संचार के अनेक आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, वहीं रेडियो आज भी अपनी सादगी, विश्वसनीयता और व्यापक पहुंच के कारण प्रासंगिक बना हुआ है।
रेडियो केवल एक यंत्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सशक्त आवाज है। आपदा के समय, युद्ध की परिस्थितियों में, दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में जहां इंटरनेट और टेलीविजन की पहुंच सीमित है रेडियो ही सबसे भरोसेमंद माध्यम सिद्ध होता है। पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों वाले हिमाचल जैसे राज्यों में रेडियो आज भी लोगों के दैनिक जीवन का अहम हिस्सा है। खेतों में काम करते किसान हों या लंबी यात्राओं पर निकले चालक, रेडियो उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलता है।
रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता और सहजता है। कम लागत में, बिना किसी जटिल तकनीक के, यह लाखों लोगों तक एक साथ संदेश पहुंचा सकता है। सामुदायिक रेडियो स्टेशनों ने स्थानीय भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह मंच समाज के अंतिम व्यक्ति को भी अपनी बात रखने का अवसर देता है।
आज जब सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ और फर्जी खबरों का खतरा बढ़ रहा है, ऐसे समय में रेडियो की विश्वसनीयता और जिम्मेदार पत्रकारिता का महत्व और बढ़ जाता है। रेडियो संवाद का माध्यम है, जो श्रोताओं को सोचने, समझने और जागरूक बनने के लिए प्रेरित करता है।
विश्व रेडियो दिवस हमें यह याद दिलाता है कि तकनीक बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन सच्ची और जिम्मेदार आवाज की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती। आवश्यकता है कि हम इस सशक्त माध्यम को नई पीढ़ी से जोड़ें, सामुदायिक रेडियो को बढ़ावा दें और सूचना के इस सशक्त स्तंभ को और मजबूत बनाएं।
रेडियो की यही विशेषता है यह बिना दिखे, बिना शोर किए, सीधे दिलों तक पहुंचता है। और शायद यही कारण है कि बदलते दौर में भी रेडियो की आवाज कभी धीमी नहीं पड़ती।