मातृ-पितृ दिवस: सम्मान, कृतज्ञता और संस्कारों का उत्सव

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देवभूमि न्यूज 24.इन
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है“मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः” अर्थात् माता और पिता को देवता के समान सम्मान दो। इसी भावना को साकार करने के लिए मातृ-पितृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें अपने माता-पिता के प्रति प्रेम, आदर और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है।
माता-पिता का त्याग और समर्पण
माता हमें जन्म देती है, पालन-पोषण करती है और अपने स्नेह से जीवन को आकार देती है। पिता परिवार की जिम्मेदारियों का भार उठाकर सुरक्षा, शिक्षा और संस्कार प्रदान करते हैं। दोनों मिलकर हमारे व्यक्तित्व की नींव रखते हैं। उनके त्याग, संघर्ष और समर्पण के बिना हमारा जीवन अधूरा है।
बदलते समय में बढ़ती जिम्मेदारी
आधुनिक जीवन की भागदौड़ में अक्सर हम अपने माता-पिता के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते। काम, पढ़ाई और तकनीक की दुनिया में उलझकर हम उनके भावनात्मक महत्व को अनदेखा कर देते हैं। मातृ-पितृ दिवस हमें याद दिलाता है कि जीवन की असली पूंजी माता-पिता का आशीर्वाद और साथ है।
सम्मान केवल एक दिन का नहीं
यह दिवस केवल उपहार देने या औपचारिक शुभकामनाएं देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सच्चा सम्मान तब है जब हम प्रतिदिन उनके विचारों का आदर करें, उनकी सेवा करें और उन्हें यह महसूस कराएं कि वे हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।
युवा पीढ़ी के लिए संदेश
युवा वर्ग को चाहिए कि वे अपने माता-पिता के अनुभवों से सीखें। उनकी सलाह जीवन के कठिन मोड़ों पर मार्गदर्शक बन सकती है। समाज में मजबूत पारिवारिक संबंध ही संस्कारित और सशक्त राष्ट्र की नींव रखते हैं।
निष्कर्ष
मातृ-पितृ दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भावनाओं का पर्व है। यह हमें अपने मूल्यों और संस्कारों की याद दिलाता है। आइए, इस अवसर पर हम संकल्प लें कि माता-पिता के सम्मान और सेवा को अपने जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य मानेंगे। उनके आशीर्वाद से ही हमारा जीवन सफल और सार्थक बनता है।