देवभूमि न्यूज 24.इन
हर वर्ष 21 फरवरी को International Mother Language Day मनाया जाता है। यह दिवस केवल भाषाओं के सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता, पहचान और आत्मसम्मान के संरक्षण का संकल्प भी है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह हमारी सोच, संवेदनाओं, परंपराओं और इतिहास की वाहक होती है।
मातृभाषा वह पहली भाषा है, जिसमें हम दुनिया को समझना शुरू करते हैं। हमारी भावनाओं की जड़ें, संस्कारों की नींव और अभिव्यक्ति की सहजता मातृभाषा से ही विकसित होती है। इसलिए किसी भी समाज के लिए अपनी मातृभाषा का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक है।
आज वैश्वीकरण और तकनीकी प्रगति के दौर में अनेक भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। शिक्षा, रोजगार और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अंग्रेजी या अन्य वैश्विक भाषाओं को प्राथमिकता मिल रही है, जो समय की आवश्यकता भी है। किंतु इसके साथ-साथ मातृभाषाओं की उपेक्षा चिंताजनक है। जब कोई भाषा लुप्त होती है, तो उसके साथ एक संपूर्ण संस्कृति, लोक ज्ञान और परंपराएं भी समाप्त हो जाती हैं।
भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाई विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। संविधान द्वारा अनेक भाषाओं को मान्यता दी गई है और विभिन्न राज्यों की अपनी समृद्ध भाषाई परंपराएं हैं। स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने से बच्चों की समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने से सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होती है।
हिमाचल प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय बोलियां और भाषाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इन्हें केवल घरों तक सीमित रखने के बजाय साहित्य, शिक्षा, प्रशासन और डिजिटल माध्यमों में भी स्थान देना होगा। सरकारों के साथ-साथ समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह अपनी मातृभाषा के प्रति गर्व का भाव विकसित करे।
अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस हमें यह संदेश देता है कि आधुनिकता और वैश्विकता को अपनाते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना आवश्यक है। बहुभाषिकता को बढ़ावा देना ही सच्चे अर्थों में समावेशी विकास का मार्ग है। मातृभाषा का सम्मान करना, अपने अस्तित्व और संस्कृति का सम्मान करना है। यही इस दिवस का सार और संकल्प है।
संपादक
जगत सिंह तोमर
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