पंचायत चुनाव और सामाजिक व्यवहार: 62 नमूनों पर आधारित सर्वेक्षण के प्रमुख निष्कर्ष

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देवभूमि न्यूज 24.इन

शिलाईग्राम स्तर पर किए गए 62 उत्तरदाताओं के सर्वेक्षण से पंचायत चुनावों, महिला सहभागिता और सामाजिक दबाव से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। इन निष्कर्षों का बहुआयामी विश्लेषण (विभिन्न आयु वर्ग एवं शैक्षणिक स्तर के आधार पर) यह दर्शाता है कि मतों में तुलनात्मक अंतर बहुत अधिक नहीं है।सर्वेक्षण के मुख्य बिंदु:

  1. चुनावी परंपराएं अब भी प्रभावी
    66% लोगों ने स्वीकार किया कि पंचायत चुनावों के दौरान गांव में अभी भी “लोटा नमक (नीम करना)” जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं प्रचलित हैं। यह दर्शाता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ-साथ पारंपरिक सामाजिक प्रथाएं भी प्रभाव डाल रही हैं।
  2. दल-आधारित राजनीति पर मतभेद
    44% लोगों का मानना है कि पंचायत स्तर (प्रधान, उपप्रधान एवं वार्ड सदस्य) के चुनाव राजनीतिक दलों के आधार पर होते हैं।
    हालांकि 71% पुरुषों ने इस बात को स्वीकार नहीं किया, जिससे लैंगिक दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
  3. मतदान में दबाव की स्थिति
    16% उत्तरदाताओं ने माना कि उन्हें किसी विशेष व्यक्ति को वोट देने के लिए विवश किया जाता है।
    विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि महिलाओं में ऐसा मानने वालों की संख्या पुरुषों की तुलना में लगभग छह गुना अधिक है, जो सामाजिक दबाव और लैंगिक असमानता की ओर संकेत करता है।
  4. महिला आरक्षण का सकारात्मक प्रभाव
    72% लोगों ने स्वीकार किया कि पंचायत स्तर पर 50% महिला आरक्षण से उनकी स्थिति में सुधार हुआ है।
    रोचक तथ्य यह है कि इस सकारात्मक प्रभाव को महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों ने अधिक स्वीकार किया है।
  5. स्वतंत्र मतदान पर प्रश्नचिह्न
    64% लोगों का मानना है कि महिलाएं स्वेच्छा से मतदान नहीं कर पातीं और उन्हें परिवार के पुरुष सदस्यों की राय के अनुसार वोट देना पड़ता है।
    ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस मत में पुरुष और महिलाओं का अनुपात लगभग समान है।
  6. विकास कार्यों पर विश्वास
    62% लोगों ने माना कि पंचायत प्रधान गांव के विकास के लिए कार्य कर रहे हैं, जो स्थानीय नेतृत्व के प्रति विश्वास को दर्शाता है।
    समग्र विश्लेषण
    विभिन्न आयु वर्गों और शैक्षणिक स्तरों के आधार पर किए गए विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि विचारों में बहुत अधिक भिन्नता नहीं है। इससे संकेत मिलता है कि पंचायत चुनावों और महिला भागीदारी को लेकर सामाजिक दृष्टिकोण व्यापक रूप से साझा और स्थिर है।
    यह सर्वेक्षण ग्रामीण लोकतंत्र, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक संरचना की वास्तविकताओं को समझने में महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।