चुनावों में नोटा का विकल्प लाने से नेताओं में क्या सुधार हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने जताया संदेह

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*देवभूमि न्यूज 24.इन*

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर संदेह जताया है कि चुनावों में नन ऑफ द एबव यानी NOTA का विकल्प लाने से देश में चुने हुए नेताओं में कोई सुधार हुआ है या नहीं।
NOTA
सभी चुनाव ों में NOTA ऑप्शन को जरूरी बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि भारत में पढ़े-लिखे और अमीर लोगों में वोटिंग में हिस्सा लेना, आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के मुकाबले बहुत कम है। याचिका में उन सीटों को भी शामिल किया गया है जहां सिर्फ एक ही उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा नोटा से नेताओं में क्या सुधार हुआ?
न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, “क्या NOTA से चुने हुए नेताओं की क्वालिटी बेहतर हुई है? क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि पढ़े-लिखे, अमीर लोग कम वोट करते हैं और आर्थिक रूप से कमजोर लोग ज्यादा वोट करते हैं।”
CJI ने कहा, “कभी-कभी हमें लगता है कि हमें कोई ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए जो जरूरी हो, लेकिन सख्त न हो, ताकि लोग जाकर वोट दें। यह (सिस्टम) सजा देने वाला न हो। ग्रामीण इलाकों में.. जिन महिलाओं को मजदूरी या कंस्ट्रक्शन के काम करने से छूट मिली हुई है.. वे राहत की सांस लेती हैं जब वे ग्रुप में वोट डालने जाती हैं, गाने गाती हैं वगैरह। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा, “महिला वोटर्स की संख्या लगातार बढ़ी है।”
क्या है NOTA, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने जताया संदेह
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के जरिये मतदान के दौरान वोटर्स को नोटा का विकल्प मिलता है जो सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने की सुविधा देता है। साथ ही उनके मत की गोपनीयता को बनाए रखता है। तकनीकी रूप से यह चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं करता है। मतलब यह हुआ कि यदि NOTA को किसी भी उम्मीदवार से अधिक मत मिलते हैं तब भी सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजेता होता है। लेकिन यह नागरिकों को यह शक्ति देता है कि वे चुनावी प्रक्रिया से दूर रहे बिना अपने असंतोष को जाहिर कर सकें।
नोटा का इस्तेमाल कहां कहां होता है?
मतदाता को नोटा का विकल्प लोकसभा, राज्य विधानसभा और पंचायत चुनावों में मिलता है।
लेकिन यह सभी स्थानीय निकायों में समान रूप से लागू नहीं है।
इसका पहली बार 2013 के विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़, मिजोरम, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश में हुआ था।
लोकसभा चुनावों में नोटा का मत प्रतिशत कम लेकिन स्थिर रहा है। 2014 में 1.1%, 2019 में 1.04% और वर्ष 2024 में भी लगभग समान रहा।
राज्य चुनावों में, बिहार ने सबसे अधिक 2.48% (2015) रिकॉर्ड किया, इसके बाद गुजरात 1.8% (2017) था।