होलिका की कहानी

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देवभूमि न्यूज 24.इन

         *होलिका कौन थी?*

सतयुग में महर्षि महर्षि कश्यप कीअनेक पत्नियाँ थीं, जिनमें से एक थीं दिति। दिति के गर्भ से उत्पन्न संतानें दैत्य कहलायीं। उन्हीं से जन्म हुआ तीन संतानों का —
हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप और होलिका।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप अत्यंत बलशाली दैत्य थे।
हिरण्याक्ष का वध भगवान वराह अवतार ने किया।
हिरण्यकश्यप का अंत भगवान नरसिंह अवतार ने किया।

होलिका को ब्रह्मा का वरदान

होलिका ने कठोर तपस्या कर सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया।
ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया —
“तुम अग्नि से नहीं जलोगी,
परंतु यह वरदान तभी प्रभावी होगा जब इसका प्रयोग धर्म और रक्षा के लिए किया जाएगा।”
वरदान पाकर होलिका अहंकार से भर गई। उसे लगा अब अग्नि भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

हिरण्यकश्यप का अहंकार

हिरण्याक्ष की मृत्यु के बाद हिरण्यकश्यप ने भी ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त किया कि उसे न मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न अंदर, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से।
इस वरदान के बल पर उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया।
उसने विष्णु भक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया।
लेकिन उसी के घर जन्मा उसका पुत्र —
🌸 भक्त प्रह्लाद 🌸
जो भगवान भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था।

प्रह्लाद को मारने की योजना

हिरण्यकश्यप ने अनेक बार प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया —
सर्प, हाथी, पर्वत से गिराना — लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने उसकी रक्षा की।
तब होलिका ने एक योजना बनाई।
उसने कहा —
“मैं प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाऊँगी। मुझे तो वरदान प्राप्त है, मैं नहीं जलूँगी; परंतु प्रह्लाद भस्म हो जाएगा।”
हिरण्यकश्यप ने तुरंत आदेश दिया।
विशाल चिता सजाई गई।
होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई।

अग्नि प्रज्वलित हुई।
प्रह्लाद आँखें बंद कर “नारायण-नारायण” जप करने लगा।
धीरे-धीरे अग्नि की ज्वाला बढ़ी…
परंतु आश्चर्य!
जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था, वही तपने लगी।
और जो बालक अग्नि में बैठा था, वह सुरक्षित रहा।
तभी ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले —
“वरदान का दुरुपयोग करने पर वह निष्प्रभावी हो जाता है।”
अहंकार में डूबी होलिका उसी अग्नि में भस्म हो गई।
और भक्त प्रह्लाद सकुशल बाहर आ गए।

🌺 इस कथा से क्या शिक्षा मिलती है?

अहंकार का अंत निश्चित है।
वरदान भी धर्म के विरुद्ध प्रयोग करने पर निष्फल हो जाता है।
सच्ची भक्ति की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में सत्य की ही विजय होती है।

क्यों जलाते हैं होलिका दहन?

होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
यह हमें याद दिलाता है कि —
“अहंकार की अग्नि स्वयं को ही भस्म कर देती है,
और भक्ति की ज्योति कभी नहीं बुझती।”
✍️ज्यो:शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा mo no/WhatsApp no9992776726
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान